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दिवाली कब है 2026 — लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त

दिवाली की तारीख़ और लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त हर शहर में थोड़ा अलग होता है — नीचे अपना शहर चुनिए, समय उसी के सूर्यास्त और लग्न से गिना जाता है।

दिवाली — यानी लक्ष्मी पूजा का दिन — कार्तिक मास की अमावस्या को होती है। तारीख़ उस दिन की मानी जाती है जिस दिन सूर्यास्त के बाद के प्रदोष काल में अमावस्या तिथि चल रही हो, और लक्ष्मी पूजा का सबसे शुभ समय प्रदोष काल के भीतर का वह हिस्सा है जब स्थिर वृषभ लग्न उदय हो। नीचे की सारणी आपके चुने शहर के लिए यही सब गिनती है।

दिवाली 2019 — लक्ष्मी पूजा की तारीख़ और मुहूर्त

रविवार, 27 अक्टूबर 2019बीत चुकी · शहर: दिल्ली

लक्ष्मी पूजा मुहूर्त (प्रदोष काल + वृषभ (स्थिर) लग्न + अमावस्या)18:43 से 20:14 तक
प्रदोष काल17:41 से 20:14 तक
वृषभ काल (स्थिर लग्न)18:43 से 20:38 तक
अमावस्या तिथि27 अक्टूबर 2019, 12:24 — 28 अक्टूबर 2019, 09:08
महानिशीथ काल23:40 से 00:30 (अगले दिन) तक
सिंह काल (स्थिर लग्न)01:14 (अगले दिन) से 03:30 (अगले दिन) तक

अगले वर्षों में दिवाली (लक्ष्मी पूजा)

वर्षतारीख़
2019रविवार, 27 अक्टूबर 2019
2020शनिवार, 14 नवंबर 2020
2021गुरुवार, 4 नवंबर 2021
2022सोमवार, 24 अक्टूबर 2022
2023रविवार, 12 नवंबर 2023
2024शुक्रवार, 1 नवंबर 2024

गणना: चुने शहर का सूर्योदय-सूर्यास्त और तिथि के असली क्षण (स्विस एफ़िमेरिस, लाहिरी अयनांश)। तारीख़ें धर्मसिन्धु-निर्णयसिन्धु के नियमों से, और Drik Panchang के कई शहरों के कैलेंडर से मिलाई गई हैं। सूर्योदय = सूरज का ऊपरी किनारा क्षितिज पर, मानक अपवर्तन सहित। समय शहर के स्थानीय समय में। हर मुहूर्त की शुरुआत अगले पूरे मिनट से और अंत पिछले पूरे मिनट तक लिखी है, ताकि दिखाया हर मिनट मुहूर्त के भीतर रहे; इसलिए दूसरे पंचांगों से एक मिनट का अंतर दिख सकता है।

सारणी के ऊपर शहर का नाम लिखिए और "देखें" दबाइए; फ़ोन पर "मेरे पास का शहर" से नज़दीकी शहर अपने-आप चुना जाता है। "अगला वर्ष" और "पिछला वर्ष" से दूसरे वर्षों की दिवाली और मुहूर्त भी देख सकते हैं। गूगल पर 'diwali kab hai' या 'diwali kab ki hai' लिखकर जो पूछते हैं, उन्हें यही चाहिए होता है — तारीख़ भी, और पूजा का समय भी।

दिवाली की तारीख़ कैसे तय होती है

दिवाली सौर कैलेंडर से नहीं, चांद्र कैलेंडर से चलती है। इसलिए अंग्रेज़ी तारीख़ हर साल बदलती है — कभी अक्टूबर के बीच, कभी नवंबर के दूसरे हफ़्ते तक। तारीख़ तय करने में तीन बातें देखी जाती हैं।

