मेरी शादी कब होगी — इस प्रश्न का सच्चा उत्तर यह है कि कुंडली विवाह की समय-खिड़की बताती है, तारीख़ नहीं। जब दशा (जीवन का चलता ग्रह-दौर) सातवें भाव के स्वामी, शुक्र या गुरु से जुड़ती है, और उसी समय गुरु का गोचर सातवें भाव को छूता है, तब विवाह के योग सबसे खुले माने जाते हैं। ऐसी खिड़की प्रायः दो-तीन वर्ष की होती है।
बहुत से लोग इंटरनेट पर 'meri shadi kab hogi' लिखते हैं, और जवाब में कहीं "छह महीने में" मिलता है, कहीं कोई पक्की उम्र। ऐसे वादे ज्योतिष नहीं करता। कुंडली मिलान ज्योतिष की टीम ने यह लेख इसलिए लिखा है कि आप ख़ुद समझ सकें कि विवाह-काल असल में कैसे पढ़ा जाता है — कौन-से ग्रह देखे जाते हैं, दशा का क्रम कैसे गिना जाता है, गोचर कब साथ देता है, और कुछ लोगों का विवाह "देर से" क्यों होता है।
कुंडली विवाह का समय कैसे बताती है — तीन परतें
ज्योतिष में किसी भी बड़ी घटना का समय तीन परतों में पढ़ा जाता है। इन्हें खेती के उदाहरण से समझना आसान है।
- योग — बीज। जन्म-कुंडली बताती है कि विवाह का योग (ग्रहों का वह मेल जो किसी फल का संकेत दे) कैसा है। सातवाँ भाव, उसका स्वामी, शुक्र, गुरु और नवांश कितने बलवान हैं — यह जीवन भर वही रहता है।
- दशा — मौसम। विंशोत्तरी दशा बताती है कि जीवन के किस दौर में कौन-सा ग्रह प्रमुख है। जब विवाह से जुड़े ग्रह का दौर आता है, तब बीज को उसका मौसम मिलता है।
- गोचर — बारिश का दिन। गोचर (आज आकाश में ग्रहों का चलना) बताता है कि उस मौसम के भीतर कौन-सा वर्ष ज़्यादा खुला है। विवाह में गुरु और शनि का गोचर सबसे अहम माना गया है।
तीनों एक साथ मिलें, तभी जानकार ज्योतिषी कहता है कि "यह समय विवाह के अनुकूल है"। केवल गोचर देखकर — जैसे "गुरु सातवें में आ गया, अब शादी पक्की" — कहना आधी बात है; दशा साथ न दे, तो अच्छा गोचर भी हल्का सहारा भर बनता है।
इसलिए कुंडली का उत्तर हमेशा एक दौर होता है — जैसे "लगभग 27 से 30 वर्ष की आयु के बीच" — कोई एक दिन नहीं। तारीख़ बाद में मुहूर्त (शुभ घड़ी) से चुनी जाती है।
विवाह का योग कब बनता है — कुंडली में किन बातों को देखा जाता है
कुंडली में शादी का योग किसी एक ग्रह से तय नहीं होता। पाँच-छह संकेत साथ पढ़े जाते हैं, और 'vivah yog' का असली अर्थ इन सबका मिला-जुला बल है।
सातवाँ भाव और सप्तमेश
सातवाँ भाव (कुंडली का सातवाँ घर) जीवनसाथी और साझेदारी का भाव है। उसकी राशि का स्वामी ग्रह सप्तमेश कहलाता है। समय के लिए सबसे सीधा संकेत यही है: सप्तमेश की दशा या अंतर्दशा आए, तो सातवाँ भाव जागता है। सप्तमेश अपनी या उच्च राशि में हो, या केंद्र-त्रिकोण (पहले, चौथे, पाँचवें, सातवें, नौवें, दसवें) भाव में बैठा हो, तो उसका दौर सहजता से फल देता है। छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो, तो फल अक्सर कुछ प्रतीक्षा के बाद आता है।
शुक्र और गुरु — विवाह के कारक
कारक का अर्थ है किसी विषय का स्वाभाविक प्रतिनिधि ग्रह। शुक्र प्रेम, आकर्षण और दाम्पत्य-सुख का कारक है — हर कुंडली में। परंपरा में पुरुष की कुंडली में पत्नी का मुख्य कारक शुक्र, और स्त्री की कुंडली में पति का मुख्य कारक गुरु माना गया है। विवाह-काल में दोनों की दशा देखी जाती है, बस कुंडली के हिसाब से एक को ज़्यादा भार मिलता है।
