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शादी की तारीख कैसे निकालें — विवाह मुहूर्त चुनने के नौ क़दम

तारीख़ों की सूची नहीं, तरीका — कौन-सा महीना, कौन-सा नक्षत्र, किस दिन भद्रा, वर-वधू दोनों का बल और फेरों का सही क्षण कैसे परखा जाता है, एक काल्पनिक उदाहरण के साथ।

शादी की तारीख कैसे निकालें — इसका छोटा जवाब यह है: पहले दोनों परिवारों की सुविधा का समय तय कीजिए; फिर उसमें वे दिन छाँटिए जिनमें गुरु और शुक्र उदित हों, शुभ नक्षत्र हो, तिथि और वार ठीक हों और भद्रा न हो; फिर वर और वधू दोनों का तारा-बल और चंद्र-बल मिलाइए; और आख़िर में फेरों के समय का शुद्ध लग्न चुनिए।

बहुत से लोग गूगल पर 'shadi ki date kaise nikale', 'shadi ka muhurat kaise nikale' या सीधे 'vivah muhurat' लिखते हैं, और उन्हें तारीख़ों की लंबी सूचियाँ मिलती हैं। सूची बताती है कि दिन सामान्य रूप से ठीक है; वह यह नहीं बताती कि वही दिन आप दोनों के लिए ठीक है या नहीं। कुंडली मिलान ज्योतिष की टीम ने यह लेख इसी अधूरे हिस्से के लिए लिखा है — तारीख़ें नहीं, तरीका, ताकि आप पंडित जी से सही सवाल पूछ सकें और उनका जवाब समझ सकें।

विवाह मुहूर्त की तीन परतें — काल, व्यक्ति और क्षण

विवाह के समय पर सबसे ज़्यादा पढ़ा जाने वाला ग्रंथ मुहूर्त चिंतामणि है, जिसे काशी के रामदैवज्ञ ने लगभग चार सौ साल पहले लिखा। उसका एक पूरा अध्याय, विवाह प्रकरण, इसी काम पर है। उसके नियमों को सरल भाषा में तीन परतों में समझा जा सकता है।

परतक्या देखा जाता हैकिसके लिए एक जैसा
काल की शुद्धिमहीना, गुरु-शुक्र का उदय, पंचांग के अंगउस शहर में सबके लिए
व्यक्ति की शुद्धिवर-वधू का तारा-बल, चंद्र-बल, गुरु और सूर्य का गोचरसिर्फ़ इस जोड़े के लिए
क्षण की शुद्धिफेरों के समय का लग्न और नवांशउसी घड़ी के लिए

कैलेंडर की सूची सिर्फ़ पहली परत पूरी करती है। दूसरी के लिए दोनों की जन्म-कुंडली चाहिए, और तीसरी के लिए विवाह का शहर और समय। नीचे के नौ क़दम इन्हीं परतों को क्रम से खोलते हैं — मोटी छलनी पहले, बारीक बाद में।

पहला क़दम — दोनों परिवारों की सीमाएँ पहले लिख लीजिए

मुहूर्त आकाश से निकलता है, पर शादी ज़मीन पर होती है। पहले काग़ज़ पर वह खिड़की लिखिए जिसमें शादी सच में हो सकती है:

  • दोनों परिवारों के बड़ों की सेहत और यात्रा की सुविधा;
  • वर-वधू की नौकरी की छुट्टी, परीक्षा या विदेश से आने वाले रिश्तेदारों का समय;
  • विवाह-स्थल और बजट — शादी के भरे मौसम में हॉल जल्दी भरते हैं;
  • मौसम — बरसात, बहुत गर्मी या बहुत ठंड;
  • कुल की परंपराएँ — जैसे कई परिवारों में ज्येष्ठ (बड़ी) संतान का विवाह ज्येष्ठ मास में नहीं होता, या एक घर में थोड़े समय में दो विवाह नहीं रखे जाते।

यह खिड़की दो-तीन महीने की हो तो सबसे अच्छा। एक ही हफ़्ते की खिड़की में शुद्ध मुहूर्त न मिले, ऐसा हो सकता है — तब भी घबराने की बात नहीं; आगे बताया है कि परंपरा क्या रास्ता देती है।

दूसरा क़दम — परंपरा किन महीनों को छोड़ती है

शादी का मौसम हर साल लगभग उन्हीं हफ़्तों में क्यों आता है? क्योंकि उस पर दो अलग घड़ियाँ एक साथ चलती हैं — सूर्य की और चंद्रमा की।