  1. कौन-सी अमावस्या। उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में यह कार्तिक की अमावस्या है; गुजरात और महाराष्ट्र की अमांत गणना में वही अमावस्या आश्विन मास का अंतिम दिन है, और अगले दिन से कार्तिक — यानी गुजराती नव वर्ष — शुरू होता है। नाम अलग, दिन एक ही।
  2. अमावस्या किस समय है। तिथि सूर्योदय या आधी रात से नहीं बँधी होती; वह अपने ही समय पर शुरू और ख़त्म होती है। अक्सर अमावस्या दोपहर में शुरू होती है और अगले दिन दोपहर या शाम तक चलती है।
  3. प्रदोष काल में कौन-सा दिन। लक्ष्मी पूजा प्रदोष में होती है, इसलिए वही दिन लिया जाता है जिस दिन सूर्यास्त के बाद अमावस्या हो।

धर्मसिन्धु और निर्णयसिन्धु जैसे निर्णय-ग्रंथ इसका नियम देते हैं: जिस दिन प्रदोष में अमावस्या हो, वही दीपावली। अगर दोनों दिन प्रदोष में अमावस्या मिले, तो दूसरा दिन तभी लिया जाता है जब उस दिन सूर्यास्त के बाद कम से कम एक घटी (24 मिनट) अमावस्या रहे; वरना पहला दिन। यही वह बारीकी है जिससे किसी-किसी साल "दिवाली किस दिन है" पर बहस हो जाती है — दूसरे दिन शाम को अमावस्या सिर्फ़ कुछ मिनट रहे, तो एक पंचांग पहला दिन देता है और कोई दूसरा।

हमारी गणना यही नियम लागू करती है। हमने Drik Panchang के कई शहरों के दिवाली-कैलेंडर से अपनी तारीख़ें मिलाकर देखी हैं, ताकि आपको जो दिखे वह किसी बड़े पंचांग से अलग न पड़े।

दिवाली हर साल अलग तारीख़ पर क्यों आती है

चांद्र वर्ष के बारह महीने लगभग 354 दिन के होते हैं, जबकि सौर वर्ष 365 दिन का। इसलिए हर साल दिवाली पिछले साल से लगभग ग्यारह दिन पहले आ जाती है। यह खिसकाव अनंत नहीं चलता — लगभग हर ढाई-तीन साल में एक अधिक मास जुड़ता है, और जिस बार वह दो दिवालियों के बीच पड़ता है, उस बार दिवाली पिछले साल से लगभग उन्नीस दिन आगे चली जाती है। हमारी गणना में आगे के कई दशकों तक दिवाली 17 अक्टूबर से 15 नवंबर के बीच ही पड़ती है।

इसीलिए 'diwali 2026' की तारीख़ पिछले साल वाली नहीं होती, और "हर बार नवंबर में" या "हर बार अक्टूबर में" जैसी याद धोखा दे सकती है। ऊपर की सारणी के नीचे आगे के वर्षों की तारीख़ें इसी कारण दी गई हैं।

लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त — उसके हिस्से

सारणी में कई समय दिए हैं। हर एक का अर्थ यह है:

नामक्या हैकिसके लिए
प्रदोष कालसूर्यास्त से रात का पहला पाँचवाँ भाग (लगभग ढाई घंटे)लक्ष्मी पूजा का मुख्य काल; दीपदान
वृषभ कालजब पूर्व क्षितिज पर वृषभ लग्न उदय होस्थिर लग्न — परंपरा में "लक्ष्मी स्थिर रहे" की भावना
लक्ष्मी पूजा मुहूर्तप्रदोष, वृषभ लग्न और अमावस्या — तीनों एक साथघर-परिवार की लक्ष्मी पूजा का सबसे अच्छा समय
अमावस्या तिथितिथि का आरंभ और अंतपूजा अमावस्या के भीतर ही
महानिशीथ कालआधी रात के आसपास का एक मुहूर्तकाली पूजा, साधना, रात्रि-जागरण
सिंह कालआधी रात के बाद उदय होने वाला सिंह लग्नदूसरा स्थिर लग्न — निशीथ की पूजा के लिए

वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ — ये चार स्थिर लग्न कहलाते हैं। शाम को जो स्थिर लग्न उदय होता है वह वृषभ है, इसलिए दिवाली की शाम का मुहूर्त प्रायः वृषभ लग्न पर बनता है। हर शहर में लग्न अलग घड़ी पर उदय होता है — जितना पश्चिम का शहर, उतना देर से — इसलिए मुंबई और कोलकाता का लक्ष्मी पूजा मुहूर्त एक नहीं होता। 'lakshmi puja muhurat' खोजते समय शहर का ध्यान इसी वजह से ज़रूरी है।

कई परिवार मुहूर्त के साथ उस शाम का चौघड़िया भी देखते हैं। चौघड़िया अलग पद्धति है — हमारे "आज का चौघड़िया" पन्ने पर दिवाली के दिन का चौघड़िया भी उसी शहर से मिल जाता है। पर दोनों में टकराव लगे, तो लक्ष्मी पूजा के लिए प्रदोष और स्थिर लग्न की परंपरा पुरानी और मुख्य है।

अगर मुहूर्त का समय निकल जाए

यह बहुत आम चिंता है — दुकान देर से बंद हुई, मेहमान आ गए, या रास्ते में देर हो गई। परंपरा इसमें दबाव नहीं डालती।

  • प्रदोष काल पूरा ही शुभ है। वृषभ लग्न वाला हिस्सा सबसे अच्छा माना जाता है, पर प्रदोष के बाक़ी हिस्से में की गई पूजा भी पूरी पूजा है।
  • अमावस्या के भीतर रहिए। रात में भी अमावस्या चल रही हो, तो पूजा की जा सकती है; महानिशीथ और सिंह काल इसी के लिए दिए हैं।
  • श्रद्धा और नियम पहले। घबराहट में जल्दी-जल्दी की गई पूजा से शांत मन से समय पर हुई सरल पूजा अच्छी है।

घर पर लक्ष्मी पूजा — सरल विधि

यह विधि उन परिवारों के लिए है जो घर पर, बिना पंडित के, सरल पूजा करते हैं। अपनी कुल-परंपरा हो, तो वही मानिए।

  1. दिन में सफ़ाई और सजावट। घर साफ़ हो, दरवाज़े पर रंगोली और तोरण। शाम से पहले स्नान।
  2. पूजा की जगह। पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बैठें। चौकी पर लाल या पीला कपड़ा, उस पर गणेश जी और लक्ष्मी जी की प्रतिमा या चित्र — किसे किस ओर रखें, इसकी रीति घर-घर अलग है; अपनी कुल-परंपरा मानिए।
  3. कलश। जल भरा कलश, उस पर आम के पत्ते और नारियल।
  4. संकल्प और गणेश पूजा। हाथ में जल लेकर मन में नाम, स्थान और "लक्ष्मी पूजा" का संकल्प; फिर 'ॐ गं गणपतये नमः' से गणेश जी की पूजा — रोली, अक्षत, फूल, दूर्वा।
  5. लक्ष्मी पूजा। रोली-अक्षत, कमल या लाल फूल, खील-बताशे, मिठाई, और घी का दीपक। मंत्र: 'ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः' — 108 बार, या जितना सहज हो। जो कर सकें, वे श्री सूक्त का पाठ करें।
  6. कुबेर और बही-खाता। व्यापारी परिवार इसी समय नई बही, क़लम और तिजोरी की पूजा करते हैं — गुजरात में इसे चोपड़ा पूजन कहते हैं। कुबेर मंत्र: 'ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा'।
  7. आरती और दीपदान। लक्ष्मी जी की आरती, फिर घर के हर कोने, रसोई, पानी के स्थान और दरवाज़े पर दीये।

ध्यान रहे: दीयों और पटाख़ों के पास बच्चों और बुज़ुर्गों का ध्यान रखिए, पर्दों से दूर दीये रखिए, और पानी की बाल्टी पास रखिए। त्योहार की ख़ुशी सबकी सुरक्षा के साथ ही पूरी होती है।