सातवें भाव में बैठे या उसे देखते ग्रह
जो ग्रह सातवें भाव में बैठा हो, या जिसकी दृष्टि (ग्रह की नज़र) सातवें पर पड़ती हो, उसकी दशा भी विवाह-भाव को छूती है। हर ग्रह अपने से सातवें भाव को देखता है; गुरु पाँचवें और नौवें को भी, शनि तीसरे और दसवें को भी, मंगल चौथे और आठवें को भी। सातवें भाव में हर ग्रह का अलग फल हमारे सप्तम भाव वाले लेख में है।
नवांश — विवाह की विभाग-कुंडली
नवांश (हर राशि को नौ हिस्सों में बाँटकर बनी कुंडली, जिसे D9 भी कहते हैं) विवाह की सबसे अहम विभाग-कुंडली मानी गई है। समय में इसके दो काम हैं: नवांश-लग्न का स्वामी भी विवाह की दशा दे सकता है, और दशा का ग्रह नवांश में भी बलवान हो तो खिड़की ज़्यादा भरोसे की होती है। दोनों में कमज़ोर हो, तो खिड़की रहती है, पर उसका बल कम आँका जाता है। जो ग्रह दोनों कुंडलियों में एक ही राशि में हो, वह वर्गोत्तम कहलाता है और फल देने में मज़बूत माना जाता है।
जैमिनी के दो संकेत — दाराकारक और उपपद
महर्षि जैमिनी की पद्धति दो और संकेत जोड़ती है। दाराकारक — सात ग्रहों में जिसका अंश (अपनी राशि के भीतर की डिग्री) सबसे कम हो, वह जीवनसाथी का कारक माना जाता है। उपपद — बारहवें भाव का आरूढ़ (एक विशेष गणना से निकला बिंदु), जिसे विवाह का पद कहा गया है; उसका स्वामी भी समय में देखा जाता है। ये पाराशरी संकेतों की पुष्टि करते हैं, उनकी जगह नहीं लेते।
| संकेत | क्या है | समय में भूमिका |
|---|---|---|
| सप्तमेश | सातवें भाव की राशि का स्वामी | उसकी दशा-अंतर्दशा सबसे सीधा संकेत |
| शुक्र | प्रेम और दाम्पत्य का कारक | हर कुंडली में; पुरुष की कुंडली में मुख्य |
| गुरु | शुभता और विवेक; परंपरा में पति का कारक | हर कुंडली में; स्त्री की कुंडली में मुख्य |
| सातवें में बैठे या उसे देखते ग्रह | विवाह-भाव से सीधा संबंध | उनकी दशा भी भाव को जगाती है |
| नवांश-लग्नेश | नवांश के लग्न का स्वामी | पुष्टि करने वाली दशा |
| दाराकारक, उपपद-स्वामी | जैमिनी पद्धति के संकेत | पुष्टि करने वाली दशा |
शास्त्र क्या कहता है
बृहत्पाराशर होराशास्त्र (महर्षि पराशर का मूल ग्रंथ) का सामान्य नियम है कि ग्रह अपनी दशा में उन भावों का फल देता है जिनका वह स्वामी है, जिनमें वह बैठा है और जिन्हें वह देखता है। विवाह-काल पढ़ने का पूरा तरीका इसी नियम पर टिका है। उसी ग्रंथ के सप्तम-भाव वाले अध्याय में कुछ योगों से विवाह का वर्ष तक गिनाया गया है, और उनमें कई वर्ष बहुत छोटी आयु के हैं — वह उस समय के समाज की बात थी। आज विवाह-काल दशा और गोचर से पढ़ा जाता है, और क़ानूनी उम्र (लड़की 18, लड़का 21) से पहले कोई खिड़की नहीं मानी जाती। फलदीपिका भी सातवें भाव, उसके स्वामी और शुक्र को ही विवाह-विचार का केंद्र रखती है।
दशा और अंतर्दशा — विवाह-काल की असली घड़ी
विंशोत्तरी दशा 120 वर्ष का चक्र है। जन्म के क्षण चंद्र जिस नक्षत्र में हो, उसके स्वामी ग्रह से दशा शुरू होती है, और फिर एक तय क्रम में आगे बढ़ती है। हर महादशा (बड़ी दशा) के भीतर नौ अंतर्दशाएँ (छोटी दशाएँ) होती हैं — उसी क्रम में, और पहली अंतर्दशा उसी ग्रह की। अंतर्दशा की लंबाई का सीधा सूत्र है:
