कुंडली मिलान ज्योतिषKundliMilanJyotish.com
ज्योतिष

पर्व-त्योहार

विवाह और कुंडली मिलान

उपाय और ज्ञान

हिन्दी
मिलान करें

ज्योतिष

ऑनलाइन कुंडली मिलान — गुण, मांगलिक और नाड़ी, सरल भाषा में

जन्म-विवरण भरने से लेकर 36 गुण, मांगलिक और नाड़ी दोष तक — ऑनलाइन मिलान क्या गिनता है, कैसे गिनता है, और उसका नतीजा कैसे पढ़ें।

पहले कुंडली मिलान के लिए दोनों परिवार पंडित जी के पास जाते थे। पत्रा खुलता, उँगलियों पर नक्षत्र गिने जाते, और कुछ दिन में बताया जाता कि कितने गुण मिले। आज वही गणना पलों में मोबाइल पर आ जाती है। पर इस तेज़ी के साथ एक उलझन भी आई है — लोग अंक देख लेते हैं, उसका अर्थ नहीं। 17 गुण दिखे तो घर में चिंता फैल जाती है; 30 दिखे तो बाक़ी सब देखना छोड़ दिया जाता है। दोनों बातें अधूरी हैं।

यह लेख कुंडली मिलान ज्योतिष की टीम ने इसी अधूरेपन को भरने के लिए लिखा है। इसमें सरल भाषा में बताया गया है कि ऑनलाइन मिलान के लिए क्या विवरण चाहिए, गणना कैसे होती है, आठों कूट रोज़ के जीवन में क्या देखते हैं, नाड़ी, भकूट और मांगलिक दोष कब बनते हैं और कब शास्त्र ही उन्हें काट देता है — और यह कि कम गुण का अर्थ कभी "विवाह मत करो" नहीं होता।

ऑनलाइन कुंडली मिलान असल में करता क्या है

कुंडली मिलान (विवाह से पहले वर और वधू की जन्म-कुंडलियों की तुलना) का प्रश्न सीधा है: दो लोगों का स्वभाव, मन और जीवन की दिशा साथ कितनी सहजता से चलेगी। उत्तर भारत में इसके लिए अष्टकूट (आठ कसौटियों वाली पद्धति) चलती है, जिसमें कुल 36 गुण हैं। दक्षिण में दशकूट (दस कसौटियाँ) ज़्यादा प्रचलित है। दोनों का आधार एक है — जन्म के क्षण चंद्रमा कहाँ था।

ऑनलाइन मिलान कोई नई ज्योतिष नहीं। नियम वही शास्त्रीय हैं; बस ग्रहों की स्थिति अब खगोल-गणना से निकलती है, जिससे भूल कम होती है, हर जोड़ी पर एक-सा नियम लगता है, और परिणाम तुरंत मिलता है। पर कंप्यूटर गिनता है, समझाता नहीं। इसलिए अच्छे मिलान की पहचान केवल "36 में से कितने" नहीं — वह दोषों की छूट जाँचे, मांगलिक स्थिति अलग से देखे, और गुणों से आगे की बातें भी तौले।

कौन-सा विवरण चाहिए — और जन्म-समय इतना ज़रूरी क्यों

दोनों के लिए तीन बातें चाहिए: जन्म की तारीख़, समय और जगह। नाम केवल रिपोर्ट में पहचान के लिए है; गणना में उसका कोई हाथ नहीं।

तारीख़

तारीख़ से पता चलता है कि उस दिन ग्रह कहाँ थे। एक बात अक्सर छूटती है: आधी रात के बाद हुए जन्म की तारीख़ अगले दिन की होती है। 14 तारीख़ की रात सवा एक बजे का जन्म असल में 15 तारीख़ का है। पुरानी पत्री में दिन सूर्योदय से गिना गया हो, तो तारीख़ एक दिन पीछे लिखी मिल सकती है। फ़ॉर्म में हमेशा अंग्रेज़ी कैलेंडर की तारीख़ भरिए।

समय

सबसे नाज़ुक बात यही है। चंद्रमा रोज़ लगभग 13 अंश चलता है। एक नक्षत्र 13 अंश 20 कला का है, इसलिए चंद्र मोटे तौर पर एक दिन में एक नक्षत्र पार करता है, और लगभग छह घंटे में एक पद (नक्षत्र का चौथाई भाग)। लग्न (जन्म के क्षण पूर्व में उगती राशि) और तेज़ बदलता है — औसतन हर दो घंटे में।

जन्म-समय में भूलक्या बदल सकता है
5 से 15 मिनटआम तौर पर कुछ नहीं; लग्न सीमा पर हो तो वह बदल सकता है
आधा घंटा से 2 घंटेलग्न और भाव — मांगलिक दोष और सातवें भाव की बात
कई घंटेचंद्र का नक्षत्र या पद — तारा, योनि, गण, नाड़ी के अंक
तारीख़ ही ग़लतचंद्र की राशि तक — पूरा मिलान दूसरा

समय के अच्छे स्रोत हैं — अस्पताल का रिकॉर्ड, जन्म-प्रमाण पत्र, घर की पुरानी डायरी, या जन्म के समय बनी पत्री। केवल अनुमान हो, तो परिवार को बता दीजिए कि यह अनुमान है।

जगह

जगह से अक्षांश-देशांतर निकलते हैं, जिनसे लग्न बनता है, और उस जगह का समय-क्षेत्र, जिससे स्थानीय समय विश्व-समय में बदलता है। विदेश में जन्म हो तो वही शहर चुनिए जहाँ जन्म हुआ, न कि जहाँ आज रहते हैं। गाँव सूची में न दिखे तो पास का ज़िला-मुख्यालय ठीक है — कुछ दर्जन किलोमीटर से लग्न में बहुत छोटा फ़र्क़ आता है।

