घर में नया बच्चा आता है तो कुछ ही दिनों में एक सवाल हर तरफ़ से आने लगता है — "राशि से कौन-सा अक्षर निकला?" दादी पंचांग माँगती हैं, बुआ नामों की सूची बनाती हैं, और माता-पिता फ़ोन पर अक्षर खोजते हैं। पर अक्सर अलग-अलग जगह अलग अक्षर मिलते हैं। वजह सीधी है। नाम का अक्षर जन्म के ठीक समय पर चंद्रमा की स्थिति से निकलता है, और चंद्रमा आकाश में सबसे तेज़ चलने वाला ग्रह है। कुछ घंटों का फ़र्क़ भी अक्षर बदल सकता है।
इस लेख में कुंडली मिलान ज्योतिष की टीम ने यही बात सरल ढंग से समझाई है — नामकरण संस्कार क्या है, जन्म-नक्षत्र और चरण कैसे निकलते हैं, चरण से पहला अक्षर कैसे मिलता है, राशि का नाम से क्या रिश्ता है, नामकरण मुहूर्त में परंपरा क्या देखती है, और नाम चुनते समय कौन-सी आसान बातें काम आती हैं। बीच में 27 नक्षत्रों के 108 चरणों की पूरी अक्षर-तालिका भी है, राशि के साथ।
नामकरण संस्कार क्या है
हिंदू परंपरा में जीवन के बड़े पड़ावों को संस्कार (मन और जीवन को सँवारने वाली पारिवारिक-धार्मिक विधि) से जोड़ा गया है। आम तौर पर सोलह संस्कार गिने जाते हैं। यह क्रम गर्भाधान से शुरू होता है और जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन, विद्यारंभ, उपनयन से होते हुए विवाह तक आता है। अलग-अलग ग्रंथों में सूची थोड़ी बदलती है, पर नामकरण हर सूची में मिलता है। आम क्रम में यह पाँचवाँ संस्कार है। जन्म के समय होने वाले जातकर्म के बाद यह बच्चे का पहला बड़ा पारिवारिक उत्सव होता है।
नामकरण का सीधा अर्थ है बच्चे को उसका नाम देना। पर परंपरा में यह सिर्फ़ एक शब्द चुनने का काम नहीं। इस दिन परिवार इकट्ठा होता है, भगवान का स्मरण होता है, बड़े आशीर्वाद देते हैं, और जिस नाम से बच्चा जीवन भर पुकारा जाएगा, वह पहली बार उसके कान में बोला जाता है।
नामकरण किस दिन होता है
परंपरा में नामकरण आम तौर पर जन्म के ग्यारहवें या बारहवें दिन होता है। इसके पीछे एक सीधी बात है। जन्म के बाद के लगभग दस दिन घर में सूतक (जन्म के बाद का वह समय जब घर में बड़े धार्मिक कार्य नहीं होते और माँ-बच्चा आराम करते हैं) माना जाता है। सूतक पूरा होने पर घर की साफ़-सफ़ाई और शुद्धि होती है, माँ स्नान करके पूजा में बैठती हैं, और फिर नाम रखा जाता है। कई समुदायों में सूतक की अवधि अलग मानी जाती है, इसलिए नामकरण का दिन भी अलग हो सकता है।
ग्यारहवाँ-बारहवाँ दिन ही अकेला रास्ता नहीं है। पुराने स्मृति-ग्रंथ भी कहते हैं कि तय दिन पर संस्कार न हो सके तो किसी शुभ तिथि, शुभ नक्षत्र और अच्छे मुहूर्त में किया जाए। इसलिए बहुत से परिवार अपनी कुल-रीति (पीढ़ियों से चली आ रही घर की रीति) के अनुसार इक्कीसवें दिन, तीसरे महीने में या पहले जन्मदिन के आसपास नामकरण करते हैं। माँ का स्वास्थ्य और दूर के रिश्तेदारों का आना भी दिन तय करने में गिना जाता है, और यह बिलकुल ठीक है।
भारत के अलग-अलग हिस्सों में इस संस्कार के रंग भी अलग हैं। महाराष्ट्र में बारहवें दिन का "बारसे" प्रसिद्ध है, जिसमें बच्चे को सजे पालने में लिटाकर स्त्रियाँ पालने के गीत गाती हैं। गुजरात में छठे दिन "छठ्ठी" की रीति है, और वहाँ अक्सर बुआ नाम रखती हैं। उत्तर भारत के भी बहुत से घरों में नाम रखने का पहला हक़ बुआ का माना जाता है। ये लोक-रीतियाँ हैं, और हर परिवार इन्हें शास्त्रीय विधि के साथ मिलाकर चलता है।