अंतर्दशा के वर्ष = महादशा के वर्ष × अंतर्दशा-ग्रह के वर्ष ÷ 120
जैसे शनि की 19 वर्ष की महादशा में शुक्र की अंतर्दशा = 19 × 20 ÷ 120 = लगभग 3 वर्ष 2 महीने। शुक्र की 20 वर्ष की महादशा में चंद्र की अंतर्दशा = 20 × 10 ÷ 120 = 1 वर्ष 8 महीने।
महादशा मौसम तय करती है, और अंतर्दशा उस मौसम का हिस्सा चुनती है। विवाह ज़्यादातर तब होता है जब महादशा या अंतर्दशा में से कम से कम एक विवाह से जुड़े ग्रह की हो, और दूसरी उसके विरुद्ध न हो।
परंपरा में कुछ मेल बार-बार दिखते हैं: शुक्र की महादशा में सप्तमेश की अंतर्दशा; सप्तमेश की महादशा में शुक्र की अंतर्दशा; किसी भी महादशा में गुरु या शुक्र की अंतर्दशा। एक बात अक्सर भुला दी जाती है — महादशा का ग्रह विवाह से जुड़ा न हो, तब भी उसके भीतर आने वाली शुक्र या सप्तमेश की अंतर्दशा विवाह का समय ला सकती है।
एक उदाहरण — दशा का क्रम पढ़कर खिड़की निकालना
यह पूरी तरह काल्पनिक उदाहरण है। अंक केवल तरीका समझाने के लिए हैं, किसी असली व्यक्ति के नहीं।
मान लीजिए एक युवक का लग्न मिथुन है। तब उसका सातवाँ भाव धनु है और सप्तमेश गुरु। पुरुष की कुंडली है, इसलिए मुख्य कारक शुक्र। मान लीजिए सातवें भाव में कोई ग्रह नहीं बैठा। उसका चंद्र आर्द्रा नक्षत्र में है (आर्द्रा पूरा मिथुन राशि में पड़ता है), जिसका स्वामी राहु है, और जन्म के समय राहु की दशा के 4 वर्ष बचे थे। तब उसकी महादशाएँ यूँ चलेंगी:
| महादशा | आयु (वर्ष) |
|---|---|
| राहु (बचा हुआ भाग) | 0 से 4 |
| गुरु | 4 से 20 |
| शनि | 20 से 39 |
| बुध | 39 से 56 |
विवाह की उम्र का पूरा दौर शनि की महादशा में पड़ता है। इस लग्न के लिए शनि न सप्तमेश है, न विवाह-कारक। कई लोग यहीं रुककर कह देते हैं कि "शनि की दशा है, शादी देर से होगी"। पर अंतर्दशाएँ खोलकर देखिए:
| शनि में अंतर्दशा | आयु (लगभग) | विवाह से संबंध |
|---|---|---|
| शनि | 20.0 – 23.0 | — |
| बुध | 23.0 – 25.7 | लग्नेश; सीधा संबंध नहीं |
| केतु | 25.7 – 26.8 | — |
| शुक्र | 26.8 – 30.0 | विवाह का मुख्य कारक |
| सूर्य | 30.0 – 30.9 | — |
| चंद्र | 30.9 – 32.5 | — |
| मंगल | 32.5 – 33.6 | — |
| राहु | 33.6 – 36.5 | — |
| गुरु | 36.5 – 39.0 | सप्तमेश |
अब इसे क़दम-दर-क़दम पढ़िए:
- पहली खिड़की: शुक्र की अंतर्दशा — लगभग 26 वर्ष 10 महीने से 30 वर्ष तक। यह इस कुंडली की सबसे मज़बूत खिड़की है।
- अगली खिड़की: गुरु की अंतर्दशा, क्योंकि गुरु यहाँ सप्तमेश है — लगभग साढ़े 36 से 39 वर्ष।
- गोचर से वर्ष चुनना: शुक्र की अंतर्दशा के सवा तीन वर्षों में गुरु लगभग तीन राशियाँ पार करेगा। मिथुन लग्न के लिए गुरु पहले (मिथुन), तीसरे (सिंह), सातवें (धनु) या ग्यारहवें (मेष) भाव में हो, तो उसकी स्थिति या दृष्टि सातवें भाव पर पड़ती है। इस उदाहरण में चंद्र भी मिथुन में है, इसलिए चंद्र से सातवाँ भी धनु ही है। मान लीजिए इन वर्षों में गुरु सिंह से गुज़रता है — वहाँ से उसकी पाँचवीं दृष्टि सीधे धनु पर। तो शुक्र की अंतर्दशा के भीतर वही वर्ष सबसे खुला माना जाएगा।
- नवांश से पुष्टि: शुक्र नवांश में भी बलवान हो, तो यह खिड़की और भरोसे की।