सूर्य की घड़ी (सौर मास) — जब सूर्य धनु या मीन राशि में होता है, उस महीने को खरमास कहा जाता है। दोनों राशियों का स्वामी गुरु है, और परंपरा मानती है कि सूर्य के उनमें रहते गुरु का शुभ बल विवाह को पूरा नहीं मिलता। इसलिए खरमास में शादी प्रायः नहीं रखी जाती। सूर्य की राशि पर चलने के कारण यह ग्रेगोरियन कैलेंडर में लगभग उन्हीं तारीख़ों पर आता है।

चंद्रमा की घड़ी (चंद्र मास) — चातुर्मास देवशयनी एकादशी (आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि) से शुरू होकर देवउठनी एकादशी (कार्तिक के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं) पर पूरा होता है। यह चंद्र-मास पर टिका है। इसलिए यह हर साल कुछ दिन आगे-पीछे खिसकता है। अधिक मास (जो लगभग हर तीसरे साल आता है) भी विवाह के लिए छोड़ा जाता है।

इन दोनों को हटाने के बाद जो समय बचता है, वही उत्तर भारत में "लगन" या "सहालग" का मौसम कहलाता है। शास्त्र में माघ, फाल्गुन, वैशाख और ज्येष्ठ विवाह के अच्छे महीने गिने गए हैं, और कई क्षेत्रों में मार्गशीर्ष भी।

समयक्यों टाला जाता हैकिस घड़ी से
खरमास (सूर्य धनु और मीन में)गुरु की राशियों में सूर्यसौर
चातुर्मास (देवशयनी से देवउठनी)देवताओं का विश्राम-काल, परंपराचंद्र
अधिक मासदोहराया गया महीनाचंद्र
ग्रहण का दिन और संक्रांति का दिनपरंपरा में संधि-कालदोनों
होलाष्टक (होली से पहले के आठ दिन)उत्तर भारत की लोक-परंपराचंद्र

ये नियम हर जगह एक जैसे नहीं। दक्षिण भारत की परंपराएँ अपने महीने मानती हैं, और कई परिवार अपने पुरोहित की रीति से चलते हैं। जहाँ घर की रीति और ग्रंथ अलग कहें, वहाँ पंडित जी से बात कीजिए।

तीसरा क़दम — गुरु और शुक्र उदित हों

ज्योतिष में गुरु (बृहस्पति) और शुक्र विवाह के कारक हैं — गुरु धर्म, आशीर्वाद और (वधू की कुंडली में) पति का, शुक्र प्रेम, सुख और दाम्पत्य का। जब कोई ग्रह आकाश में सूर्य से कुछ ही अंश दूर रह जाता है, तो सूर्य की चमक में छिप जाता है। इसे अस्त होना कहते हैं। पंचांग में "गुरु तारा अस्त" या "शुक्र तारा अस्त" लिखा मिलता है। मुहूर्त चिंतामणि और धर्मसिंधु दोनों कहते हैं कि इन दिनों विवाह न रखें — मुहूर्त के नियमों में यह सबसे पक्का नियम माना जाता है।

यह कितने दिन का होता है? हमने आधुनिक खगोल-गणना से जाँचा (गुरु के लिए सूर्य से 11 अंश, शुक्र के लिए 10 अंश की दूरी मानकर):

  • गुरु लगभग हर तेरह महीने में एक बार अस्त होता है, लगभग चार हफ़्ते के लिए।
  • शुक्र लगभग हर उन्नीस-बीस महीने में दो बार अस्त होता है — एक बार लंबा, लगभग ढाई महीने, और एक बार छोटा, लगभग डेढ़-दो हफ़्ते।

पंचांग अपने-अपने हिसाब से कुछ दिन आगे-पीछे लिख सकते हैं। परंपरा उदय के ठीक बाद के कुछ दिनों (बाल्यत्व, यानी "बचपन") और अस्त से ठीक पहले के कुछ दिनों (वृद्धत्व, यानी "बुढ़ापा") को भी छोड़ती है। कितने दिन, इस पर क्षेत्रों में मत अलग हैं — इसलिए यह हिस्सा पंचांग या पंडित जी से ही पक्का कीजिए।

"गुरु शुक्र अस्त में शादी हो सकती है क्या?" — परंपरा का जवाब साफ़ है: विवाह के संस्कार के लिए अगला उदित समय लीजिए। पर अस्त का समय बेकार नहीं — उसमें कुंडली मिलान, रिश्ते की बातचीत और उपायों की शुरुआत आराम से हो सकती है। कुछ क्षेत्रों में गुरु के सिंह राशि में रहने (सिंहस्थ गुरु) पर भी विवाह टालने की परंपरा है; यह हर जगह नहीं मानी जाती।

