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शादी के लिए कितने गुण मिलने चाहिए — अंक से आगे की पूरी बात

18 गुण को लोग पास-फ़ेल की रेखा मान लेते हैं। असल जवाब इसमें छिपा है कि कौन-सा कूट कम है, उस पर शास्त्र की छूट लगी या नहीं, और बाक़ी कुंडली क्या कहती है।

सीधा जवाब: परंपरा में 36 में से कम से कम 18 गुण मिलान योग्य गिने जाते हैं; 25 पार हो तो अच्छा, 33 पार हो तो बहुत अच्छा कहा जाता है। पर शादी के लिए कितने गुण मिलने चाहिए, इसका पूरा जवाब अकेली संख्या नहीं देती। देखना यह है कि कौन-से कूट कम हैं, नाड़ी और भकूट पर शास्त्र की छूट लगी या नहीं, और मांगलिक स्थिति क्या है।

रिश्ते की बात चलते ही घर में पहला सवाल यही उठता है — "कितने गुण मिले?" किसी घर में 17 सुनते ही बात ठंडी पड़ जाती है, तो कहीं 31 सुनकर कोई और सवाल पूछा ही नहीं जाता। गूगल पर भी लोग 'shadi ke liye kitne gun milne chahiye' या 'minimum kitne gun milne chahiye' लिखकर एक पक्की संख्या ढूँढते हैं। कुंडली मिलान ज्योतिष की टीम ने यह लेख उसी संख्या को खोलकर दिखाने के लिए लिखा है: 36 गुण बनते कैसे हैं, प्रचलित पट्टियों का असली अर्थ क्या है, एक ही अंक दो जोड़ियों में अलग बात क्यों कहता है, और कम गुण निकलें तो बात आगे कैसे बढ़े। एक बात शुरू में ही साफ़ रहे — कम गुण निकलना विवाह पर रोक नहीं है।

36 गुण कहाँ से आते हैं — आठ कूट, आठ अलग वज़न

अष्टकूट (आठ कसौटियों वाला मिलान) में हर कूट को उसके महत्व के हिसाब से अंक मिले हैं। सबसे हल्के वर्ण को 1, सबसे भारी नाड़ी को 8। इन्हीं आठ अंकों का जोड़ 36 है, और "गुण" इन्हीं अंकों का नाम है। सारे कूट वर और वधू के जन्म के क्षण के चंद्रमा से गिने जाते हैं। ज्योतिष में चंद्रमा से मन देखा जाता है, और विवाह हर दिन दो मनों का साथ निभाना है।

कई लोग 'kitne gun milne chahiye kundli mein' पूछते हैं, पर उस सवाल से पहले यह जानना काम का है कि कौन-सा अंक किस बात का है:

कूटअंककिससे गिना जाता हैयहाँ अंक कटें तो सरल अर्थ
वर्ण1चंद्र-राशिज़िम्मेदारी उठाने के तरीक़े में फ़र्क़
वश्य2चंद्र-राशिएक-दूसरे की बात मान लेने में खिंचाव कम
तारा3जन्म-नक्षत्रएक-दूसरे के लिए शुभता कम — हमारी गणना में डेढ़ से नीचे नहीं जाता
योनि4जन्म-नक्षत्रनिकटता और शरीर की लय में कम सहजता
ग्रह मैत्री5राशि-स्वामी ग्रहसोचने और फ़ैसले लेने के ढंग में दूरी
गण6जन्म-नक्षत्रग़ुस्से और प्रतिक्रिया का ढंग अलग
भकूट7दोनों राशियों की दूरीआपसी लगाव और परिवार के आगे बढ़ने पर ध्यान
नाड़ी8जन्म-नक्षत्रदोनों की शरीर-प्रकृति एक-सी
कुल36

इस तालिका से दो बातें निकलती हैं।

पहली — 15 अंक राशि से, 21 नक्षत्र से। वर्ण, वश्य, ग्रह मैत्री और भकूट चंद्र-राशि पर टिके हैं, कुल 15 अंक। तारा, योनि, गण और नाड़ी जन्म-नक्षत्र पर, कुल 21 अंक। इसलिए नक्षत्र में ज़रा-सी भूल अंक को बहुत हिला देती है। रात बारह के बाद जन्म हुआ हो और पत्री में पिछले दिन की तारीख़ चढ़ी हो — ऐसी छोटी चूक से पूरा नक्षत्र बदल सकता है।