समय याद न हो तो

तब भी मिलान होता है, क्योंकि आठों कूट चंद्र की राशि और नक्षत्र से बनते हैं। पर एक बात साफ़ जान लें — चंद्र लगभग एक दिन में एक नक्षत्र पार करता है, इसलिए ज़्यादातर दिनों में वह दिन के किसी न किसी समय नक्षत्र बदलता है। हमारी साइट समय ख़ाली छोड़ने पर दोपहर 12 बजे मानकर मिलान करती है, और सार में साफ़ लिखती है कि उस दिन चंद्र एक ही नक्षत्र में रहा या बदला; बदला हो, तो असली समय मिलते ही मिलान दोबारा कराने को कहती है। पर लग्न और भाव वाली बातें बिना समय के पक्की नहीं होतीं, और रिपोर्ट यह छिपाती नहीं।

ऑनलाइन गणना कैसे होती है — चंद्र, नक्षत्र और लाहिरी अयनांश

बटन दबाते ही अंदर क्रम से यह होता है:

  1. जन्म-स्थान से अक्षांश, देशांतर और समय-क्षेत्र लिया जाता है।
  2. स्थानीय समय विश्व-समय में बदला जाता है।
  3. खगोल-सारणी (एफ़ेमेरिस) से उस क्षण सब ग्रहों की स्थिति निकलती है।
  4. उसमें से अयनांश घटाकर वैदिक (निरयन, यानी तारों पर टिकी) राशि निकाली जाती है।
  5. चंद्र की राशि, नक्षत्र और पद तय होते हैं।
  6. दोनों के चंद्र की तुलना से आठों कूट गिने जाते हैं; लग्न, चंद्र और शुक्र से मांगलिक स्थिति देखी जाती है।
  7. दोषों की शास्त्रीय छूट जाँचकर, सब बातें तौलकर सार बनता है।

चंद्र ही क्यों

चंद्र मन का कारक (प्रतिनिधि ग्रह) है — भावनाएँ, पसंद-नापसंद, रोज़ की प्रतिक्रिया। विवाह में दो लोग हर दिन एक-दूसरे के मन से मिलते हैं, इसलिए मिलान का आधार चंद्र है। अख़बार वाली सूर्य-राशि से मिलान वैदिक पद्धति नहीं।

नक्षत्र और पद

आकाश के 360 अंश 27 नक्षत्रों में बँटे हैं, और हर नक्षत्र के चार पद। तारा, योनि, गण और नाड़ी नक्षत्र से गिने जाते हैं; वर्ण, वश्य, ग्रह-मैत्री और भकूट चंद्र की राशि से।

लाहिरी अयनांश

पृथ्वी की धुरी बहुत धीरे डोलती है, इसलिए पश्चिमी (सायन, ऋतुओं पर टिका) राशि-चक्र और वैदिक (निरयन) राशि-चक्र हर साल थोड़ा और खिसकते हैं। इस अंतर को अयनांश कहते हैं; आज यह लगभग 24 अंश है। इसी से अख़बार की अंग्रेज़ी राशि और आपकी वैदिक चंद्र-राशि अक्सर अलग निकलती हैं।

अयनांश के कई मत हैं। भारत सरकार की पंचांग-सुधार समिति ने 1950 के दशक में चित्रा-पक्ष अयनांश अपनाया, जिसे लाहिरी अयनांश कहते हैं। ज़्यादातर भारतीय पंचांग इसी पर चलते हैं, और हमारी साइट की हर गणना भी। दूसरे मत (जैसे रमन या के.पी.) थोड़ा अलग अंक देते हैं; जिसका चंद्र नक्षत्र-सीमा के बहुत पास हो, उसका नक्षत्र दूसरे मत में बदल सकता है। यही, और तारा, ग्रह-मैत्री, गण व वश्य की सारणियों में परंपराओं का मामूली मतभेद, कारण है कि दो वेबसाइटों में एक-दो गुण का अंतर आ जाता है।

आठ कूट, 36 गुण — रोज़ के जीवन में हर एक का अर्थ

आठों कूटों के अंक बराबर नहीं। जिसका असर जीवन पर ज़्यादा माना गया, उसे ज़्यादा अंक मिले।

कूटगुणकिससेमोटे तौर पर क्या देखता है
वर्ण1चंद्र-राशिकाम और ज़िम्मेदारी का रुझान
वश्य2चंद्र-राशिआपसी खिंचाव, कौन किसकी बात मानता है
तारा3नक्षत्रएक-दूसरे के लिए शुभता
योनि4नक्षत्रस्वाभाविक सहजता और निकटता
ग्रह मैत्री5राशि-स्वामीसोचने का ढंग, मन की दोस्ती
गण6नक्षत्रमूल स्वभाव
भकूट7राशियों की दूरीभावनात्मक जुड़ाव, परिवार की बढ़त
नाड़ी8नक्षत्रशरीर-प्रकृति का मेल
कुल36

वर्ण — 1 गुण

जल-तत्व की राशियाँ (कर्क, वृश्चिक, मीन) ब्राह्मण, अग्नि-तत्व की (मेष, सिंह, धनु) क्षत्रिय, पृथ्वी-तत्व की (वृषभ, कन्या, मकर) वैश्य, और वायु-तत्व की (मिथुन, तुला, कुंभ) शूद्र वर्ण में गिनी जाती हैं। यहाँ वर्ण का अर्थ जाति नहीं, चंद्र-राशि का स्वभाव है — मन किस तरह के काम और मूल्यों की ओर झुकता है। वर का वर्ण वधू के बराबर या ऊपर हो तो 1 गुण। रोज़ के जीवन में यह ज़िम्मेदारी उठाने की शैली का मेल है। सबसे हल्का कूट है; यहाँ शून्य चिंता की बात नहीं।