चौथा क़दम — विवाह के लिए शुभ नक्षत्र

विवाह के लिए शुभ नक्षत्र मुहूर्त चिंतामणि ग्यारह गिनाता है। नक्षत्र यानी वह तारा-समूह जिसके पास उस घड़ी चंद्रमा हो। मुहूर्त में नक्षत्र पंचांग का सबसे भारी अंग माना जाता है। तालिका में यह भी दिया है कि उस नक्षत्र में चंद्रमा किस राशि में रहता है — सातवें क़दम में यही काम आएगा।

नक्षत्रचंद्रमा की राशिग्रंथों में स्वभाव
रोहिणीवृषभस्थिर
मृगशिरापहले दो चरण वृषभ, बाक़ी मिथुनकोमल
मघासिंहउग्र, फिर भी विवाह में मान्य
उत्तरा फाल्गुनीपहला चरण सिंह, बाक़ी कन्यास्थिर
हस्तकन्यातेज़
स्वातीतुलाचलायमान
अनुराधावृश्चिककोमल
मूलधनुतीक्ष्ण, फिर भी विवाह में मान्य
उत्तराषाढ़ापहला चरण धनु, बाक़ी मकरस्थिर
उत्तरा भाद्रपदमीनस्थिर
रेवतीमीनकोमल

एक बात अक्सर छूट जाती है: नक्षत्र दिन भर एक नहीं रहता। चंद्रमा लगभग एक दिन में एक नक्षत्र पार करता है, इसलिए पंचांग में लिखा होता है "रोहिणी 16:40 तक, फिर मृगशिरा"। फेरों का समय जिस नक्षत्र में पड़े, वही गिना जाता है। जो लोग 'vivah ke liye shubh nakshatra' खोजकर सिर्फ़ सूची याद कर लेते हैं, वे यही समय वाली बात भूल जाते हैं।

पाँचवाँ क़दम — तिथि और वार

तिथि चंद्रमा और सूर्य की दूरी से बनती है। विवाह के लिए चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी — जिन्हें रिक्ता यानी "ख़ाली" तिथियाँ कहते हैं — और अमावस्या नहीं ली जातीं। यह नियम शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों पर लगता है। इसके ऊपर तीन बारीक बातें:

  1. रोज़ के कामों में सूर्योदय वाली तिथि मानी जाती है, पर मुहूर्त में देखा जाता है कि संस्कार की घड़ी में कौन-सी तिथि चल रही है। सुबह द्वितीया हो और रात को तृतीया, तो रात के फेरे तृतीया में गिने जाएँगे।
  2. उत्तर भारत में शुक्ल पक्ष (बढ़ते चंद्रमा) को पहली पसंद माना जाता है; कई क्षेत्रों में नक्षत्र और लग्न अच्छे हों तो कृष्ण पक्ष के शुरुआती दिन भी लिए जाते हैं।
  3. कुछ परिवार अष्टमी भी छोड़ते हैं; एकादशी का व्रत रखने वाले परिवार भोज के कारण उस दिन से बचते हैं। यह घर की रीति है, दोष नहीं।

वार — सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार ज़्यादातर परंपराओं में विवाह के पसंदीदा वार हैं। मंगल और शनि के वार अक्सर छोड़ दिए जाते हैं। रविवार पर क्षेत्रों में मत बँटे हुए हैं। वार की बात नक्षत्र और लग्न से हल्की है — अच्छा नक्षत्र और शुद्ध लग्न हो तो कई पंडित वार में थोड़ी छूट दे देते हैं।

छठा क़दम — योग और करण, यानी भद्रा का समय

पंचांग का योग दोनों ज्योतियों — सूर्य और चंद्रमा — के अंश जोड़कर निकलता है; करण तिथि का आधा हिस्सा है। सत्ताईस योगों में से दो, व्यतीपात और वैधृति, जितने घंटे चलें, उतने घंटे विवाह के लिए पूरे छोड़े जाते हैं।