दूसरी — तीन कूट मिलकर आधे से ज़्यादा। नाड़ी, भकूट और गण मिलकर 21 अंक रखते हैं। बाक़ी पाँच कूट मिलकर 15। जिस जोड़ी में ये तीन भारी कूट पूरे हैं, उसके हाथ में शुरुआत से ही 21 अंक हैं। और जिसमें इनमें से एक भी शून्य है, उसका कुल अंक अपने-आप नीचे खिसकता है।

36 में से कितने गुण — प्रचलित पट्टियाँ और हर एक में क्या जाँचें

पंचांग, पंडित और वेबसाइटें गुणों को आम तौर पर चार पट्टियों में पढ़ते हैं; सीमा कहीं-कहीं एक-आध अंक खिसकती है:

गुणआम तौर पर क्या कहा जाता हैइस पट्टी में पहली जाँच
18 से कमकम मेलनाड़ी या भकूट शून्य है क्या, और उस पर छूट लगी या नहीं
18 से 24ठीक-ठाक, निभने लायककटे हुए अंक भारी कूटों के हैं या हल्के कूटों के
25 से 32अच्छा मेलनाड़ी अलग है या नहीं, मांगलिक स्थिति क्या है
33 से 36बहुत अच्छामांगलिक, सातवाँ भाव और दशा — जो गुणों में गिने ही नहीं जाते

जो लोग '36 me se kitne gun' मिलना ठीक है, यह खोजते हैं, उनके लिए एक और बात काम की है — असल में कितनी जोड़ियाँ किस पट्टी में आती हैं। हमारी टीम ने अपने ही मिलान-इंजन से एक सीधी गिनती की। हर नक्षत्र के चार हिस्से होते हैं, जिन्हें पद कहते हैं; इस तरह कुल 108 पद बनते हैं, और चंद्रमा हर पद में लगभग बराबर समय रहता है। तो वर के हर पद को वधू के हर पद से मिलाया गया — कुल 11,664 जोड़ियाँ। नतीजा यह रहा:

पट्टीसौ जोड़ियों में लगभग कितनी
18 से कम18
18 से 2426 से 27
25 से 3246
33 से 369

यानी बीच का अंक 25 के आसपास है। 18 से कम का अंक कोई अनोखी बात नहीं — लगभग हर पाँचवीं-छठी जोड़ी में आता है। और 33 या उससे ऊपर का अंक लगभग हर ग्यारह में एक जोड़ी को मिलता है। यह गिनती बस यह दिखाती है कि अंक अकेले कितना कम बताता है।

18 का नियम कहाँ से आया — शास्त्र और बाद की परिपाटी

कूट-मिलान के नियम मुहूर्त ग्रंथों में हैं। मुहूर्त चिंतामणि के विवाह-प्रकरण में कूट, उनकी गिनती और दोषों के अपवाद मिलते हैं। ग्रह मैत्री जिस नैसर्गिक (स्वाभाविक) मित्रता की सारणी पर चलती है, वह बृहत्पाराशर होराशास्त्र में है। पर ये ग्रंथ अंक-पट्टियाँ नहीं बनाते। उनका ज़ोर इस पर है कि कौन-सा दोष बना और उसका परिहार (शास्त्रीय अपवाद) है या नहीं।

18 असल में 36 का आधा है। "आधे से ज़्यादा मेल हो" — इसी सीधी समझ से यह रेखा परंपरा में बैठ गई। 18 से 24, 25 से 32, 33 से 36 वाली पट्टियाँ बाद की प्रचलित परिपाटी हैं, किसी श्लोक का आदेश नहीं। दक्षिण भारत में दस कसौटियों वाला मिलान प्रचलित है, जहाँ अंक जोड़ने की जगह यह गिना जाता है कि कितनी कसौटियाँ मिलीं, और रज्जु जैसी कसौटी अलग से तौली जाती है। इसलिए "विवाह में कितने गुण मिलने चाहिए" का ईमानदार जवाब है: 18 एक उपयोगी इशारा है, फ़ैसला नहीं।