वश्य — 2 गुण

राशियाँ पाँच समूहों में हैं — चतुष्पद, मानव, जलचर, वनचर (सिंह) और कीट (वृश्चिक); धनु और मकर आधी-आधी दो समूहों में। वश्य देखता है कि खिंचाव कितना है और कौन किसकी बात सहज मान लेता है। घर में यह छोटी बातों में दिखता है — छुट्टी कहाँ जाएँ, मेहमान कब बुलाएँ। पूरे गुण का अर्थ है लेन-देन सहज; कम गुण का अर्थ है कि बातचीत से रास्ता निकालने की आदत डालनी होगी।

तारा — 3 गुण

एक के नक्षत्र से दूसरे तक गिनकर 9 से भाग देते हैं। शेष से नौ तारे बनते हैं — जन्म, संपत, विपत, क्षेम, प्रत्यरि, साधक, वध, मित्र, अतिमित्र। तीसरा, पाँचवाँ और सातवाँ अशुभ हैं, बाक़ी शुभ। गिनती दोनों ओर से होती है, और हर शुभ दिशा के डेढ़ गुण। गणित ऐसा है कि दोनों दिशाएँ एक साथ अशुभ नहीं होतीं, इसलिए हमारी गणना में तारा के 3 या 1.5 गुण ही आते हैं। यह बताता है कि साथ रहकर दोनों का मन खिलता है या किसी को भीतर से थकान लगती है।

योनि — 4 गुण

हर नक्षत्र को एक पशु-प्रतीक मिला है — कुल 14 योनियाँ, जैसे अश्व, गज, सर्प, मार्जार (बिल्ली), मूषक, गौ, व्याघ्र, मृग, नकुल (नेवला), सिंह। एक ही योनि हो तो 4, मित्र हो तो 3, सम हो तो 2, कम मेल हो तो 1, और स्वाभाविक बैर वाली जोड़ी (गौ-व्याघ्र, सर्प-नकुल, मार्जार-मूषक, गज-सिंह) हो तो 0। प्रतीक पशुओं के हैं, अर्थ इंसानी: शरीर की लय, सोने-जागने की आदत, निकटता का सहज मेल। योनि कम हो तो अपनी ज़रूरत कहकर समझाना और दूसरे की ज़रूरत बिना बुरा माने सुनना काम आता है।

ग्रह मैत्री — 5 गुण

दोनों चंद्र-राशियों के स्वामी ग्रह आपस में मित्र हैं, सम हैं या शत्रु — यही ग्रह-मैत्री है। दोनों मित्र हों या स्वामी एक ही ग्रह हो तो 5; एक मित्र, एक सम तो 4; दोनों सम तो 3; एक मित्र, एक शत्रु तो 1; एक सम, एक शत्रु तो आधा; दोनों शत्रु तो 0। रोज़ के जीवन में यह सोच का मेल है — पैसा, रिश्तेदार, बच्चों की परवरिश जैसे फ़ैसलों पर दोनों कितनी जल्दी एक राय पर पहुँचते हैं।

गण — 6 गुण

27 नक्षत्र तीन गणों में बँटे हैं — देव (सौम्य, उदार), मनुष्य (व्यावहारिक) और राक्षस (तेज़, स्वतंत्र)। राक्षस गण का अर्थ बुरा इंसान नहीं; इसका अर्थ है दृढ़ इच्छा और सीधी बात। एक ही गण हो तो 6; वर देव और वधू मनुष्य हो तो 6, उलटा हो तो 5; देव-राक्षस 1 और मनुष्य-राक्षस 0। गण वहाँ दिखता है जहाँ गुस्सा आता है — एक चुप हो जाता है, दूसरा उसी पल बात निपटाना चाहता है।

भकूट — 7 गुण

दोनों चंद्र-राशियों की दूरी गिनी जाती है। दूरी 2-12 (द्विद्वादश), 6-8 (षडाष्टक) या 5-9 (नव-पंचम) हो तो 0, बाक़ी सब पर पूरे 7। यह भावनात्मक जुड़ाव और परिवार की बढ़त का कूट है — दोनों एक-दूसरे की ख़ुशी में कितना हिस्सा लेते हैं, और घर की योजना में कितना साथ चलते हैं।

नाड़ी — 8 गुण

27 नक्षत्र तीन नाड़ियों में बँटे हैं — आदि, मध्य और अन्त्य, जिनकी तुलना आयुर्वेद के वात, पित्त और कफ से की जाती है। नाड़ी अलग हो तो 8, एक हो तो 0 — यही नाड़ी दोष है। परंपरा में इसे शरीर-प्रकृति के मेल और संतान-पक्ष से जोड़ा गया, इसलिए इसे सबसे ज़्यादा अंक मिले। सरल अर्थ: दोनों की प्रकृति एक जैसी हो तो एक-सी कमज़ोरियाँ भी साथ आती हैं, और एक-दूसरे को संतुलित करने वाला गुण कम रहता है।

18 का नियम — और केवल जोड़ क्यों काफ़ी नहीं

परंपरा में 36 में से 18 गुण न्यूनतम सीमा माने गए हैं:

गुणपरंपरा में पढ़ाई
18 से कमध्यान से देखने वाला — कौन-से कूट कम हैं, छूट या उपाय क्या है
18 से 24चलने योग्य — कुछ बातें समझदारी से निभानी होंगी
25 से 32अच्छा मिलान
33 से 36बहुत अच्छा — फिर भी दोष और भाव देखना ज़रूरी

यह सीमा एक दहलीज़ है, फ़ैसला नहीं। केवल जोड़ क्यों अधूरा है, इसके चार कारण हैं।

पहला — जोड़ में भारी और हल्के कूट एक जैसे दिखते हैं। एक जोड़ी के 26 गुण हों पर नाड़ी 0, और दूसरी के 17 गुण हों पर नाड़ी-भकूट पूरे, कमी केवल वर्ण, वश्य, योनि में — तो जोड़ पहली को बेहतर दिखाता है, जबकि ध्यान की बड़ी बात पहली में है।