करणों में सबसे ज़्यादा ध्यान विष्टि पर रहता है — बोलचाल की भद्रा। भद्रा पूरे दिन की नहीं होती — दस से तेरह घंटे की होती है, और किसी भी घड़ी शुरू होकर किसी भी घड़ी ख़त्म हो सकती है। इसलिए "उस दिन भद्रा है" सुनकर पूरा दिन मत छोड़िए। पंचांग में लिखा होता है, जैसे "भद्रा 09:15 से 21:40 तक"। अगर फेरे रात 22:30 के बाद हैं, तो भद्रा बीत चुकी है। परंपरा में यह भी कहा गया है कि भद्रा के आख़िरी हिस्से ("पूँछ") में ज़रूरत पड़ने पर शुभ काम हो सकता है, पर यह पंडित जी के निर्णय पर छोड़िए।

यही बात योग पर भी है — योग भी दिन में बदलता है। सुबह कोई कठिन योग हो और शाम तक शुभ योग आ जाए, तो शाम का संस्कार शुभ योग में गिना जाता है।

सातवाँ क़दम — वर और वधू दोनों का तारा-बल और चंद्र-बल

यहाँ से मुहूर्त "सबका" नहीं, "आपका" बनता है। इसके लिए वर और वधू, दोनों का जन्म-नक्षत्र और जन्म-राशि (जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में था) चाहिए।

तारा-बल — नक्षत्र से गिनती

वर (या वधू) के जन्म-नक्षत्र को 1 मानकर विवाह वाले दिन के नक्षत्र तक गिनिए। जो संख्या आए, उसे 9 से भाग दीजिए। शेष से तारा का नाम मिलता है:

शेषतारामुहूर्त में
1जन्मठीक
2संपत्शुभ
3विपत्कमज़ोर
4क्षेमशुभ
5प्रत्यरिकमज़ोर
6साधकशुभ
7वधकमज़ोर
8मित्रशुभ
0 (नौवीं)अतिमित्रशुभ

हमारी साइट मुहूर्त चिंतामणि का यही नियम मानती है: नौ में से केवल तारा 3, 5 और 7 कमज़ोर गिनी जाती हैं। इनके नाम पुराने और कड़े लगते हैं, पर अर्थ इतना ही है कि वह दिन उस व्यक्ति को कम सहारा देता है — इसलिए पंडित जी दूसरा दिन चुनना पसंद करते हैं। गुण-मिलान का तारा कूट भी इसी गिनती पर चलता है; फ़र्क़ बस इतना है कि वहाँ वर और वधू एक-दूसरे के नक्षत्र से गिनते हैं।

चंद्र-बल — राशि से गिनती

अब जन्म-राशि को 1 मानकर गिनिए कि उस घड़ी चंद्रमा किस राशि में है। पहला, तीसरा, छठा, सातवाँ, दसवाँ और ग्यारहवाँ स्थान अच्छा माना जाता है। चौथा, आठवाँ और बारहवाँ टाला जाता है। दूसरे, पाँचवें और नौवें को कई पंडित शुक्ल पक्ष में ठीक मान लेते हैं। चंद्रमा लगभग सवा दो दिन में राशि बदलता है, इसलिए यह भी फेरों के समय से देखिए।

कई पंडित मानते हैं कि दोनों में से एक बल — तारा या चंद्र — मज़बूत हो तो काम चल जाता है। दोनों साफ़ हों, तो सबसे अच्छा।

त्रिबल — गुरु वधू के लिए, सूर्य वर के लिए

उत्तर भारत की परंपरा इसके ऊपर गुरु और सूर्य का गोचर (इस समय आकाश में ग्रह कहाँ है) भी देखती है, जन्म-राशि से गिनकर:

ग्रहकिसके लिएशुभ स्थानपूजा से शुभअशुभ
गुरुवधू2, 5, 7, 9, 111, 3, 6, 104, 8, 12
सूर्यवर3, 6, 10, 111, 2, 5, 7, 94, 8, 12

गुरु एक राशि में लगभग एक साल रहता है, इसलिए यह एक दिन की नहीं, पूरे साल की बात है। जब गुरु या सूर्य "पूजा से शुभ" वाले स्थान में हो, तो परंपरा उस ग्रह की पूजा और दान कराकर विवाह करती है; अशुभ स्थान में हो, तो शांति-पूजा की सलाह दी जाती है। इसका अर्थ विवाह रोकना नहीं — सहारा जोड़ना है।

आठवाँ क़दम — विवाह लग्न: फेरों का सही क्षण

लग्न यानी उस क्षण पूर्व दिशा में उगती राशि। यह लगभग हर दो घंटे में बदलती है, इसलिए एक ही शुभ दिन में भी कुछ घंटे बहुत अच्छे और कुछ उपयोग के लायक़ नहीं होते। पंडित जी उस क्षण की कुंडली बनाकर देखते हैं:

  • सातवाँ भाव (विवाह का घर) ख़ाली हो;
  • आठवाँ भाव भी ख़ाली हो — ख़ासकर आठवें में मंगल (परंपरा में "कुज-अष्टम") न हो;
  • चंद्रमा लग्न से छठे, आठवें या बारहवें घर में न हो;
  • शुक्र लग्न से छठे घर में न हो (परंपरा में "भृगु-षट्क");
  • लग्न के दोनों ओर (दूसरे और बारहवें घर में) कड़े ग्रह न बैठे हों, वरना लग्न "कैंची" में फँसा माना जाता है — इसे कर्तरी दोष कहते हैं;
  • विवाह का लग्न वर या वधू की जन्म-राशि या जन्म-लग्न से आठवीं राशि न हो।

एक लग्न डेढ़ से ढाई घंटे का होता है। उसके भीतर नवांश (लग्न का नौवाँ हिस्सा) और छोटा है — लगभग दस से पंद्रह मिनट। इसीलिए पंडित जी फेरों का समय घड़ी की सुई तक बताते हैं, जैसे "रात 1:46 से 1:56 के बीच"। लक्ष्य यह रहता है कि सबसे ज़रूरी हिस्सा (फेरे या कन्यादान, घर की रीति के हिसाब से) इसी में हो जाए।

गोधूलि — जब दिन में शुद्ध लग्न न मिले

सूर्यास्त के आसपास, जब गायें धूल उड़ाती घर लौटती थीं, उस समय को गोधूलि कहते हैं। जिस दिन कोई शुद्ध लग्न न मिले, परंपरा में यही समय सहारा बनता है। एक रोचक बात: सूर्यास्त के समय सूर्य हमेशा उस घड़ी के लग्न से सातवें घर में होता है — यानी सामान्य नियम से सातवाँ घर ख़ाली नहीं रहता। फिर भी परंपरा गोधूलि को अलग नियम से मानती है। इसलिए बड़े पंडित इसे पहली पसंद नहीं, अच्छा विकल्प कहते हैं।

नौवाँ क़दम — अपने शहर का पंचांग और पण्डित जी की आख़िरी जाँच

तिथि और नक्षत्र पूरी पृथ्वी पर एक साथ बदलते हैं, पर सूर्योदय, सूर्यास्त और उगता लग्न हर शहर का अपना होता है। इसलिए मुहूर्त उसी शहर के लिए निकलवाइए जहाँ फेरे होंगे — घर के शहर के लिए नहीं, और विदेश में शादी हो तो वहाँ के स्थानीय समय से।

पंडित जी के पास जाएँ तो ये चीज़ें साथ रखिए:

  1. वर और वधू दोनों की जन्म-तिथि, जन्म-समय और जन्म-स्थान;
  2. दोनों का जन्म-नक्षत्र, उसका चरण और जन्म-राशि (कुंडली मिलान की रिपोर्ट में लिखे होते हैं);
  3. विवाह का शहर और स्थल;
  4. पहले क़दम वाली खिड़की — किन हफ़्तों में शादी हो सकती है;
  5. परिवार की पसंद — दिन के फेरे, शाम की गोधूलि या रात के फेरे;
  6. कुल की कोई ख़ास रीति।

एक उदाहरण — एक काल्पनिक जोड़े की तारीख़ कैसे निकली

मान लीजिए वधू का जन्म-नक्षत्र हस्त है (राशि कन्या), और वर का पूर्वाषाढ़ा (राशि धनु)। परिवार की खिड़की किसी अच्छे महीने के शुक्ल पक्ष में है — न खरमास, न चातुर्मास, न अधिक मास, और पंचांग के अनुसार गुरु और शुक्र दोनों उदित हैं, बाल्य-वृद्ध भी नहीं। यह नाम और दिन सिर्फ़ समझाने के लिए हैं, किसी असली तारीख़ के नहीं।

उस हफ़्ते के पाँच दिन ऐसे थे:

वारतिथि (शाम को)नक्षत्रपंचांग की छलनीदोनों की कुंडली की छलनी
मंगलवारशुक्ल प्रतिपदाकृत्तिकानक्षत्र सूची में नहीं, वार भी कड़ा — छोड़ा—
बुधवारशुक्ल द्वितीयारोहिणीठीकवर की तारा तीसरी (विपत्) — छोड़ा
गुरुवारशुक्ल तृतीयामृगशिराठीकदोनों ठीक — चुना
शुक्रवारशुक्ल चतुर्थीआर्द्रारिक्ता तिथि — छोड़ा—
शनिवारशुक्ल पंचमीपुनर्वसुनक्षत्र सूची में नहीं — छोड़ा—