- निष्कर्ष: "लगभग 27 से 30 वर्ष की आयु का दौर अनुकूल है, और उसमें वह वर्ष विशेष, जब गुरु सिंह में हो।" ध्यान दीजिए — इसमें कोई तारीख़ नहीं, कोई गारंटी नहीं; बस एक साफ़ दिशा।
और अगर उस दौर में बात न बने? तब अगली बड़ी खिड़की गुरु की अंतर्दशा है, और बीच में जब गुरु का गोचर सातवें भाव को छुए, तब भी रिश्ते तय होते देखे जाते हैं। इसे "देर" कहना ठीक नहीं; यह बस इस कुंडली की घड़ी का क्रम है।
जब रिश्ते की बात चल रही हो — दो लोगों की घड़ी
एक व्यक्ति की खिड़की आधी तस्वीर है। विवाह दो लोगों का है, और दूसरी कुंडली में भी यही क्रम अपने ढंग से चलता है। मान लीजिए इसी युवक की बात जिस युवती से चल रही है, वह उससे दो वर्ष छोटी है, और उसकी गुरु की अंतर्दशा (स्त्री की कुंडली में मुख्य कारक) उसकी 25 से साढ़े 27 वर्ष की आयु में चलती है। कैलेंडर पर यह दौर युवक की 27 से साढ़े 29 वर्ष की आयु के बराबर पड़ेगा — यानी ठीक उसकी शुक्र-अंतर्दशा के भीतर। यही साझा खिड़की है: वे वर्ष जब दोनों की घड़ी एक साथ विवाह की ओर हो।
यहाँ एक बारीकी है। दोनों की आयु सीधे नहीं मिलाई जा सकती, क्योंकि दोनों अलग वर्षों में जन्मे हैं। पहले हर एक की खिड़की को उसके अपने जन्म-वर्ष से जोड़कर कैलेंडर के वर्षों में बदलना पड़ता है; तब जाकर दोनों का मेल दिखता है।
गोचर — खिड़की के भीतर कौन-सा वर्ष खुलता है
गुरु का गोचर
गुरु लगभग 12 वर्ष में पूरा राशि-चक्र घूमता है — एक राशि में मोटे तौर पर एक वर्ष। विवाह के लिए गुरु का गोचर तब शुभ माना जाता है जब:
- वह जन्म-लग्न से सातवें भाव पर हो, या पहले, तीसरे अथवा ग्यारहवें भाव से उस पर दृष्टि डाले;
- वह जन्म-चंद्र से सातवीं राशि पर हो — यह परंपरा का सबसे जाना-पहचाना विवाह-गोचर है, जो लगभग हर 12 वर्ष में एक बार आता है;
- वह जन्म-चंद्र के ऊपर से गुज़रे।
यानी हर 12 वर्षों में कम से कम चार वर्ष गुरु किसी न किसी तरह सातवें भाव को छूता है। इसीलिए गुरु अकेला कुछ तय नहीं करता; वह दशा की खिड़की के भीतर वर्ष चुनता है।
शनि का गोचर
शनि लगभग 30 वर्ष में चक्र पूरा करता है — एक राशि में ढाई वर्ष के आसपास। सातवें भाव पर शनि की स्थिति, या पहले, पाँचवें अथवा दसवें भाव से उस पर उसकी दृष्टि, परंपरा में ज़िम्मेदारी लेने और रिश्ते को स्थिर करने का समय कही गई है। शनि जल्दबाज़ी का ग्रह नहीं है; वह सोच-समझकर बने रिश्ते को सहारा देता है, और कई विवाह ठीक इसी दौर में तय होते हैं।
दोहरा गोचर — एक आधुनिक शिक्षा
आजकल एक नियम बहुत सुनाई देता है: जब गुरु और शनि दोनों एक साथ सातवें भाव या सप्तमेश को (स्थिति या दृष्टि से) छुएँ, तब विवाह का वर्ष आता है। इसे "दोहरा गोचर" कहते हैं। यह आधुनिक पाराशरी ज्योतिष की शिक्षा है — के. एन. राव जैसे आज के आचार्यों ने इसे अपने शोध और लेखन से लोकप्रिय किया। प्राचीन ग्रंथों में हर ग्रह के गोचर का फल अलग-अलग लिखा है, पर यह जोड़-नियम इस रूप में वहाँ नहीं मिलता। कई अनुभवी ज्योतिषी इसे उपयोगी पाते हैं, पर इसे दशा की जगह रखना ठीक नहीं — पहले दशा, फिर गोचर।
शादी कब होगी कैसे पता करें — सात क़दम
अगर आप जानना चाहते हैं कि 'shadi kab hogi kaise pata kare', तो किसी भी अच्छे ज्योतिषी का क्रम मोटे तौर पर यही होता है:
- सही जन्म-विवरण से कुंडली बनाइए — तारीख़, समय और जगह।