एक ही अंक, अलग-अलग कहानी — कौन-सा कूट कम है, यही असली सवाल

तीन असली गणनाएँ देखिए — तीनों हमारे इंजन से, छूट जाँचकर निकली हैं।

  • जोड़ी क: वर मेष राशि, भरणी नक्षत्र; वधू धनु राशि, पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र (दूसरा पद)।
  • जोड़ी ख: वर तुला राशि, स्वाती नक्षत्र; वधू कन्या राशि, हस्त नक्षत्र।
  • जोड़ी ग: वर वृश्चिक राशि, अनुराधा नक्षत्र; वधू मिथुन राशि, आर्द्रा नक्षत्र।
कूटजोड़ी कजोड़ी खजोड़ी ग
वर्ण (1)101
वश्य (2)220
तारा (3)31.51.5
योनि (4)340
ग्रह मैत्री (5)550.5
गण (6)666
भकूट (7)7 (छूट से)7 (छूट से)0
नाड़ी (8)088
कुल2733.517

जोड़ी क — 27 गुण, पर नाड़ी शून्य। दोनों नक्षत्र मध्य नाड़ी के हैं, राशि और नक्षत्र दोनों अलग, इसलिए कोई छूट नहीं लगती। मेष और धनु की दूरी 5-9 है, जिससे भकूट दोष बनता, पर दोनों राशियों के स्वामी मंगल और गुरु एक-दूसरे के मित्र हैं, इसलिए वह कट गया। अंक "अच्छा मेल" कहता है, जबकि ध्यान की सबसे बड़ी बात — नाड़ी — इसी जोड़ी में है।

जोड़ी ख — 33.5 गुण, कमी हल्के कूटों में। वर्ण में शून्य इसलिए कि वर की राशि का वर्ण वधू से नीचे गिना गया। तारा के आधे अंक कटे। ये दोनों रोज़ के व्यवहार की बातें हैं; इनके लिए अलग से कोई अनुष्ठान ज़रूरी नहीं समझा जाता। यहाँ भी 2-12 का भकूट दोष बनता था, जो शुक्र और बुध की दोस्ती से कट गया।

जोड़ी ग — 17 गुण, पर नाड़ी और गण पूरे। कमी भकूट (6-8 की दूरी, जिस पर छूट नहीं लगी), योनि (मृग और श्वान का स्वाभाविक बैर) और ग्रह मैत्री में है। अंक "कम" कहता है, पर नाड़ी — सबसे भारी कूट — पूरी मिली है।

अब ध्यान दीजिए: 27 वाली और 17 वाली, दोनों जोड़ियों में एक-एक भारी कूट शून्य है। एक में नाड़ी, दूसरी में भकूट। दोनों के उपाय अलग हैं, और दोनों में पूरी कुंडली पढ़ना ज़रूरी है।

कम अंक लगभग हमेशा एक ही इशारा करता है

ऊपर वाली 11,664 जोड़ियों में हमने यह भी देखा कि 18 से कम अंक आता क्यों है। जवाब चौंकाने वाला साफ़ निकला: 18 से कम वाली लगभग हर जोड़ी (सौ में 99) में नाड़ी या भकूट बिना छूट के शून्य था। और जहाँ नाड़ी और भकूट दोनों पूरे थे, वहाँ अंक 18 से नीचे हज़ार में लगभग दो बार ही गया, जबकि लगभग हर सात में छह जोड़ियाँ 25 पार कर गईं।

उलटी बात भी सच है। 25 या उससे ज़्यादा गुण वाली जोड़ियों में भी लगभग हर पंद्रह में एक की नाड़ी शून्य थी। यानी ऊँचा अंक भी नाड़ी दोष छिपा सकता है।

इसलिए कितने गुण मिलने चाहिए, इससे ज़्यादा काम का सवाल है — कौन-से अंक कटे? वर्ण, वश्य, तारा या योनि में कमी हो तो वह समझ और थोड़े लचीलेपन से निभती है। नाड़ी, भकूट या गण में शून्य हो, तो पहले उसकी छूट देखी जाती है, फिर उपाय।

दोष-परिहार — जब शास्त्र ख़ुद शून्य को काट देता है

परिहार का अर्थ है किसी दोष का शास्त्र में लिखा अपवाद। ग्रंथ दोष बताते हैं, तो साथ में यह भी बताते हैं कि किन हालात में वह लागू नहीं होता या हल्का हो जाता है। गुणों की गिनती पर इसका सीधा असर पड़ता है — भकूट और गण की छूट मिलाकर एक ही जोड़ी के 13 अंक तक लौट सकते हैं।