बुधवार क्यों छूटा? रोहिणी सबसे प्रसिद्ध विवाह-नक्षत्र है, पर वर के नक्षत्र पूर्वाषाढ़ा से गिनें — पूर्वाषाढ़ा 1, उत्तराषाढ़ा 2, श्रवण 3 … रोहिणी 12। बारह को नौ से भाग दें तो शेष 3 — विपत् तारा। इसलिए यह दिन इस जोड़े के लिए दूसरी पसंद भी नहीं बना।

गुरुवार कैसे चुना गया? वधू के हस्त से मृगशिरा तक गिनती 20 — शेष 2, संपत् तारा। वर के पूर्वाषाढ़ा से 13 — शेष 4, क्षेम तारा। दोनों शुभ। उस दिन चंद्रमा शाम लगभग साढ़े पाँच बजे वृषभ से मिथुन में आया। मिथुन वधू की कन्या राशि से दसवाँ है और वर की धनु राशि से सातवाँ — दोनों अच्छे स्थान। (शाम से पहले चंद्रमा वृषभ में था — वधू से नौवाँ, जो शुक्ल पक्ष में चल जाता है, पर रात का समय और साफ़ था।) त्रिबल में गुरु तुला में था — वधू की कन्या से दूसरा, शुभ। सूर्य मेष में था — वर की धनु से पाँचवाँ, यानी "पूजा से शुभ"; इसलिए पंडित जी ने वर को शादी से पहले 43 दिन सूर्य का मंत्र और रोज़ अर्घ्य बताया।

लग्न कैसे चुना गया? उस शहर और मौसम में शाम को तुला, फिर वृश्चिक, फिर धनु, फिर मकर लग्न उगने थे। तुला लग्न में सूर्य सातवें घर में था। वृश्चिक लग्न में चंद्रमा आठवें घर में पड़ता। धनु में चंद्रमा सातवें घर में। मकर में चंद्रमा छठे में। चारों छोड़े गए। रात लगभग सवा एक बजे कुंभ लग्न आया: चंद्रमा पाँचवें घर में, सातवाँ (सिंह) और आठवाँ (कन्या) ख़ाली, शुक्र छठे में नहीं, लग्न के दोनों ओर कोई कड़ा ग्रह नहीं, और कुंभ न वर की राशि से आठवाँ, न वधू की राशि से। तृतीया भी रात तीन बजे तक थी, और भद्रा उस दिन थी ही नहीं। कुंभ लग्न यहाँ डेढ़ घंटे से कम का था, इसलिए उसका एक नवांश लगभग दस मिनट का निकला — पंडित जी ने वही फेरों के लिए दिया।

सीख: कैलेंडर में दो दिन "शुभ" छपे हो सकते थे, पर इस जोड़े के लिए एक ही दिन, और उसमें भी एक ही घंटा, पूरी तरह साफ़ निकला। उत्तर भारत में आधी रात के बाद फेरे होने का एक कारण यही है।

शादी की तारीख नाम से कैसे निकालें

बहुत से परिवार 'shadi ki date kaise nikale by name' पूछते हैं, क्योंकि उनके पास जन्म-समय नहीं होता। ईमानदार जवाब यह है: नाम से सिर्फ़ अनुमान मिलता है।

परंपरा में हर नक्षत्र के हर चरण का एक अक्षर तय है — इस तालिका को अवकहड़ा चक्र कहते हैं। नाम का पहला अक्षर देखकर नक्षत्र और राशि का अंदाज़ा लगता है, और उसी से तारा-बल और चंद्र-बल गिना जा सकता है। मुहूर्त ग्रंथ भी कहते हैं कि जन्म-नक्षत्र पता न हो तो प्रसिद्ध नाम का नक्षत्र लिया जाए। पर इसकी तीन सीमाएँ हैं:

  • आजकल ज़्यादातर नाम नक्षत्र के अक्षर से नहीं रखे जाते, इसलिए अनुमान ग़लत भी हो सकता है;
  • एक अक्षर कभी दो नक्षत्रों में आता है;
  • जन्म-लग्न से आठवाँ लग्न टालने वाला नियम नाम से नहीं निकलता।

इसलिए जन्म-तिथि पता हो — समय भले न हो — तो नक्षत्र उसी से निकलवाइए। नाम को आख़िरी सहारा मानिए, पहला नहीं।