- सातवाँ भाव और सप्तमेश पहचानिए, और सातवें में बैठे या उसे देखने वाले ग्रह भी।
- शुक्र, गुरु और नवांश-लग्नेश का बल देखिए — कौन उच्च या अपनी राशि में है, कौन नीच या अस्त (सूर्य के बहुत पास होने से कमज़ोर)।
- दशा-सारणी खोलिए। लड़की के लिए 18 और लड़के के लिए 21 वर्ष के बाद की हर महादशा और अंतर्दशा देखिए, और ऊपर के ग्रहों वाली अवधियों पर निशान लगाइए।
- कुछ महीनों की छोटी अवधियाँ अलग रखिए — वे अकेले बड़ा संकेत नहीं बनतीं।
- चिह्नित अवधियों में गुरु का गोचर देखिए, चाहें तो शनि का भी।
- नवांश से पुष्टि कीजिए। रिश्ता चल रहा हो, तो दूसरे व्यक्ति की कुंडली में यही क्रम चलाकर साझा खिड़की देखिए।
यह क्रम सुनने में सरल है, पर हर क़दम में कुंडली की बारीकी है। इसलिए 'shadi kab hogi kundali se' जैसे सवाल का भरोसे लायक़ उत्तर पूरी कुंडली देखकर ही बनता है, किसी एक नियम से नहीं।
कैसे पहचानें कि अनुकूल समय चल रहा है
ज्योतिष की नज़र से अनुकूल दौर के ये संकेत माने जाते हैं:
- चल रही महादशा या अंतर्दशा सप्तमेश, शुक्र, गुरु, या सातवें भाव में बैठे ग्रह की है।
- दशा का ग्रह नवांश में भी ठीक स्थिति में है — कमज़ोर या पीड़ित नहीं।
- गुरु जन्म-चंद्र से सातवीं राशि पर है, या लग्न से सातवें भाव पर बैठा है या उसे देख रहा है।
- शनि का गोचर सातवें भाव या सप्तमेश को छू रहा है, और साथ में दशा भी विवाह की है।
परंपरा कहती है कि ऐसे दौर में घर में विवाह की चर्चा अपने आप उठती है और रिश्ते आने लगते हैं।
अभी ये संकेत न हों, तो इसका अर्थ "विवाह नहीं" बिल्कुल नहीं; बस इतना कि अभी की घड़ी पढ़ाई, काम या परिवार जैसे किसी और विषय पर है, और विवाह की खिड़की आगे है।
शादी की उम्र — "देर" अक्सर बस दशा का क्रम है
इंटरनेट पर 'marriage age prediction' के नाम से कई कैलकुलेटर मिलते हैं, जो एक पक्की उम्र बता देते हैं। सच यह है कि कुंडली उम्र की एक प्रवृत्ति बताती है — जल्दी, समय पर, या कुछ बाद — और असली वर्ष दशा से निकलता है। परंपरा कुछ योगों को "परिपक्व आयु में विवाह" से जोड़ती है:
| योग | परंपरा में अर्थ | समझने की बात |
|---|---|---|
| सातवें भाव में शनि, या उस पर शनि की दृष्टि | सोच-समझकर, परिपक्व आयु में विवाह; गंभीर और ज़िम्मेदार साथी | रुकावट नहीं — रिश्ता धीरे पर पक्का बनता है |
| सप्तमेश नीच या अस्त | सप्तमेश का फल धीमी गति से | उसकी दशा, नवांश और उस पर दृष्टि साथ देखें |
| सातवें में मंगल, राहु या केतु | रिश्ता अपने ढंग से, निर्णय में समय | अकेला ग्रह फल तय नहीं करता |
| मांगलिक दोष, जो कटा न हो | परंपरा विवाह-काल थोड़ा आगे मानती है | दोनों मांगलिक हों तो दोष आपस में कट जाता है |
| शुक्र या सप्तमेश की दशा 30 के बाद | समय बस बाद में आता है | यही सबसे आम कारण है, कोई दोष नहीं |
हमारी गणना भी इसी परंपरा पर चलती है। जब ऊपर के पहले चार में से कोई योग हो, तो वह विवाह की खिड़कियाँ क़ानूनी उम्र से कुछ वर्ष बाद से गिनना शुरू करती है, क्योंकि शास्त्र इन्हें जल्दी विवाह का नहीं, परिपक्व विवाह का संकेत मानता है। खिड़कियाँ हटती नहीं; बस गिनती थोड़ा आगे से शुरू होती है।