दूसरा — शास्त्रीय छूट से तस्वीर बदलती है। नाड़ी, भकूट और गण के शून्य कई बार शास्त्र के अपवाद से कटते हैं। छूट न देखने वाला ऐप किसी जोड़ी को 11 गुण दे सकता है, जबकि सही गिनती 23 हो।

तीसरा — मांगलिक दोष 36 गुणों में है ही नहीं। वह मंगल की स्थिति से अलग देखा जाता है।

चौथा — गुण केवल चंद्र से बनते हैं। सातवाँ भाव, शुक्र, गुरु और दशा इनमें नहीं आते।

इसीलिए हमारा मिलान 36 गुणों को एक मत मानता है, पूरा उत्तर नहीं। नाड़ी-भकूट-गण की छूट, मांगलिक मिलान, पाप-साम्य, दक्षिण की दशकूट पद्धति के रज्जु और वेध, सातवाँ भाव — ऐसी कई गणनाएँ अपने शास्त्रीय भार के साथ तौली जाती हैं, और सार बनता है: उत्तम मेल, शुभ मेल, मध्यम मेल, या ध्यान देने योग्य। कोई भी पट्टी विवाह से मना नहीं करती; सबसे नीची भी केवल बताती है कि किन बातों पर ध्यान और उपाय चाहिए।

एक उदाहरण

वर का चंद्र मेष राशि, अश्विनी नक्षत्र में; वधू का चंद्र वृश्चिक राशि, ज्येष्ठा नक्षत्र में।

कूटबिना छूटछूट जाँचकरकारण
वर्ण00वर क्षत्रिय, वधू ब्राह्मण वर्ण की राशि
वश्य11चतुष्पद और कीट का आंशिक मेल
तारा33दोनों दिशाओं में शुभ तारा
योनि11अश्व और मृग का कम मेल
ग्रह मैत्री55दोनों राशियों का स्वामी मंगल
गण16देव-राक्षस, पर राशि-स्वामी एक — छूट
भकूट076-8 की दूरी, पर राशि-स्वामी एक — छूट
नाड़ी00दोनों आदि नाड़ी, कोई छूट नहीं
कुल1123

छूट न देखने वाला ऐप 11 दिखाकर परिवार को उलझा देगा, जबकि सही गिनती 23 है। फिर भी नाड़ी बिना छूट के शून्य है, इसलिए हमारा सार यहाँ "मध्यम मेल" से ऊपर नहीं जाता, और रिपोर्ट नाड़ी के उपाय विस्तार से बताती है। 23 दिखाकर नाड़ी छिपाना भी ग़लत होता, और 11 दिखाकर डराना भी।

नाड़ी दोष और भकूट दोष — क्या बनता है, और शास्त्र की छूट

ये दोनों सबसे भारी कूट हैं, इसलिए इनका शून्य सबसे ज़्यादा चिंता देता है। पर मुहूर्त चिंतामणि जैसे ग्रंथों ने इनके अपवाद भी लिखे हैं। दोष समझने का सही क्रम है — क्या बना, अंक क्यों कटे, कोई छूट लगी या नहीं, और जो शेष है उसका उपाय क्या है।

नाड़ी दोष

दोनों के नक्षत्र एक ही नाड़ी में हों तो 8 में से 0। तीन स्थितियों में शास्त्र इसे काफ़ी शांत मानता है:

  • दोनों की चंद्र-राशि एक हो, पर नक्षत्र अलग।
  • नक्षत्र एक हो, पर राशि अलग — जो नक्षत्र दो राशियों में फैले हैं, जैसे कृत्तिका, पुनर्वसु, चित्रा, विशाखा।
  • नक्षत्र एक हो, पर पद अलग।

इनमें दोष पूरा नहीं मिटता, तीव्रता घटती है; इसलिए हमारी गणना यहाँ आधे, यानी 4 गुण देती है, और लिखती है कि कौन-सी छूट लगी।

पारंपरिक उपाय शिव उपासना और महामृत्युंजय मंत्र का जप है:

"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥"

रोज़ एक माला (108 बार), कम से कम 43 दिन बिना नागा; साथ में सोमवार को शिवलिंग पर जल और सामर्थ्य से अन्न-दान। परंपरा नाड़ी को स्वास्थ्य से जोड़ती है, इसलिए साफ़ रहे: ज्योतिष के उपाय डॉक्टर के इलाज के साथ हैं, उसकी जगह नहीं। विवाह से पहले दोनों की सामान्य स्वास्थ्य-जाँच करवाना भी समझदारी है।

भकूट दोष

दोनों चंद्र-राशियाँ आपस में 2-12, 6-8 या 5-9 की दूरी पर हों तो भकूट दोष बनता है। परंपरा में 6-8 को आपसी खिंचाव से, 2-12 को ख़र्च और पैसे की सोच के अंतर से, और 5-9 को विचारों और संतान-पक्ष की अलग अपेक्षाओं से जोड़ा गया। ये प्रवृत्तियाँ हैं, भविष्यवाणी नहीं।

इनमें से कोई एक बात हो तो दोष कटता है और पूरे 7 गुण लौटते हैं:

  • दोनों राशियों का स्वामी एक ग्रह हो — जैसे मेष-वृश्चिक (मंगल), वृषभ-तुला (शुक्र), मकर-कुंभ (शनि)।
  • दोनों राशि-स्वामी आपस में मित्र हों।
  • दोनों नक्षत्रों का स्वामी एक हो।

छूट न लगे तो दोनों राशि-स्वामी ग्रहों के मंत्र और शिव-पार्वती की संयुक्त पूजा बताई जाती है, क्योंकि उन्हें दाम्पत्य का आदर्श माना गया है। सोमवार को दोनों साथ दीपक जलाकर जपें:

"ॐ नमः शिवाय"

गण दोष

मनुष्य-राक्षस का मेल 0 और देव-राक्षस का 1 — यह गण दोष है। इस पर भी वही छूटें लगती हैं: एक ही चंद्र-राशि, एक नक्षत्र-स्वामी, या मित्र राशि-स्वामी; तब पूरे 6 गुण। छूट न लगे तो गणेश उपासना:

"ॐ गं गणपतये नमः"

और यह समझ कि गुस्से के पल में बात थोड़ी देर टाल देना हार नहीं, आपसी सम्मान है।

मांगलिक दोष — कैसे बनता है, और कब कटता है

मांगलिक दोष (मंगल दोष या कुज दोष) 36 गुणों से अलग, मंगल की स्थिति से देखा जाता है। मंगल साहस, ऊर्जा और तुरंत प्रतिक्रिया का ग्रह है; विवाह से जुड़े भावों में हो तो यह ऊर्जा दाम्पत्य में तीखापन ला सकती है।

कब बनता है

मंगल पहले, दूसरे, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें भाव (कुंडली के घर) में हो तो कुंडली मांगलिक कही जाती है। ये भाव लग्न से ही नहीं, चंद्र और शुक्र से भी गिने जाते हैं। हर भाव का असर अलग बताया गया है:

  • पहला (तन, स्वभाव): जल्दी आवेग, अपनी बात पर अड़ना।
  • दूसरा (वाणी, कुटुंब): बोल में तीखापन।
  • चौथा (घर, सुख): घर के माहौल में बेचैनी।
  • सातवाँ (जीवनसाथी): सीधे साथी से व्यवहार पर — सबसे असरदार माना गया।
  • आठवाँ (अचानक घटनाएँ): उतार-चढ़ाव, आपसी भरोसे की परख।
  • बारहवाँ (व्यय, शय्या-सुख): ख़र्च और निकटता से जुड़ी अपेक्षाएँ।

केवल लग्न से गिनें तो भी लगभग आधी कुंडलियों में मंगल इन छह में से किसी भाव में मिलता है। मांगलिक होना कोई अनोखी बात नहीं।

कब कटता है

कुछ स्थितियाँ दोष को पूरा रद्द करती हैं, कुछ केवल तीव्रता घटाती हैं:

स्थितिअसर
दोनों की कुंडली मांगलिकदोष आपस में कट जाता है
मंगल अपनी राशि (मेष, वृश्चिक) मेंदोष रद्द
मंगल उच्च राशि (मकर) मेंदोष रद्द
सातवें भाव में मंगल कर्क, सिंह, धनु या मीन मेंपरंपरा में रद्द माना गया
मंगल पर गुरु की दृष्टि या गुरु का साथतीव्रता काफ़ी घटती है
मंगल द्विस्वभाव राशि (मिथुन, कन्या, धनु, मीन) मेंतीव्रता घटती है
मंगल के साथ चंद्रतीखापन कुछ कम

उलटी दिशा का नियम भी है: मंगल पर शनि की दृष्टि तीव्रता बढ़ाती है। अच्छा मिलान ये सब जाँचता है; केवल "मंगल सातवें में है" देखकर मांगलिक कह देना आधी बात है।

एक ओर मांगलिक हो तो

इसका अर्थ इतना है कि मंगल की ऊर्जा को सही दिशा देनी है। किसी एक को दोषी ठहराने की कोई बात नहीं — यह दोनों के मिलकर सँभालने की बात है। सरल उपाय:

  • मंगलवार को हनुमान चालीसा का पाठ।
  • मंगल का बीज मंत्र, रोज़ एक माला, कम से कम 43 दिन:

"ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः"

  • मंगलवार को सामर्थ्य से मसूर की दाल या गुड़ का दान।
  • मंगलवार का व्रत तभी, जब स्वास्थ्य ठीक हो।

कई परिवारों में मान्यता है कि 28 वर्ष के बाद मंगल का आवेग नरम पड़ता है। इसे परंपरा की मान्यता ही समझिए, हर कुंडली पर लगने वाला नियम नहीं।

गुणों से आगे — सातवाँ भाव, शुक्र-गुरु, नवांश और दशा

36 गुण बताते हैं कि दो मन कितने मिलते हैं। पर विवाह साथी से व्यवहार, घर का सुख और जीवन का समय भी है। इसलिए गुणों के बाद ये बातें देखी जाती हैं।

सातवाँ भाव

यह जीवनसाथी का भाव है। इसमें कौन-से ग्रह हैं, किसकी दृष्टि (ग्रह की नज़र) है, और इसका स्वामी कितना बलवान है — इससे दिखता है कि व्यक्ति साथी से कैसा व्यवहार करता है और क्या चाहता है। सातवें पर गुरु की दृष्टि बड़ा सहारा है; शनि की दृष्टि देरी या ज़िम्मेदारी का भाव बढ़ाती है। यह सब सही जन्म-समय से ही पक्का दिखता है।

शुक्र और गुरु

शुक्र विवाह, प्रेम, सुख-सुविधा और आकर्षण का कारक है। परंपरा में स्त्री की कुंडली में गुरु पति-सुख का कारक भी है। दोनों बलवान हों — अपनी या उच्च राशि में, शुभ भाव में — तो दाम्पत्य में मिठास के संकेत बढ़ते हैं। शुक्र मीन में उच्च और कन्या में नीच (कमज़ोर) होता है; गुरु कर्क में उच्च और मकर में नीच। कमज़ोर हों तो शुक्रवार को शुक्र का और गुरुवार को गुरु का मंत्र:

"ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः"

"ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः"