उपाय — जब कोई बल कमज़ोर हो या समय कम हो

कभी खिड़की छोटी होती है और हर बात साफ़ नहीं मिलती। परंपरा ऐसे में शादी रोकने को नहीं, सहारा जोड़ने को कहती है। ये उपाय सरल और हानि-रहित हैं:

  • लगभग हर हिन्दू विवाह गणेश-पूजन से शुरू होता है। तैयारी के दिनों में रोज़ गणेश जी का मंत्र जप सकते हैं:

'ॐ गं गणपतये नमः'

  • वधू के लिए गुरु "पूजा से शुभ" या अशुभ स्थान में हो, तो गुरुवार को पीली चीज़ों (चने की दाल, हल्दी, पीला वस्त्र) का दान और गुरु का मंत्र:

'ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः'

  • वर के लिए सूर्य ऐसे स्थान में हो, तो सुबह सूर्य को जल (अर्घ्य) और सूर्य का मंत्र:

'ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः'

  • दोनों के दाम्पत्य-सुख के लिए शुक्र का मंत्र:

'ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः'

हर मंत्र रोज़ एक माला (108 बार), और 43 दिन तक एक भी दिन छोड़े बिना — इसलिए जप शादी से लगभग डेढ़ महीना पहले शुरू कीजिए। व्रत सिर्फ़ तब, जब शरीर साथ दे। ये उपाय किसी फल का वादा नहीं करते, कोई गारंटी नहीं; नियम और श्रद्धा से किए जाएँ तो मन को सहारा देते हैं। शुभ मुहूर्त अच्छी शुरुआत देता है; रिश्ता रोज़ के आदर और बातचीत से बनता है।

तारीख़ से पहले कुंडली मिलान — हमारी रिपोर्ट क्या करती है और क्या नहीं

क्रम यह रखिए — मिलान पहले, मुहूर्त बाद में। मुहूर्त एक दिन और एक क्षण का चुनाव है; मिलान दो लोगों के पूरे साथ की परख। और सातवें-आठवें क़दम के लिए दोनों का जन्म-नक्षत्र, चरण, जन्म-राशि और जन्म-लग्न चाहिए — ये सब कुंडली मिलान की रिपोर्ट में पहले से लिखे मिलते हैं।

विवाह कुंडली मिलान में आप दोनों की जन्म-तिथि, जन्म-समय और जन्म-स्थान भरते हैं। रिपोर्ट दोनों की पूरी कुंडली बनाकर ये बातें तौलती है: अष्टकूट के 36 गुण, मांगलिक दोष, नाड़ी और भकूट दोष और उनकी शास्त्रीय छूट (परिहार), संतान-पक्ष, और विवाह-काल — दोनों की दशा की खिड़कियाँ, उनकी साझा खिड़की और गुरु-शनि का गोचर। निर्णय अकेले 36 गुण से नहीं होता; 38 गणनाएँ अपने शास्त्रीय भार से तौली जाती हैं। रिपोर्ट कभी विवाह से मना नहीं करती — कमी दिखे तो उसका उपाय और जानकार से सलाह बताती है। भुगतान के बाद मिलान का पूरा परिणाम उसी समय स्क्रीन पर खुल जाता है; विस्तार PDF में मिलता है, उपायों के पूरे विधान और "आपके सवाल — सीधे जवाब" वाले हिस्से के साथ।

यहाँ साफ़ रहना ज़रूरी है: हमारी रिपोर्ट शादी की तारीख़ नहीं चुनती। विवाह-काल बताता है कि कौन-सा समय-खंड दोनों की कुंडली में सहारा देता है; उस खंड के भीतर तारीख़ और क्षण ऊपर के नौ क़दमों से, आपके शहर के पंचांग से, किसी अनुभवी पंडित से तय करवाइए। मिलान में कोई उपाय निकले, तो उसे शादी से पहले शुरू कर देना सबसे अच्छा है।

शादी की तैयारी में घर के लोगों के बीच तनाव आना भी आम है — तारीख़, ख़र्च, मेहमानों की सूची पर। ऐसे समय के लिए गृह-शांति कुंडली मिलान है। इसमें घर के कोई भी दो लोग — जैसे माँ और विवाह करने वाली बेटी, या पिता और बेटा — अपनी जन्म-जानकारी देते हैं। रिपोर्ट दोनों के स्वभाव का मेल, मन का कारक चंद्रमा, घर की शांति का चौथा भाव और वाणी देखती है; साथ में पितृ दोष (परंपरा का विषय) और कालसर्प (जो प्राचीन ग्रंथों में नहीं, बाद की परंपरा है), दोनों की चल रही दशा और शनि का गोचर भी। फिर दोनों के लिए अलग-अलग उपाय बताती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

शादी का मुहूर्त कैसे निकालें — घर बैठे क्या देख सकते हैं?