दिवाली पर जुआ, उधार और टोटके — एक साफ़ बात

कई जगह दिवाली की रात जुआ खेलने की लोक-रीति चलती है, और बहुत से "दिवाली के टोटके" भी फैलाए जाते हैं। कुंडली मिलान ज्योतिष की टीम इनकी सलाह नहीं देती। लक्ष्मी पूजा का अर्थ घर में श्रम, ईमानदारी और व्यवस्था का सम्मान है — इसीलिए परंपरा सफ़ाई, हिसाब-किताब की नई शुरुआत, दान और दीपदान पर ज़ोर देती है। उपाय वही जो हानि-रहित और सरल हों: मंत्र, पाठ, दान, और घर में शांति।

हर शहर का मुहूर्त अलग क्यों

भारत की घड़ी एक है, पर सूर्यास्त और लग्न का उदय हर शहर में अलग समय पर होता है। पूर्व के शहरों — गुवाहाटी, कोलकाता — में सूर्यास्त जल्दी होता है, पश्चिम के — अहमदाबाद, मुंबई — में देर से। इसका असर दो तरह से पड़ता है:

  • प्रदोष काल खिसकता है। जिस शहर में सूर्यास्त देर से है, वहाँ प्रदोष भी देर से शुरू होगा।
  • लग्न का उदय खिसकता है। वृषभ लग्न भी पश्चिम के शहरों में घड़ी के हिसाब से देर से उदय होता है। इसीलिए लक्ष्मी पूजा मुहूर्त का पूरा पट्टा शहर-दर-शहर आगे-पीछे होता है।

कभी-कभी, जब अमावस्या दूसरे दिन शाम को कुछ ही मिनट रहे, तो दो शहरों में दिवाली की तारीख़ भी अलग हो सकती है। इसलिए 'diwali date' देखते समय भी अपना शहर चुनना अच्छा है। गाँव में हों तो नज़दीकी शहर चुनिए — 20-30 किलोमीटर से समय में आम तौर पर एक-दो मिनट का ही अंतर आता है।

दिवाली की रात का ज्योतिषीय अर्थ

अमावस्या को सूर्य और चंद्र एक ही अंश पर होते हैं — चंद्र दिखता नहीं। ज्योतिष में चंद्र मन का कारक है, इसलिए अमावस्या को भीतर की ओर देखने, अँधेरे में दीप जलाने और नई शुरुआत की रात माना गया है। कार्तिक की इस अमावस्या पर सूर्य तुला राशि में होता है — वह राशि जिसमें सूर्य नीच का माना जाता है, यानी बाहर की रोशनी सबसे कमज़ोर। शायद इसीलिए इस रात दीयों की पंक्ति — दीपावली — का इतना महत्व है: बाहर की रोशनी कम हो, तो घर-घर अपनी रोशनी जलाई जाती है।

तुला का स्वामी शुक्र है — सुख, सौंदर्य और गृहस्थ का कारक। लक्ष्मी पूजा का घर-परिवार, दाम्पत्य और व्यवस्था से इतना गहरा जुड़ाव इसी से भी समझ आता है।

दिवाली से पहले और बाद के दिन

लक्ष्मी पूजा पाँच दिनों के दीपोत्सव का बीच का और सबसे बड़ा दिन है। उससे पहले धनतेरस और नरक चतुर्दशी आती हैं, बाद में गोवर्धन पूजा और भाई दूज। इन सबकी तारीख़ें अलग-अलग तिथि-नियमों से तय होती हैं — कभी दो पर्व एक ही दिन पड़ जाते हैं, कभी बीच में एक ख़ाली दिन आ जाता है। हर दिन की तारीख़ और उसका मुख्य समय हमारे "दीपावली के पाँचों दिन" वाले पन्ने पर, इसी तरह आपके शहर से, दिया है।

लक्ष्मी कहाँ टिकती है — घर का मेल

परंपरा कहती है कि लक्ष्मी वहाँ टिकती है जहाँ घर में कलह न हो, मेहनत हो और सबका सम्मान हो। ज्योतिष इसे घर के लोगों की कुंडलियों से जोड़ता है — दूसरा भाव (परिवार और वाणी), चौथा भाव (घर का सुख), ग्यारहवाँ (आय), और चल रही दशा। कभी-कभी घर में पैसा आता है पर टिकता नहीं, या पूजा के बाद भी मन अशांत रहता है — ऐसे समय अक्सर घर के दो लोगों का समय और स्वभाव आपस में टकरा रहा होता है।