भकूट की छूट

दोनों चंद्र-राशियाँ एक-दूसरे से दूसरी-बारहवीं, छठी-आठवीं या पाँचवीं-नौवीं पड़ें, तो भकूट दोष बनता है। बारह में से छह दूरियाँ इसी में आती हैं, यानी आधी राशि-जोड़ियाँ। इन तीन में से कोई भी बात मिल जाए, तो भकूट के सातों अंक वापस मिलते हैं:

  • दोनों जन्म-नक्षत्रों का स्वामी ग्रह एक ही निकले।
  • दोनों चंद्र-राशियों का मालिक एक ही ग्रह हो — जैसे मेष और वृश्चिक, दोनों मंगल की।
  • दोनों राशियों के मालिक ग्रहों में दोस्ती हो।

दोस्ती हमारी गणना दोनों ओर से तौलती है — दोनों ग्रह एक-दूसरे को मित्र मानें, या एक मित्र माने और दूसरा सम (न मित्र, न शत्रु)। जहाँ किसी एक ओर शत्रुता है, वहाँ छूट नहीं। इसी कारण मेष-धनु (मंगल-गुरु) का दोष कटता है, पर वृश्चिक-मिथुन का नहीं, क्योंकि मंगल की नज़र में बुध शत्रु है। हमारी गिनती में भकूट दोष वाली दस में से लगभग सात जोड़ियों पर कोई न कोई छूट लग जाती है।

नाड़ी की छूट

दोनों नक्षत्र एक ही नाड़ी (आदि, मध्य या अन्त्य) के हों तो नाड़ी दोष बनता है — मोटे तौर पर हर तीन में एक जोड़ी में। तीन हालात में शास्त्र इसे हल्का पढ़ता है। पहला — चंद्र दोनों का एक ही राशि में हो, नक्षत्र भले अलग। दूसरा — नक्षत्र एक हो, पर वह दो राशियों में फैला हो और दोनों के चंद्र अलग राशियों में पड़ें। तीसरा — नक्षत्र एक ही हो, पर पद अलग-अलग। उदाहरण: वृषभ राशि में एक का कृत्तिका और दूसरे का रोहिणी नक्षत्र हो, तो दोनों अन्त्य नाड़ी के हैं, पर राशि एक है।

इन तीनों में दोष मिटता नहीं, उसकी धार कम होती है। इसलिए हमारी गणना यहाँ पूरे 8 नहीं, आधे यानी 4 अंक देती है। नक्षत्र और पद दोनों एक हों, तो कोई छूट नहीं — तब नाड़ी शून्य रहती है, भले बाक़ी सारे कूट पूरे हों और कुल 28 बने।

गण की छूट

राक्षस गण का मेल मनुष्य गण से हो तो 0, देव गण से हो तो 1 अंक मिलता है। राक्षस नाम से घबराइए मत — इस गण के लोग अक्सर दृढ़ होते हैं और मन की बात खुलकर कहते हैं। यहाँ भी वही तीन छूटें लगती हैं जो भकूट पर, और एक चौथी भी: दोनों का चंद्र एक ही राशि में हो। छूट लगे तो पूरे 6। देव और मनुष्य का मेल 5 या 6 देता है — वह दोष नहीं, सामान्य मेल है।

मांगलिक दोष — 36 गुण में नहीं गिना जाता, पर निर्णय में भारी

36 गुण मिलान में मांगलिक दोष का कोई अंक नहीं है। उसे कूटों से अलग, मंगल कहाँ बैठा है इससे पढ़ा जाता है — लग्न, चंद्र और शुक्र से गिनकर 1, 2, 4, 7, 8 या 12वें घर में मंगल हो तो। इसका मतलब है कि 30 गुण वाली जोड़ी में भी किसी एक की कुंडली में बिना छूट का मंगल-दोष बचा हो सकता है, और 19 गुण वाली जोड़ी में दोनों मांगलिक होकर दोष आपस में कट चुका हो सकता है।

हमारी रिपोर्ट में मांगलिक मिलान को 1.2 का भार मिला है — छत्तीस गुणों की पूरी गिनती (1.0) से भी ज़्यादा। दोनों मांगलिक हों, या दोष अपनी ही कुंडली में कट चुका हो (जैसे मंगल अपनी राशि मेष-वृश्चिक में, या उच्च राशि मकर में), तो यह मत अनुकूल पढ़ता है। दोष किसी एक ओर बचा हो, तो उसके उपाय लिखे जाते हैं। यहाँ किसी व्यक्ति पर उँगली उठाने की बात नहीं; यह दोनों की साझा ज़िम्मेदारी है।

पूरे 36 गुण — क्या यही सबसे अच्छा मिलान है?