घर बैठे पहली छलनी लग सकती है: खरमास, चातुर्मास और अधिक मास हटाइए; गुरु-शुक्र अस्त देखिए; फिर वे दिन चुनिए जिनमें ग्यारह में से कोई नक्षत्र हो, रिक्ता तिथि या अमावस्या न हो, और फेरों के समय भद्रा न हो। दोनों का तारा-बल और चंद्र-बल भी गिन सकते हैं। लग्न और नवांश की जाँच पंडित जी से ही करवाइए।

क्या गुरु शुक्र अस्त में शादी कर सकते हैं?

परंपरा, मुहूर्त चिंतामणि और धर्मसिंधु के अनुसार, गुरु या शुक्र अस्त हो तो विवाह का संस्कार नहीं रखा जाता, और उदय-अस्त के आसपास के कुछ दिन भी छोड़े जाते हैं। गुरु लगभग चार हफ़्ते और शुक्र कभी ढाई महीने, कभी दो हफ़्ते से कम अस्त रहता है। इस समय को तैयारी, कुंडली मिलान और उपायों के लिए काम में लीजिए।

खरमास में शादी क्यों नहीं होती?

खरमास वह समय है जब सूर्य धनु या मीन राशि में होता है। दोनों राशियाँ गुरु की हैं, और परंपरा मानती है कि तब विवाह को गुरु का पूरा शुभ बल नहीं मिलता। यह सूर्य पर चलता है, इसलिए हर साल लगभग उन्हीं हफ़्तों में आता है। दक्षिण भारत और कुछ परिवारों की रीति अलग है — घर के पुरोहित की बात मानिए।

विवाह के लिए शुभ नक्षत्र कौन-से हैं?

मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार ग्यारह: तीनों उत्तरा (उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तरा भाद्रपद), रोहिणी, मृगशिरा, हस्त, स्वाती, अनुराधा, रेवती, और मघा व मूल। ध्यान रहे कि नक्षत्र दिन में बदलता है, इसलिए फेरों के समय का नक्षत्र देखा जाता है। और वही नक्षत्र वर-वधू दोनों के जन्म-नक्षत्र से तीसरी, पाँचवीं या सातवीं तारा न बनाए, यह भी जाँचा जाता है।

ऑनलाइन लिस्ट वाला शुभ विवाह मुहूर्त सबके लिए सही क्यों नहीं?

ऑनलाइन या कैलेंडर की सूची सिर्फ़ दिन की शुद्धि बताती है — महीना, नक्षत्र, तिथि, योग, करण। वर-वधू का तारा-बल, चंद्र-बल, गुरु-सूर्य का गोचर और जन्म-राशि से आठवाँ लग्न, ये सब हर जोड़े के लिए अलग होते हैं। इसलिए सूची को शुरुआत मानिए, आख़िरी फ़ैसला नहीं।

जन्म समय पता न हो तो शादी की तारीख कैसे निकालें?

जन्म-तिथि और जन्म-स्थान से चंद्रमा का नक्षत्र और राशि ज़्यादातर दिनों में पक्के निकल आते हैं, और तारा-बल व चंद्र-बल इन्हीं पर टिके हैं। जिस दिन चंद्रमा ने नक्षत्र बदला हो, उस दिन पंडित जी दोनों संभावनाएँ देखकर चलते हैं। जन्म-लग्न से आठवें लग्न वाला नियम समय के बिना नहीं निकलता — बाक़ी मुहूर्त ठीक से निकल जाता है।

क्या पहले कुंडली मिलान करें, फिर विवाह मुहूर्त?

हाँ। कुंडली मिलान दो लोगों के साथ को देखता है — 36 गुण, मांगलिक, नाड़ी, भकूट और उनकी छूट; मुहूर्त सिर्फ़ एक दिन और एक क्षण चुनता है। मिलान की रिपोर्ट से दोनों का जन्म-नक्षत्र और राशि भी मिल जाते हैं, जो मुहूर्त के लिए ज़रूरी हैं। और अगर मिलान में कोई उपाय निकले, तो उसे शादी से पहले शुरू करने का समय भी मिल जाता है।

दोनों का जन्म-विवरण भरिए

तारीख़, समय और जगह — तीनों जितने सही होंगे, मिलान उतना ही सटीक। समय याद न हो तो भी चल जाएगा।

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