इसीलिए कुंडली मिलान ज्योतिष की टीम ने गृह-शांति कुंडली मिलान बनाया है — घर के किन्हीं दो सदस्यों की कुंडली साथ पढ़कर वह स्वभाव का मेल, चौथा भाव, वाणी, चल रही दशा और शनि का गोचर देखता है, और दोनों के लिए अलग-अलग सरल उपाय बताता है। पति-पत्नी साथ बैठकर लक्ष्मी पूजा करते हैं; उनका आपसी तालमेल कैसा है, यह पति-पत्नी कुंडली मिलान बताता है। रिपोर्ट कभी किसी को दोषी नहीं ठहराती — जहाँ ध्यान चाहिए, वहाँ उपाय बताती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

दिवाली कब है 2026 में?

इस वर्ष की दिवाली — यानी लक्ष्मी पूजा — की तारीख़ और आपके शहर का मुहूर्त इस पन्ने के सबसे ऊपर की सारणी में है। तारीख़ उस दिन की है जिस दिन प्रदोष काल में अमावस्या हो, और मुहूर्त उसी शहर के सूर्यास्त और वृषभ लग्न से गिना गया है।

लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त कब से कब तक है?

सबसे अच्छा समय वह है जब प्रदोष काल, वृषभ लग्न और अमावस्या — तीनों एक साथ हों; सारणी में यही "लक्ष्मी पूजा मुहूर्त" है। यह आम तौर पर सूर्यास्त के कुछ देर बाद शुरू होकर लगभग दो घंटे चलता है, और हर शहर में घड़ी के हिसाब से अलग होता है।

दिवाली कब की है — दो दिन अमावस्या हो तो कौन-सा दिन?

नियम यह है कि जिस दिन प्रदोष में अमावस्या हो, वही दिवाली। दोनों दिन हो, तो दूसरा दिन तभी जब उस शाम सूर्यास्त के बाद कम से कम 24 मिनट (एक घटी) अमावस्या रहे; वरना पहला दिन। हमारी सारणी यही नियम लगाकर तारीख़ बताती है।

प्रदोष काल क्या है?

सूर्यास्त से शुरू होकर रात का पहला पाँचवाँ भाग प्रदोष काल कहलाता है — रात के पंद्रह मुहूर्तों में से पहले तीन। दिवाली के आसपास यह लगभग ढाई घंटे का होता है। दीपदान और लक्ष्मी पूजा इसी काल में करने की परंपरा है।

महानिशीथ काल में क्या करते हैं?

महानिशीथ आधी रात के आसपास का एक मुहूर्त है। बंगाल में काली पूजा इसी समय होती है, और साधना करने वाले भी यही समय चुनते हैं। घर की सामान्य लक्ष्मी पूजा के लिए प्रदोष काल ही मुख्य है।

क्या हर शहर में दिवाली का मुहूर्त अलग होता है?

हाँ। सूर्यास्त और वृषभ लग्न का उदय हर शहर में अलग घड़ी पर होता है, इसलिए मुहूर्त भी अलग होता है — पूर्व और पश्चिम के शहरों में आधे घंटे से ज़्यादा तक। बहुत कम वर्षों में तारीख़ भी शहर-दर-शहर बदल सकती है। इसीलिए सारणी में अपना शहर चुनिए।

अगले वर्षों में दिवाली कब है?

सारणी के नीचे "अगले वर्षों में दिवाली" में आपके शहर के लिए आगे के कई वर्षों की लक्ष्मी पूजा की तारीख़ दी है। किसी एक वर्ष का पूरा मुहूर्त देखना हो, तो "अगला वर्ष" दबाते जाइए।

दोनों का जन्म-विवरण भरिए

तारीख़, समय और जगह — तीनों जितने सही होंगे, मिलान उतना ही सटीक। समय याद न हो तो भी चल जाएगा।

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