अब सबसे ज़रूरी बात। देर से विवाह का कारण किसी व्यक्ति में खोजना ग़लत है — न लड़की का दोष, न लड़के का, न परिवार का। मांगलिक होना भी किसी का दोष नहीं; वह मंगल की एक स्थिति है, जो अक्सर दोनों की कुंडली मिलाने पर कट जाती है। बहुत बार कारण बस इतना होता है कि शुक्र या सप्तमेश की दशा 30 के बाद आती है, और उससे पहले पढ़ाई, काम या घर की ज़िम्मेदारी के ग्रहों का दौर था। देर से आई खिड़की उतनी ही शुभ होती है जितनी जल्दी आई।
मेरी शादी कब होगी और किससे होगी — कुंडली कितना बताती है
इस सवाल का दूसरा हिस्सा — "किससे" — पर कुंडली नाम, शहर या चेहरा नहीं बताती। वह साथी का स्वभाव बताती है: सातवें भाव की राशि, सप्तमेश कहाँ है, सातवें में कौन-से ग्रह हैं, शुक्र-गुरु की स्थिति, नवांश का सातवाँ भाव और दाराकारक। जैसे सातवें भाव पर गुरु का प्रभाव हो, तो परंपरा विवेकी और संस्कारी साथी की ओर इशारा मानती है।
असली "किससे" का उत्तर तब मिलता है जब रिश्ता सामने हो। हमारी कुंडली मिलान रिपोर्ट में इसके लिए "कुंडली किस प्रकार का साथी बताती है" नाम का खंड है — एक की कुंडली जिस साथी की ओर इशारा करती है, उसे सामने वाले व्यक्ति की कुंडली पर रखकर देखा जाता है।
जन्म-विवरण — क्या चाहिए, और समय की भूल का असर
विवाह-काल के लिए तीन बातें चाहिए: जन्म की तारीख़, समय और जगह।
- तारीख़: आधी रात के बाद हुआ जन्म अगले दिन की तारीख़ का होता है। फ़ॉर्म में अंग्रेज़ी कैलेंडर की तारीख़ भरिए।
- समय: दशा का आरंभ चंद्र के ठीक अंश से निकलता है। चंद्र दो घंटे में एक अंश से थोड़ा ज़्यादा चलता है, इसलिए दो घंटे की भूल से पूरी दशा-सारणी आधे वर्ष से डेढ़ वर्ष तक खिसक सकती है — यह इस पर है कि जन्म-नक्षत्र का स्वामी कौन है। लग्न तो औसतन हर दो घंटे में बदलता है, और उसके साथ सातवाँ भाव और सप्तमेश भी।
- जगह: जगह से लग्न बनता है; विदेश में जन्म हो, तो वही शहर चुनिए।
बहुत से लोग 'meri shadi kab hogi by date of birth' खोजते हैं। केवल जन्म-तारीख़ से चंद्र की राशि और मोटा-मोटा नक्षत्र पता चलता है, पर लग्न, सातवाँ भाव और सप्तमेश नहीं। दिन भर में चंद्र लगभग एक नक्षत्र पार कर जाता है, इसलिए समय के बिना दशा की शुरुआत भी कई वर्ष इधर-उधर हो सकती है।
समय याद न हो, तो हमारी रिपोर्ट दोपहर 12 बजे मानकर चलती है, और साफ़ लिखती है कि लग्न और दशा पर टिके खंड — विवाह-काल भी — अनुमानित लग्न पर हैं और असली समय मिलने पर बदल सकते हैं। अस्पताल का रिकॉर्ड, जन्म-प्रमाण पत्र या जन्म के समय बनी पत्री से समय पक्का कर लेना सबसे अच्छा है।
छोटे और सरल उपाय — जब घड़ी धीमी लगे
विवाह में देरी के उपायों पर हमारा अलग लेख है। यहाँ बस वे उपाय, जो विवाह-काल के ग्रहों से सीधे जुड़े हैं:
- गुरुवार को गुरु का मंत्र — ख़ासकर तब, जब गुरु कमज़ोर हो या सप्तमेश हो:
"ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः"
- शुक्रवार को शुक्र का मंत्र — ख़ासकर तब, जब शुक्र नीच, अस्त या कठिन भाव में हो:
"ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः"
- सप्तमेश कोई और ग्रह हो, तो उसका बीज मंत्र उसके वार को।
- जप रोज़ एक माला (108 बार), कम से कम 43 दिन बिना नागा। व्रत तभी, जब स्वास्थ्य ठीक हो।