नाम और ज्योतिष का रिश्ता
सवाल उठता है कि नाम का ज्योतिष से क्या लेना-देना। परंपरा में इसका उत्तर चंद्रमा से जुड़ा है। वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा मन का कारक (प्रतिनिधि ग्रह) है। जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, वही बच्चे का जन्म-नक्षत्र कहलाता है, और जिस राशि में होता है, वही उसकी जन्म-राशि। भारतीय पद्धति में "आपकी राशि क्या है" का अर्थ यही चंद्र-राशि होता है, सूर्य-राशि नहीं।
परंपरा मानती है कि नाम उसी ध्वनि से शुरू हो जो जन्म-नक्षत्र के चरण से जुड़ी है, तो नाम और जन्म के समय का मन एक सुर में रहते हैं। यह श्रद्धा और रीति है, किसी फल की पक्की गारंटी नहीं। नाम से कुंडली नहीं बदलती — कुंडली जन्म के क्षण से बनती है। नाम एक पहचान है, और परिवार की ओर से बच्चे के लिए पहली शुभकामना।
एक व्यावहारिक कारण भी है। पूजा और संकल्प (पूजा से पहले अपना नाम, गोत्र और उद्देश्य बोलने की विधि) में व्यक्ति का राशि-नाम बोला जाता है। और जब किसी का जन्म-समय पता न हो, तब परंपरा उसके नाम के पहले अक्षर से उसका नक्षत्र और राशि मान लेती है।
जन्म-नक्षत्र और चरण — चंद्रमा से कैसे निकलते हैं
नाम का अक्षर समझने के लिए पहले यह समझना होगा कि आकाश को ज्योतिष में कैसे बाँटा गया है। ग्रह जिस गोल पट्टी में घूमते दिखते हैं, उसे राशि-चक्र कहते हैं। यह पूरा घेरा 360 अंश का है। इसे दो तरह से बाँटा जाता है — बारह राशियों में और सत्ताईस नक्षत्रों में। हर नक्षत्र के फिर चार बराबर हिस्से होते हैं, जिन्हें चरण या पद कहते हैं।
| इकाई | कितनी | एक का माप |
|---|---|---|
| राशि | 12 | 30 अंश |
| नक्षत्र | 27 | 13 अंश 20 कला |
| चरण (पद) | 27 × 4 = 108 | 3 अंश 20 कला |
| एक राशि में चरण | 9 | 9 × 3 अंश 20 कला = 30 अंश |
(कला = अंश का साठवाँ हिस्सा।) इस तालिका से एक बात साफ़ होती है। एक राशि में ठीक नौ चरण आते हैं, यानी सवा दो नक्षत्र। इसलिए कुछ नक्षत्र पूरे के पूरे एक राशि में रहते हैं, और कुछ नक्षत्रों के चरण दो राशियों में बँट जाते हैं। इस पर आगे राशि वाले खंड में बात करेंगे।
चंद्रमा ही क्यों देखा जाता है
जन्म-नक्षत्र हमेशा चंद्रमा से निकाला जाता है। चंद्रमा मन का कारक है, और भारतीय ज्योतिष की बहुत-सी गणनाएँ उसी से चलती हैं। विंशोत्तरी दशा (जीवन के ग्रह-कालों का क्रम) भी जन्म-नक्षत्र से शुरू होती है। जैसे अश्विनी का स्वामी केतु है, तो अश्विनी में जन्मे बच्चे की पहली दशा केतु की होती है। विवाह का गुण मिलान भी दोनों के जन्म-नक्षत्र और चंद्र-राशि पर टिका है। यानी जो चंद्रमा नाम का अक्षर देता है, वही आगे दशा और कुंडली मिलान का आधार भी बनता है।
चंद्रमा की चाल और घड़ी का हिसाब
चंद्रमा राशि-चक्र में रोज़ लगभग 13 अंश आगे बढ़ता है। कभी उसकी चाल 12 अंश के आसपास होती है, कभी 15 अंश के आसपास। एक नक्षत्र 13 अंश 20 कला का है, इसलिए चंद्रमा मोटे तौर पर एक दिन में एक नक्षत्र पार करता है। एक चरण 3 अंश 20 कला का है, इसलिए चंद्रमा लगभग छह घंटे में एक चरण पार कर लेता है — कभी कुछ कम समय में, कभी कुछ ज़्यादा में।
