1
वर्ण
मन और आध्यात्मिक स्तर
राशि से चार वर्ण बनते हैं — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। जल-राशियाँ ब्राह्मण, अग्नि क्षत्रिय, पृथ्वी वैश्य, वायु शूद्र। वर का वर्ण वधू के बराबर या ऊपर हो तो गुण मिलता है। यह जाति नहीं, मन की प्रवृत्ति का स्तर है।
अष्टकूट मिलान
कुंडली मिलान वर और वधू की चंद्र-राशि और जन्म-नक्षत्र पर होता है — पूरी कुंडली पर नहीं। इन्हीं दो से आठ कूट बनते हैं, और आठों कूटों के गुण जोड़कर छत्तीस बनते हैं।
1
मन और आध्यात्मिक स्तर
राशि से चार वर्ण बनते हैं — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। जल-राशियाँ ब्राह्मण, अग्नि क्षत्रिय, पृथ्वी वैश्य, वायु शूद्र। वर का वर्ण वधू के बराबर या ऊपर हो तो गुण मिलता है। यह जाति नहीं, मन की प्रवृत्ति का स्तर है।
2
आपसी आकर्षण और प्रभाव
बारह राशियाँ पाँच वर्गों में बँटती हैं — चतुष्पद, मनुष्य, जलचर, वनचर, कीट। धनु और मकर आधी-आधी बँटी हैं, इसलिए चंद्र का अंश भी देखा जाता है। यह बताता है कि कौन किस पर सहज प्रभाव रखेगा।
3
एक-दूसरे का भाग्य और स्वास्थ्य
वर के नक्षत्र से वधू का, और वधू से वर का — दोनों दिशाओं में गिनती होती है, नौ से भाग देकर। विपत्, प्रत्यक् और वध अशुभ हैं; जन्म, सम्पत्, क्षेम, साधक, मित्र और अतिमित्र शुभ। हर दिशा के डेढ़ गुण।
4
स्वाभाविक अनुकूलता
सत्ताईस नक्षत्रों की चौदह योनियाँ हैं — अश्व, गज, मेष, सर्प, श्वान, मार्जार, मूषक, गौ, महिष, व्याघ्र, मृग, वानर, नकुल, सिंह। एक ही योनि पूरे चार गुण; शत्रु-योनि (गौ-व्याघ्र, सर्प-नकुल जैसी सात जोड़ियाँ) शून्य।
5
मन की मित्रता
दोनों की चंद्र-राशि के स्वामी एक-दूसरे को मित्र, सम या शत्रु मानते हैं — और यह दोनों ओर से देखा जाता है, क्योंकि यह रिश्ता हमेशा बराबर नहीं होता: चंद्र बुध को मित्र मानता है, पर बुध चंद्र को शत्रु — ऐसी जोड़ी को 1 गुण।
6
स्वभाव का मेल
नक्षत्र तीन गणों में बँटे हैं — देव, मनुष्य, राक्षस। एक ही गण हो तो छहों गुण; देव वर व मनुष्य वधू में छह, मनुष्य वर व देव वधू में पाँच; देव-राक्षस में एक; मनुष्य-राक्षस में शून्य। शून्य आने पर भी निवारण के शास्त्रीय नियम हैं।
7
प्रेम, संतान और समृद्धि
दोनों की चंद्र-राशियों के बीच की दूरी। 6-8, 2-12 और 5-9 का अंतर दोष माना गया है। पर एक ही राशि हो, नक्षत्र-स्वामी एक हो, या राशि-स्वामी एक ही हों या परस्पर मित्र हों — तो दोष निरस्त हो जाता है।
8
स्वास्थ्य और संतान-सुख
नक्षत्र तीन नाड़ियों में बँटे हैं — आदि, मध्य, अन्त्य। दोनों की नाड़ी अलग हो तो पूरे आठ गुण; एक हो तो शून्य। यह अष्टकूट का सबसे भारी कूट है और गुणों की संख्या से नहीं कटता।
| गुण | क्या माना जाता है |
|---|---|
| 18 से कम | गिनती कम — पूरा पाठ आगे |
| 18 – 24 | मध्यम — उपायों सहित |
| 25 – 32 | अच्छा मेल |
| 33 – 36 | उत्तम मेल |
पर सिर्फ़ गिनती काफ़ी नहीं। नाड़ी, भकूट या गण का शून्य आना गुणों की संख्या से नहीं कटता — 28 गुण मिलने पर भी यदि नाड़ी दोष अनिरस्त है तो शास्त्र उसे निर्बाध स्वीकृति नहीं मानता। इसीलिए हमारा मिलान इन तीनों की अलग जाँच करता है।
मिलान का सबसे आम तरीक़ा यह है कि छत्तीस में से गुण गिन लिए जाएँ और उसी संख्या पर बात ख़त्म हो जाए। हम ऐसा नहीं करते। हमारा निर्णय 39 अलग-अलग मतों को भार-सहित तोलकर बनता है — सप्तम भाव, नवांश, सप्तांश, कलत्र-कारक का बल, विंशोपक, जैमिनी का उपपद और दाराकारक, दशा-काल, मांगलिक, मारण कारक स्थान, बीज-क्षेत्र स्फुट, और बाक़ी। इन सबका कुल भार 29.7 है, और उसमें छत्तीसों गुण मिलकर एक ही मत हैं — पूरे निर्णय का लगभग 3.4%। नाड़ी, भकूट और गण के अपने अलग मत ज़रूर हैं, क्योंकि उनका शून्य गुणों की संख्या से नहीं ढकता। पर वे भी 39 में से एक-एक ही हैं। यह बनावट जान-बूझकर है: अगर गुण-गिनती पूरे निर्णय का बीसवाँ हिस्सा भी नहीं है, तो कम गुण देखकर किसी को विवाह से रोकना गणित से ही ग़लत है।
तारीख़, समय और जगह — तीनों जितने सही होंगे, मिलान उतना ही सटीक। समय याद न हो तो भी चल जाएगा।