- सामर्थ्य से दान — गुरुवार को चने की दाल या हल्दी, शुक्रवार को चावल या सफ़ेद मिठाई।
- रत्न पहनना हो तो किसी जानकार को पूरी कुंडली दिखाकर ही; जिस ग्रह को शांत करना हो, उसका रत्न उलटा असर कर सकता है।
कोई उपाय दशा का क्रम नहीं बदलता, न तय समय में विवाह का वादा करता है; नियम और श्रद्धा से किया उपाय मन को धीरज और कमज़ोर ग्रह को सहारा देता है।
रिश्ते की बात चल रही हो — कुंडली मिलान में दोनों का विवाह-काल
एक बात साफ़ कह दें: हम अकेले व्यक्ति के लिए "शादी कब होगी" की भविष्यवाणी नहीं बेचते। हमारा विवाह-काल तब बनता है जब रिश्ते की बात चल रही हो और दोनों की कुंडली मिलाई जाए। कारण सीधा है — विवाह का समय दो घड़ियों के मिलने से बनता है, एक से नहीं। कुंडली मिलान की रिपोर्ट में 36 गुण, मांगलिक, नाड़ी-भकूट और उनकी शास्त्रीय छूट के साथ विवाह-काल का पूरा भाग है:
- दोनों की अपनी खिड़कियाँ — वर और वधू की आयु के वे दौर जब सप्तमेश, शुक्र, गुरु, नवांश-लग्नेश, दाराकारक या उपपद-स्वामी की महादशा-अंतर्दशा चलती है; हर खिड़की के साथ कारण, और कौन-सा योग गिनती आगे खिसकाता है।
- साझा खिड़की — दोनों की खिड़कियाँ अपने-अपने जन्म-वर्ष से कैलेंडर पर रखकर जहाँ मिलती हैं, वे वर्ष। हर एक पर लिखा होता है कि वह बीत चुकी है, अभी चल रही है, या आगे है।
- अभी का गुरु-गोचर — आज गुरु दोनों में से किसकी कुंडली में सातवें भाव, चंद्र से सातवें, या जन्म-चंद्र को छू रहा है; गोचर उसी दिन का सच होता है, इसलिए उस पर तारीख़ छपती है।
- विवाह-बल — हर कुंडली का 10 में से अंक, सप्तमेश और विवाह-कारक के बल से, और उससे निकली उम्र की प्रवृत्ति।
- एक वाक्य का उत्तर — इन सबको मिलाकर सबसे संभावित दौर, उस समय दोनों की आयु, और कितनी विधियाँ उसी ओर इशारा कर रही हैं।
कुछ नियम, जिन पर हमारी गणना चलती है:
- हर व्यक्ति की खिड़कियाँ गिनते समय बहुत छोटी अवधियाँ छोड़ दी जाती हैं, ताकि "छह महीने में शादी" जैसी बात न बने।
- जिस ग्रह की दशा जन्म-कुंडली और नवांश, दोनों में कमज़ोर हो, उसकी खिड़की का भरोसा एक दर्जा घटा दिया जाता है।
- दोनों के मांगलिक होने से जो दोष आपस में कट गया, उसे विवाह-काल में देरी का कारण नहीं गिना जाता।
- गुरु का गोचर अभी अनुकूल हो पर दशा की खिड़की आगे हो, तो रिपोर्ट दोनों बातें एक ही जगह साफ़ करती है — गोचर समय को शुभ बनाता है, पर दशा का बल उस आगे वाले दौर में है।
- खिड़कियाँ कहीं न मिलें, तब भी रिपोर्ट विवाह से मना नहीं करती; वह कहती है कि ऐसे में समय गोचर और मुहूर्त से चुना जाए।
- रिपोर्ट विवाह की तारीख़ नहीं चुनती। मुहूर्त योग्य ज्योतिषी से लीजिए।
विवाह हो चुका हो, तो प्रश्न "कब" से बदलकर "अभी किसका दौर भारी है" हो जाता है। पति-पत्नी मिलान दोनों की अभी की दशा और शनि-गोचर देखकर यही बताता है, और कौन-सा उपाय किसके लिए है।
जब कोई पूछता है कि मेरी शादी कब होगी, तो हमारा सुझाव यही है: रिश्ता सामने आए, तो दोनों की कुंडली साथ रखकर कुंडली मिलान बनवाइए — तब गुणों के साथ यह भी दिखेगा कि दोनों की घड़ियाँ किन वर्षों में एक साथ विवाह की ओर हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शादी कब होगी कैसे पता करें — कुंडली में सबसे पहले क्या देखें?