नवांश

नवांश (हर राशि को नौ भागों में बाँटकर बनी कुंडली, D9) विवाह की सबसे अहम विभाग-कुंडली है। जन्म-कुंडली में कमज़ोर शुक्र नवांश में बलवान हो, तो बात सँभल जाती है। नवांश-लग्न औसतन लगभग हर 13 मिनट में बदलता है, इसलिए यहाँ समय की शुद्धता और ज़रूरी है।

दशा और गोचर

विंशोत्तरी दशा (120 वर्ष का ग्रह-काल चक्र) बताती है कि किस दौर में कौन-सा ग्रह प्रमुख है। जन्म के समय चंद्र जिस नक्षत्र में होता है, उसी के स्वामी से दशा शुरू होती है। क्रम: केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चंद्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 वर्ष। विवाह के आसपास दोनों की दशाएँ देखी जाती हैं — किसका दौर भारी है, और कब दोनों के अनुकूल समय साथ आते हैं। शनि का गोचर (आज आकाश में चलना), जैसे साढ़े साती, भी साथ पढ़ा जाता है। दशा सज़ा नहीं, मौसम है; पता हो कि किसका मौसम भारी है, तो दूसरा धीरज से साथ दे पाता है।

पाप-साम्य

यह दोनों कुंडलियों में कठोर ग्रहों (मंगल, शनि, राहु, केतु, सूर्य) के असर का संतुलन है। एक की कुंडली में विवाह-भावों पर बहुत भार हो और दूसरे में न हो, तो परंपरा इसे असंतुलन मानती है; दोनों में लगभग बराबर हो तो संतुलन।

कम गुण का अर्थ "विवाह मत करो" नहीं — समझ और उपाय

हमारी सबसे साफ़ बात यही है: कुंडली मिलान रास्ता समझाने का औज़ार है, दरवाज़ा बंद करने का नहीं। शास्त्र जहाँ दोष बताता है, वहीं उसका परिहार (निवारण) भी लिखता है। कम गुण दिखें तो यह क्रम अपनाइए:

  1. कौन-से कूट कम हैं — भारी (नाड़ी, भकूट, गण) या हल्के (वर्ण, वश्य, तारा, योनि)?
  2. भारी कूट के शून्य पर कोई छूट लगी या नहीं?
  3. मांगलिक स्थिति और उसकी छूट क्या है?
  4. सातवाँ भाव, शुक्र-गुरु और दशा कैसे हैं? कई बार गुण कम पर ये मज़बूत होते हैं।
  5. जो शेष रहे, उसका उपाय और व्यवहार का तरीका समझिए।
  6. बड़ा निर्णय हो तो योग्य ज्योतिषी को पूरी कुंडली दिखाइए।
जो बात ध्यान माँगेसरल शास्त्रीय उपाय
नाड़ी दोषमहामृत्युंजय मंत्र, सोमवार को शिव पूजा, अन्न-दान
भकूट दोषदोनों राशि-स्वामियों के मंत्र, शिव-पार्वती पूजा
गण का अंतरगणेश मंत्र, बुधवार को गणेश पूजा
ग्रह-मैत्री कमदोनों राशि-स्वामियों के मंत्र, चंद्र का मंत्र
मांगलिक (एक ओर)हनुमान चालीसा, मंगल बीज मंत्र, मंगलवार को दान
शुक्र कमज़ोरशुक्रवार को शुक्र मंत्र, सुहाग की वस्तुओं का दान
गुरु कमज़ोरगुरुवार को गुरु मंत्र, विष्णु पूजा, चने की दाल का दान

मन की शांति के लिए, ख़ासकर जब ग्रह-मैत्री या गण कम हो, चंद्र का मंत्र:

"ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः"

और दाम्पत्य के लिए गुरुवार को विष्णु सहस्रनाम या यह मंत्र:

"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"

उपाय के नियम

  • जप रोज़ एक माला (108 बार), कम से कम 43 दिन बिना नागा।
  • व्रत तभी, जब स्वास्थ्य अनुमति दे।
  • रत्न पहनना हो तो किसी जानकार को पूरी कुंडली दिखाकर ही — जिस ग्रह को शांत करना हो, उसका रत्न उलटा असर कर सकता है।
  • कोई उपाय पक्के फल का वादा नहीं करता। नियम और श्रद्धा से किया उपाय सहारा देता है; रिश्ता आपसी सम्मान और बातचीत से चलता है।

वर्ण, वश्य, तारा और योनि जैसे छोटे कूट कम हों, तो उनके लिए अलग उपाय की ज़रूरत आम तौर पर नहीं मानी जाती — वहाँ समझ और थोड़ा लचीलापन काफ़ी है।

आम भ्रम — और उनकी सच्चाई

भ्रम: 18 से कम गुण हों तो विवाह हो ही नहीं सकता। सच: 18 दहलीज़ है, फ़ैसला नहीं। कई कम गुण वाले मिलानों में भारी कूट पूरे होते हैं या उनकी छूट लगती है।

भ्रम: 30 से ऊपर गुण हों तो और कुछ देखना नहीं। सच: ऊँचे गुण के साथ भी बिना छूट की नाड़ी, एक ओर मांगलिक, या कमज़ोर सातवाँ भाव हो सकता है।

भ्रम: मांगलिक लड़की या लड़के से विवाह अशुभ है। सच: मांगलिक होना बहुत आम है, कई स्थितियों में दोष कटता है, और दोनों मांगलिक हों तो आपस में शांत होता है। किसी व्यक्ति को अशुभ कहना शास्त्र नहीं।

भ्रम: नाम के पहले अक्षर से कुंडली मिल जाती है। सच: नाम-राशि से मिलान लोक-रीत है, जो जन्म-विवरण न होने पर काम आती थी। आज ज़्यादातर नाम नक्षत्र-अक्षर देखकर नहीं रखे जाते, इसलिए जन्म-विवरण हो तो असली चंद्र-राशि और नक्षत्र से ही मिलान कीजिए।