36 में से 36 गुण बहुत विरल हैं। हमारी 11,664 जोड़ियों में ऐसा 72 बार हुआ — हज़ार में लगभग छह। और ये सब सिर्फ़ पाँच नक्षत्र-जोड़ियों से आए:

  • वृषभ राशि में वर का मृगशिरा, वधू का रोहिणी।
  • सिंह राशि में मघा और पूर्वा फाल्गुनी — किसी भी क्रम में।
  • वृश्चिक राशि में अनुराधा और ज्येष्ठा — किसी भी क्रम में।

पाँचों में दोनों का चंद्र एक ही राशि में, पास-पास के नक्षत्रों में है, और दोनों नक्षत्रों की योनि (पशु-प्रतीक) एक है। एक और बात दिलचस्प है: इनमें से चार जोड़ियों में राक्षस गण वाला गण दोष बनता था, जो "एक ही राशि" वाली छूट से कटकर पूरे 6 बने। यानी कई बार पूरे 36 भी परिहार के बाद ही बनते हैं। और क्रम बदल दें — वर रोहिणी, वधू मृगशिरा — तो अंक 35 रह जाता है।

36 गुण का अर्थ है कि चंद्र से दिखने वाला मन का मेल पूरा है। पर मांगलिक स्थिति, सातवाँ भाव, शुक्र-गुरु और दशा इसमें आते ही नहीं। एक बात और: जब दोनों की चंद्र-राशि एक हो, तो शनि की साढ़े साती दोनों पर एक साथ चलती है। यह डर की बात नहीं, जानकारी की है — पहले से पता हो तो उस दौर में एक-दूसरे का सहारा बनना आसान होता है। इसलिए 36 मिलने पर भी पूरा मिलान पढ़ना उतना ही ज़रूरी है।

लड़का-लड़की का क्रम — वही दो कुंडलियाँ, अलग अंक

'kitne gun milne chahiye ladka ladki ke' खोजने वाले अक्सर यह नहीं जानते कि अष्टकूट में वर और वधू की जगह बदलने से अंक बदल सकते हैं। तीन कूट क्रम देखते हैं:

  1. वर्ण — पूरा 1 अंक तभी, जब वर की राशि का वर्ण वधू से नीचे न हो। ऊपर की जोड़ी ख में इसी नियम से शून्य आया; जगह बदल दें तो वहीं 1 आता।
  2. वश्य — इसकी सारणी दोनों ओर एक-सी नहीं। वर वृश्चिक और वधू मेष हो तो 2, वर मेष और वधू वृश्चिक हो तो 1।
  3. गण — देव गण का लड़का और मनुष्य गण की लड़की हो तो पूरे 6; लड़का मनुष्य और लड़की देव हो तो 5।

तारा दोनों दिशाओं से गिनी जाती है, इसलिए उस पर क्रम का असर नहीं। कुल मिलाकर क्रम बदलने से एक-दो अंक का फ़र्क़ आ सकता है। इसलिए फ़ॉर्म में वर और वधू के ख़ाने सही भरिए, और दो जगह मिलान करवाया हो तो क्रम मिलाकर देख लीजिए।

कम गुण मिलने पर शादी — घबराने की जगह यह क्रम

जो परिवार 'shadi ke liye kitne gun milna jaruri hai' पूछते हुए यहाँ तक आए हैं, उनके लिए सबसे काम की बात यह है: कम गुण मिलने पर शादी की बात रुकती नहीं, बस पढ़ाई गहरी होती है। यह क्रम अपनाइए:

  1. जन्म-विवरण पक्का कीजिए। तारीख़, समय और जगह फिर से देखिए। नक्षत्र बदल जाए तो 21 अंक तक हिल सकते हैं।
  2. कमी कहाँ है, यह देखिए। भारी कूट (नाड़ी, भकूट, गण) या हल्के कूट (वर्ण, वश्य, तारा, योनि)।
  3. छूट जाँचिए। भारी कूट के शून्य पर ऊपर लिखी कोई छूट लगी या नहीं।
  4. मंगल की स्थिति दोनों ओर देखिए, और उसकी छूट भी।
  5. पूरी कुंडली पढ़वाइए — सातवाँ घर (जीवनसाथी), शुक्र-गुरु (विवाह के कारक), नवांश (हर राशि के नौ भाग करके बनी विवाह की कुंडली) और दशा (किसका कौन-सा दौर)। गुण कम हों, तब भी ये अपनी अलग बात कहते हैं।
  6. जो बचे, उसका उपाय तय कीजिए — और बड़ा फ़ैसला हो तो किसी अनुभवी ज्योतिषी के सामने दोनों की पत्री एक साथ रखिए।

जिस कूट में कमी हो, उसका उपाय

नाड़ी शून्य हो तो — परंपरा शिव की उपासना कहती है। हर सोमवार शिवलिंग पर जल अर्पित कीजिए, अपनी क्षमता के अनुसार अनाज दान कीजिए, और यह मंत्र जपिए:

"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥"

नाड़ी को परंपरा सेहत और संतान से जोड़ती है। इसलिए साफ़ कहें: ये मंत्र और दान डॉक्टर की सलाह के साथ चलें, उसके बदले में नहीं। शादी से पहले दोनों अपनी सामान्य मेडिकल जाँच करवा लें, तो मन भी हल्का रहता है।

भकूट बिना छूट के शून्य हो तो — दोनों राशि-स्वामी ग्रहों के बीज मंत्र, और शिव-पार्वती की संयुक्त आराधना, जिन्हें गृहस्थ जीवन की सबसे सुंदर जोड़ी माना गया है। सोमवार की शाम पति-पत्नी बनने वाले दोनों साथ बैठकर दीया जलाएँ और जपें:

"ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः"

गण में कमी हो तो — बुधवार को गणपति की पूजा और यह मंत्र:

"ॐ गं गणपतये नमः"

व्यवहार में एक छोटा नियम भी: तकरार गरम हो तो दोनों में से कोई कह दे — "अभी नहीं, शाम को बात करेंगे।" यह पीछे हटना नहीं, रिश्ते को बचाना है।

ग्रह मैत्री कम हो तो — दोनों राशि-स्वामियों के मंत्र। जैसे ऊपर की जोड़ी ग में मंगल और बुध:

"ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः"

"ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः"

किसी एक की कुंडली में मंगल-दोष बचा हो तो — हनुमान चालीसा मंगलवार के दिन पढ़िए, और साथ में ऊपर लिखा भौम-मंत्र।

उपाय कैसे करें

  • हर मंत्र की एक माला यानी 108 बार रोज़; 43 दिन लगातार, बीच में बिना छोड़े।
  • उपवास तभी रखें, जब शरीर साथ दे।
  • रत्न की बात आए, तो पहले किसी अनुभवी को पूरी पत्री दिखाइए — जिस ग्रह को शांत करना है, उसी का रत्न पहन लेने से उलटा असर हो सकता है।
  • कोई भी उपाय नतीजे की गारंटी नहीं देता। नियम से और मन लगाकर किया गया उपाय सहारा बनता है; रिश्ता फिर भी आपसी आदर और बातचीत से ही चलता है।

हमारी रिपोर्ट गुणों को कितना भार देती है — और निर्णय कैसे बनता है

हमारे कुंडली मिलान में छत्तीस गुण कई आवाज़ों में से एक आवाज़ भर हैं। निर्णय 38 गणनाओं को उनके शास्त्रीय भार से तौलकर बनता है। छत्तीसों गुणों की गिनती का भार 1.0 है, जबकि सबका कुल भार लगभग 30 — यानी अकेली गिनती पूरे निर्णय का लगभग साढ़े तीन प्रतिशत है। नाड़ी का अपना अलग मत भी है (भार 1.3, सबसे भारी), मांगलिक मिलान का 1.2, भकूट और दाम्पत्य-स्थिरता का 1.1, नवांश का 1.0, गण का 0.9। बाक़ी में संतान-पक्ष, शुक्र-गुरु का बल, दशा-काल, दशकूट के रज्जु-वेध जैसी गणनाएँ हैं।

सब तौलकर सार चार शब्दों में से एक पर आता है — उत्तम मेल, शुभ मेल, मध्यम मेल, या ध्यान देने योग्य। पर कुछ नियम औसत में नहीं घुलते:

  • नाड़ी बिना छूट के शून्य हो, तो सार "मध्यम मेल" पर ही रुकता है।
  • साथ में भकूट भी शून्य हो, या मंगल-दोष किसी एक ओर बचा हो, तो सार सबसे नीची पट्टी में आता है।
  • भकूट अकेला बिना छूट के शून्य हो, तो भी सार "मध्यम मेल" पर रुकता है।
  • गण शून्य हो तो "शुभ मेल" तक ही; किसी एक ओर प्रबल मंगल-दोष हो तो "मध्यम" तक ही।

इन चारों में से किसी भी शब्द का अर्थ "विवाह मत कीजिए" नहीं है। सबसे नीची पट्टी भी बस इतना कहती है कि कुछ बातों पर उपाय और किसी अनुभवी की राय चाहिए, और वहीं साफ़ लिखा रहता है कि आख़िरी फ़ैसला वर, वधू और दोनों परिवारों का है।

जब अंक और बाक़ी गणनाएँ अलग बोलें

रिपोर्ट गुणों की गिनती को बाक़ी गणनाओं से अलग तौलकर भी देखती है। दोनों में बड़ा अंतर हो, तो एक अलग वाक्य छपता है — कम गुण पर कि "केवल गुण देखकर इस मेल को कम आँकना ठीक नहीं होगा", और ऊँचे गुण पर कि "ऊँची गिनती इन बातों को ढक नहीं देती", उन बातों के नाम सहित।

यह नियम एक असली अनुभव से बना। साठ बनाई गई जोड़ियों पर जाँच में चौबीस बार अकेला अंक और पूरी तौल अलग-अलग बात कह रहे थे। एक जोड़ी के 16.5 गुण थे — पर नाड़ी अलग थी, मांगलिक दोष निरस्त था और गण मेल खाते थे। सिर्फ़ अंक देखने वाला परिवार उसे "कम" समझता। यह कोई वादा नहीं कि हर 16.5 वाली जोड़ी ऐसी होगी; बस इतना कि अंक के पीछे की बात पढ़े बिना फ़ैसला अधूरा है।

जन्म-समय की पक्काई

रिपोर्ट दोनों के जन्म-समय को आधा घंटा आगे और पीछे खिसकाकर फिर गिनती है। अंक वही रहें, तो सार भरोसे लायक़ है; अंक हिलें, तो रिपोर्ट पहले समय पक्का करने को कहती है। समय पता न हो, तो वह दिन के बारह बजे का समय मानती है और लग्न-भाव वाली गणनाओं का वज़न घटाकर उन्हें आगे रखती है जो लग्न पर नहीं टिकतीं — छत्तीस गुण, नाड़ी, भकूट, गण। पर ये भी चंद्र के नक्षत्र पर टिकी हैं, और चंद्र लगभग एक दिन में एक नक्षत्र पार कर लेता है। इसलिए सार यह भी बताता है कि उस दिन चंद्र एक ही नक्षत्र में रहा या बदला; बदला हो, तो समय मिलते ही दोबारा मिलान करवाने को कहता है।

विवाह हो चुका हो तो

कई बार गुणों की बात शादी के बाद उठती है — किसी रिश्तेदार ने कह दिया, "तुम्हारे तो 15 ही गुण थे।" तब सवाल यह रहता है कि मन कहाँ टकराता है और कैसे सँभले। पति-पत्नी कुंडली मिलान इसी के लिए है। वह दोनों का चंद्र और स्वभाव-कूट, मंगल, जीवनसाथी का सातवाँ घर, विवाह के कारक शुक्र-गुरु, बोलचाल का भाव, और आज चल रही दशा व शनि का गोचर पढ़ता है; फिर दोनों के लिए उपाय और हफ़्ते भर का क्रम देता है। दोष किसी एक के सिर नहीं डाला जाता।

सीधी बात यह है कि दो लोगों का मेल एक कुंडली से नहीं दिखता। कौन-सा शून्य शास्त्र ही काट देता है, किस पर उपाय लगाना है, और कौन-सी कमी रोज़ की समझ से अपने-आप सँभल जाती है — यह तभी दिखता है जब दोनों पत्रियाँ आमने-सामने हों। विवाह से पहले विवाह कुंडली मिलान, और विवाह के बाद पति-पत्नी कुंडली मिलान बनवाइए। भुगतान के बाद पूरा परिणाम साइट पर तुरंत खुलता है; पूरी PDF में दोनों की अपनी कुंडली, हर कूट और दोष की छूट, विवाह-काल और उपायों का पूरा विधान है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

शादी के लिए कितने गुण मिलने चाहिए?