सबसे पहले सातवाँ भाव और उसका स्वामी (सप्तमेश) देखिए, फिर शुक्र और गुरु का बल। इसके बाद दशा-सारणी में वे महादशा-अंतर्दशाएँ खोजिए जो इन ग्रहों की हों। उन अवधियों के भीतर जिस वर्ष गुरु का गोचर सातवें भाव या चंद्र से सातवीं राशि को छुए, वह सबसे खुला माना जाता है। अंत में नवांश से पुष्टि कीजिए।
क्या केवल जन्म तारीख से शादी की उम्र पता चल सकती है?
पूरी तरह नहीं। केवल तारीख़ से चंद्र की राशि और मोटा नक्षत्र मिलता है, पर लग्न, सातवाँ भाव और सप्तमेश नहीं। दशा की शुरुआत भी समय के बिना कई वर्ष खिसक सकती है। इसलिए केवल तारीख़ वाला उत्तर मोटा अनुमान है। जन्म-समय पता करके ही विवाह-काल पढ़वाइए।
शनि की महादशा में शादी हो सकती है क्या?
हाँ, बहुत बार होती है। शनि की 19 वर्ष की महादशा में शुक्र, गुरु या सप्तमेश की अंतर्दशा आती है, और वही विवाह का समय ला सकती है। कर्क और सिंह लग्न में तो शनि स्वयं सप्तमेश है। शनि की दशा का अर्थ "विवाह नहीं" नहीं — अक्सर उसका अर्थ है सोच-समझकर बना, स्थिर रिश्ता।
गुरु सातवें भाव में गोचर करे तो क्या शादी पक्की है?
अकेले गोचर से नहीं। गुरु हर 12 वर्ष में कम से कम चार वर्ष किसी न किसी तरह सातवें भाव को छूता है। जब उसी समय दशा भी विवाह के ग्रह की हो, तब यह गोचर उस खिड़की का सबसे खुला वर्ष बनाता है। दशा साथ न हो, तो गुरु का गोचर शुभ माहौल देता है, पर अकेला फ़ैसला नहीं करता।
शादी में देर हो रही है, क्या कुंडली में कोई दोष है?
ज़रूरी नहीं। सबसे आम कारण यह होता है कि शुक्र या सप्तमेश की दशा कुछ बाद में आती है। सातवें पर शनि का प्रभाव भी परंपरा में परिपक्व आयु के विवाह का संकेत है, रुकावट का नहीं। इसके लिए किसी व्यक्ति या परिवार को दोष देना ग़लत है। दशा देखकर आगे की खिड़की पहचानिए, और चाहें तो सरल ग्रह-उपाय कीजिए।
क्या आपकी रिपोर्ट मेरी शादी की तारीख बताती है?
नहीं। कोई भी ईमानदार कुंडली तारीख़ नहीं, समय की खिड़की बताती है। हमारी कुंडली मिलान रिपोर्ट रिश्ते की बात चलने पर दोनों की कुंडली से हर एक की दशा-खिड़कियाँ, दोनों की साझा खिड़की, अभी का गुरु-गोचर और विवाह-बल दिखाती है, और सबसे संभावित दौर बताती है। विवाह की तारीख़ मुहूर्त से योग्य ज्योतिषी तय करते हैं।