भ्रम: ऑनलाइन मिलान पंडित जी के मिलान से कम सही है। सच: गणित वही है, और कंप्यूटर कला-विकला तक गिनता है। अंतर समझाने में आता है — इसलिए हर अंक कारण के साथ होना चाहिए।

भ्रम: नाड़ी दोष का मतलब संतान नहीं होगी। सच: ऐसा कोई पक्का नियम नहीं। नाड़ी प्रकृति के मेल की प्रवृत्ति बताती है, और कई बार उसकी छूट भी लगती है। स्वास्थ्य और संतान के प्रश्न डॉक्टर से पूछिए।

हमारी रिपोर्ट कैसे पढ़ें — पूरा परिणाम साइट पर, वही PDF में

भुगतान होते ही पूरा परिणाम उसी पन्ने पर खुलता है:

  • 36 में से गुण — कुल अंक।
  • तुला हुआ निर्णय — उत्तम मेल, शुभ मेल, मध्यम मेल या ध्यान देने योग्य; नीचे तालिका कि हर गणना का भार क्या था, वह किस ओर गई और क्या कहा।
  • आठों कूट — हर कूट के अंक और एक पंक्ति में कारण, जैसे कौन-सी छूट लगी।
  • मांगलिक मिलान — किसकी कुंडली मांगलिक है, कौन-सी छूट लगी, दोष शेष है या नहीं।
  • "यह अंक कितना पक्का है" — जन्म-समय आधा घंटा आगे-पीछे करके देखा जाता है कि गुण बदलते हैं या नहीं। न बदलें तो निर्णय स्थिर है; बदलें तो पहले समय की पुष्टि कीजिए।

पढ़ने का अच्छा क्रम: पहले निर्णय, फिर भारी कूट, फिर मांगलिक, फिर समय की पक्काई। कुल अंक को सबसे आख़िर में तौलिए।

पूरी रिपोर्ट PDF में है — आठों कूट अलग-अलग, नाड़ी, भकूट, गण दोष और उनकी छूट, मांगलिक मिलान, पाप-साम्य, विवाह का समय; फिर दोनों की अपनी कुंडली, विवाह से जुड़े भावों का फल, दशा-अंतर्दशा, और जो दोष मिले उनके उपाय पूरी विधि सहित। भुगतान Razorpay से एक बार, PDF तुरंत उतरती है, और सात दिन में दोबारा भी ली जा सकती है।

विवाह के बाद भी मिलान — पति-पत्नी, सास-बहू और गृह-शान्ति

विवाह के बाद घर में जो सवाल उठते हैं — छोटी बातों पर बार-बार बहस, सास-बहू में अनबन, घर का भारी माहौल — उनमें भी दोनों की कुंडली साथ देखना काम का है। बस अब सवाल "विवाह करें या नहीं" नहीं, बल्कि "टकराव कहाँ से उठता है और कैसे सँभले" होता है। इसलिए हमारी साइट पर कुंडली मिलान के अलावा तीन मिलान और हैं।

पति-पत्नी कुंडली मिलान

यह दोनों की कुंडली में स्वभाव के कूट, मंगल, सातवाँ भाव, विवाह-कारक शुक्र और गुरु, चंद्र (मन), दूसरा भाव (वाणी), और अभी की दशा व शनि-गोचर देखता है। यह कभी अलग होने की सलाह नहीं देता, किसी एक को दोषी नहीं ठहराता; बताता है कि टकराव किस बात से उठता है, किसका भारी दौर कब तक है, और कौन-सा उपाय किसके लिए है। इसकी PDF में उपायों का सप्ताह का क्रम भी है।

सास-बहू कुंडली मिलान

यह 36 गुणों वाला नहीं है — अष्टकूट वर-वधू के लिए बना है। सास-बहू में स्वभाव के चार कूट लगते हैं: गण (6), ग्रह-मैत्री (5), भकूट (7) और तारा (3) — कुल 21 अंक। साथ में दोनों का चंद्र, एक-दूसरे का भाव (बहू की कुंडली में सास दसवें से, सास की कुंडली में बहू ग्यारहवें से), घर का भाव, वाणी और अभी का समय। रिपोर्ट दोनों को बराबर देखती है और दोनों के लिए उपाय बताती है।

गृह-शान्ति कुंडली मिलान

घर के कोई भी दो सदस्य — जिनसे घर का माहौल सबसे ज़्यादा जुड़ा हो। यह स्वभाव-मेल, चंद्र, चौथा भाव (घर की शांति), दूसरा भाव (वाणी, कुटुंब), पितृ दोष, कालसर्प योग, और अभी की दशा व शनि-गोचर देखता है। कालसर्प योग प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलता — यह बाद की परंपरा है, और रिपोर्ट उसे परंपरा के रूप में ही बताती है।

स्थितिउपयुक्त मिलान
रिश्ता तय होने से पहलेविवाह कुंडली मिलान
विवाह के बाद आपसी खटास, या पहले मिलान हुआ ही नहींपति-पत्नी कुंडली मिलान
सास-बहू में बार-बार अनबनसास-बहू कुंडली मिलान
घर में बिना बड़ी वजह के क्लेश, या किन्हीं दो सदस्यों में तनावगृह-शांति कुंडली मिलान

ईमानदारी की बात: हमारी कोई रिपोर्ट धन, संतान या पढ़ाई की भविष्यवाणी नहीं करती। वह दोनों की कुंडली से रिश्ता, मन, अभी का समय और उनके उपाय बताती है।