परंपरा में 36 में से 18 या उससे ज़्यादा गुण मिलान योग्य गिने जाते हैं; 25 पार को अच्छा और 33 पार को बहुत अच्छा कहा जाता है। पर यह पट्टी बाद की परिपाटी है, ग्रंथ का आदेश नहीं। ज़्यादा ज़रूरी यह है कि नाड़ी और भकूट पूरे हैं या उन पर छूट लगी है, और मांगलिक स्थिति क्या है।

18 गुण मिलने पर शादी करें या नहीं?

18 गुण पर शादी की बात आगे बढ़ाई जा सकती है — यह प्रचलित सीमा के भीतर है। पर देख लीजिए कि कटे हुए अंक किस कूट के हैं। नाड़ी या भकूट बिना छूट के शून्य हो, तो उसका उपाय और पूरी कुंडली की पढ़ाई साथ चलनी चाहिए। हल्के कूटों में कमी हो, तो वह समझ से निभती है।

कम गुण मिलने पर शादी हो सकती है क्या?

हाँ। कम गुण कोई रोक नहीं, ध्यान से पढ़ने का संकेत है। पहले जन्म-विवरण पक्का कीजिए, फिर देखिए कि नाड़ी, भकूट या गण में शून्य है या नहीं और उस पर शास्त्र की छूट लगी या नहीं। जो दोष बचा रहे, शास्त्र उसका उपाय भी बताता है। हमारी रिपोर्ट किसी भी अंक पर विवाह से मना नहीं करती।

36 में से 36 गुण मिलना सबसे अच्छा है क्या?

पूरे 36 का अर्थ है कि चंद्र से दिखने वाला मन का मेल पूरा है। यह बहुत विरल है — हमारी गिनती में हज़ार जोड़ियों में लगभग छह। पर मांगलिक दोष, सातवाँ भाव और दशा गुणों में आते ही नहीं, इसलिए 36 पर भी पूरा मिलान पढ़ना ज़रूरी है। हमारी गणना में ऐसी हर जोड़ी की चंद्र-राशि एक निकली, इसलिए साढ़े साती भी दोनों पर साथ चलती है।

गुण 28 हैं पर नाड़ी दोष है, तो क्या करें?

पहले देखिए कि नाड़ी पर कोई छूट लगी या नहीं — दोनों का चंद्र एक राशि में हो, या नक्षत्र एक होकर राशि या पद अलग हो। छूट न लगे, तो सोमवार की शिव-आराधना, अनाज का दान और महामृत्युंजय मंत्र परंपरा में बताए गए हैं। ऊँचे गुण नाड़ी दोष को नहीं ढकते, इसलिए हमारी रिपोर्ट ऐसे में सार "मध्यम मेल" पर रोक देती है।

शादी के बाद पता चला कि गुण कम थे, अब क्या करें?

चिंता की कोई ज़रूरत नहीं। विवाह के बाद देखने की बात यह है कि आज दोनों का मन कहाँ टकराता है और किसका समय भारी चल रहा है। पति-पत्नी कुंडली मिलान दोनों का स्वभाव, मंगल, सातवाँ घर, मन और अभी की दशा व शनि का गोचर पढ़कर उपाय और हफ़्ते भर का क्रम देता है, दोष किसी एक पर डाले बिना।

क्या लड़का-लड़की की जगह बदलने से गुण बदल जाते हैं?

हाँ, एक-दो अंक तक। वर्ण में देखा जाता है कि वर का वर्ण वधू से नीचे तो नहीं; वश्य की सारणी दोनों ओर एक-सी नहीं; और गण में देव लड़का व मनुष्य लड़की हो तो 6, उलटा हो तो 5 अंक मिलते हैं। इसलिए फ़ॉर्म में वर और वधू के ख़ाने ध्यान से भरिए।

दोनों का जन्म-विवरण भरिए

तारीख़, समय और जगह — तीनों जितने सही होंगे, मिलान उतना ही सटीक। समय याद न हो तो भी चल जाएगा।

अभी मिलान कीजिए