हमारी साइट पर ऑनलाइन कुंडली मिलान — क़दम-दर-क़दम

  1. मुखपृष्ठ पर कुंडली मिलान खोलिए; विवाह हो चुका हो तो ऊपर के तीन में से अपना मिलान चुनिए। खाता बनाने की ज़रूरत नहीं।
  2. भाषा चुनिए — हिन्दी, English, मराठी या ગુજરાતી।
  3. वर का नाम, जन्म-तारीख़ और समय भरिए; समय याद न हो तो ख़ाली छोड़िए।
  4. जन्म-स्थान लिखना शुरू कीजिए — शहरों की सूची अपने-आप खुलती है; गाँव न दिखे तो पास का ज़िला-मुख्यालय चुनिए।
  5. यही सब वधू के लिए भरिए।
  6. बटन दबाइए — गणना होते ही "आपका कुंडली मिलान तैयार है" आता है; भुगतान कीजिए।
  7. भुगतान होते ही पूरा परिणाम उसी पन्ने पर खुलता है, और वही पूरी रिपोर्ट PDF में उतरती है।
  8. परिणाम ऊपर बताए क्रम से पढ़िए; उपायों का पूरा विधान PDF में है।
  9. रिपोर्ट परिवार के साथ पढ़िए; बड़ी बात पर योग्य ज्योतिषी की राय भी लीजिए।

विवाह से पहले हम हर परिवार से यही कहते हैं: केवल अंक मत देखिए, पूरा मिलान बनवाइए। दोनों की कुंडली साथ रखकर ही पता चलता है कि कौन-सी कमी शास्त्र से कटती है, कौन-सी उपाय माँगती है, और कौन-सी बस समझदारी से निभ जाती है — अकेली कुंडली यह नहीं बता सकती, क्योंकि मिलान दो लोगों का होता है। विवाह हो चुका हो, तो पति-पत्नी कुंडली मिलान यही काम आज के सवालों के लिए करता है। कुंडली मिलान ज्योतिष की टीम ने ये रिपोर्टें इसी सोच से बनाई हैं कि हर परिवार डर से नहीं, समझ से निर्णय ले।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

ऑनलाइन कुंडली मिलान के लिए क्या-क्या चाहिए?

दोनों की जन्म-तारीख़, जन्म-समय और जन्म-स्थान। नाम केवल रिपोर्ट में पहचान के लिए है। समय जितना पक्का होगा, मिलान उतना सटीक होगा। समय याद न हो तो भी गुण मिलान हो जाता है, क्योंकि आठों कूट चंद्र से बनते हैं; बस लग्न और भाव वाली बातें तब पक्की नहीं होतीं।

क्या 18 से कम गुण होने पर विवाह नहीं करना चाहिए?

ऐसा नहीं है। 18 परंपरा की न्यूनतम सीमा है, अंतिम फ़ैसला नहीं। देखना यह है कि कमी भारी कूट (नाड़ी, भकूट) में है या हल्के (वर्ण, वश्य) में, और क्या उस पर कोई शास्त्रीय छूट लगी है। जो शेष रहे, उसके उपाय हैं। हमारी रिपोर्ट किसी भी विवाह से मना नहीं करती।

नाड़ी दोष हो तो क्या करें?

पहले देखिए कि छूट लगी या नहीं — एक राशि पर अलग नक्षत्र, एक नक्षत्र पर अलग राशि, या एक नक्षत्र पर अलग पद; तब दोष हल्का होता है। उपाय में महामृत्युंजय मंत्र का जप, सोमवार को शिव पूजा और अन्न-दान। स्वास्थ्य के प्रश्न डॉक्टर से पूछिए; ज्योतिष के उपाय इलाज के साथ हैं, उसकी जगह नहीं।

मांगलिक दोष कब कट जाता है?

जब दोनों की कुंडली मांगलिक हो, या मंगल अपनी राशि (मेष, वृश्चिक) अथवा उच्च राशि (मकर) में हो। गुरु की दृष्टि, द्विस्वभाव राशि या चंद्र का साथ तीव्रता घटाते हैं। हमारा मिलान ये नियम जाँचकर बताता है कि दोष शेष है या नहीं, और शेष हो तो उपाय क्या है।

अलग-अलग वेबसाइटों पर गुण अलग क्यों आते हैं?

तीन आम कारण हैं: अलग अयनांश (हम लाहिरी लेते हैं), जन्म-समय या जगह की भूल, और तारा, ग्रह-मैत्री, गण व वश्य की सारणियों में परंपराओं का मामूली मतभेद। एक-दो गुण का अंतर सामान्य है। बड़ा अंतर दिखे तो जन्म-विवरण दोबारा जाँचिए, ख़ासकर आधी रात के आसपास के जन्म की तारीख़।

विवाह हो चुका है, क्या अब मिलान का कोई लाभ है?

हाँ। तब सवाल "विवाह करें या नहीं" से बदलकर "टकराव कहाँ से उठता है" हो जाता है। पति-पत्नी कुंडली मिलान दोनों का स्वभाव, मंगल, सातवाँ भाव, मन और अभी की दशा देखकर उपाय बताता है। सास-बहू के लिए अलग मिलान है (चार कूट, 21 अंक), और घर के किन्हीं दो सदस्यों के लिए गृह-शांति मिलान।

साइट पर क्या दिखता है और PDF में क्या मिलता है?

भुगतान होते ही पूरा परिणाम साइट पर खुलता है: 36 में से गुण, तुला हुआ निर्णय, आठों कूट, मांगलिक मिलान, और यह कि जन्म-समय की भूल से अंक कितना बदल सकता है। पूरी PDF में हर कूट और दोष विस्तार से, उनकी शास्त्रीय छूट, दोनों की अपनी कुंडली, दशा, और उपायों का पूरा विधान है।

दोनों का जन्म-विवरण भरिए

तारीख़, समय और जगह — तीनों जितने सही होंगे, मिलान उतना ही सटीक। समय याद न हो तो भी चल जाएगा।

अभी मिलान कीजिए