मतलब सीधा है। एक ही दिन सुबह छह बजे और शाम छह बजे जन्मे दो बच्चों के बीच बारह घंटे हैं। इतने में चंद्रमा लगभग दो चरण आगे बढ़ जाता है, तो दोनों के अक्षर अलग होंगे। उस दिन चंद्रमा नक्षत्र या राशि की सीमा के पास था, तो नक्षत्र और राशि भी अलग हो सकते हैं। इसलिए सिर्फ़ तारीख़ काफ़ी नहीं — घंटा और मिनट भी चाहिए।
जन्म-समय कहाँ से लें
सबसे भरोसेमंद समय वही है जो अस्पताल के काग़ज़ों में मिनट तक लिखा होता है। "सुबह के आसपास" जैसे अंदाज़े से नक्षत्र कई बार ठीक निकल आता है, पर चरण गलत हो सकता है। पाँच-दस मिनट का संदेह ज़्यादातर मामलों में फ़र्क़ नहीं डालता। पर अगर जन्म ठीक उस समय के पास हुआ हो जब चंद्रमा एक चरण से दूसरे में जा रहा था, तो यही कुछ मिनट अक्षर बदल सकते हैं। ऐसे में जानकार दोनों संभावनाएँ देखकर बताता है।
जन्म-स्थान क्यों ज़रूरी है
कई लोग पूछते हैं कि चंद्रमा तो पूरी धरती के लिए एक ही है, फिर स्थान का क्या काम? उत्तर घड़ी में छिपा है। एक ही क्षण को अलग-अलग देश अलग घड़ी-समय से लिखते हैं, और कई देशों में गर्मियों में घड़ी एक घंटा आगे कर दी जाती है। विदेश में जन्मे बच्चे का समय बदलते हुए एक घंटे की भूल हो जाए, तो चरण बदल सकता है। सही स्थान बताने से गणना सही समय-क्षेत्र लेती है।
स्थान का दूसरा काम लग्न (जन्म के समय पूर्व दिशा में उदय हो रही राशि) से जुड़ा है। लग्न मोटे तौर पर हर दो घंटे में बदलता है और स्थान पर निर्भर करता है। नाम का अक्षर चंद्रमा से निकलता है, पर पूरी कुंडली — भाव (कुंडली के बारह घर) और उनमें बैठे ग्रह — लग्न के बिना नहीं बनती। और पंचांग की तिथि-वार सूर्योदय से गिने जाते हैं, जो हर शहर में अलग समय पर होता है।
लाहिरी अयनांश — भारतीय राशि और पश्चिमी राशि का फ़र्क़
पश्चिमी ज्योतिष सायन (ऋतुओं से जुड़ा, खिसकता हुआ) राशि-चक्र लेता है, जबकि भारतीय ज्योतिष निरयन (तारों से जुड़ा, स्थिर) राशि-चक्र लेता है। दोनों के बीच का अंतर अयनांश कहलाता है, जो आज लगभग 24 अंश है। यानी पश्चिमी पद्धति में किसी ग्रह को जिस राशि में दिखाया जाता है, भारतीय पद्धति में वह अक्सर उससे पिछली राशि में होता है। यही कारण है कि अंग्रेज़ी पत्रिकाओं की "स्टार साइन" और भारतीय पंचांग की राशि अलग निकलती हैं।
भारत में सबसे प्रचलित लाहिरी अयनांश (चित्रपक्ष अयनांश) है, जिसे राष्ट्रीय पंचांग की गणना में भी अपनाया गया। हमारी सारी गणना लाहिरी अयनांश पर होती है। कुछ दूसरे अयनांश इससे थोड़ा अलग हैं, और चंद्रमा चरण की सीमा के बिलकुल पास हो तो अयनांश बदलने से चरण बदल सकता है।
अलग-अलग जगह अलग अक्षर क्यों मिलते हैं
माता-पिता की सबसे आम उलझन यही है। इसके सामान्य कारण ये हैं:
- पंचांग का दिन वाला नक्षत्र ले लेना। पंचांग में नक्षत्र के साथ उसके ख़त्म होने का समय भी लिखा होता है। जन्म उसके बाद हुआ हो, तो नक्षत्र अगला होगा।
- समय-क्षेत्र की भूल, जब विदेश का घड़ी-समय बदले बिना गणना हो जाए।
- पश्चिमी सूर्य-राशि ले लेना, जो भारतीय पद्धति नहीं है।
- अलग अयनांश, सीमा के पास के मामलों में।
- चरण की जगह राशि का कोई भी अक्षर ले लेना।
सही तारीख़, घंटा-मिनट और स्थान से लाहिरी अयनांश पर गणना हो, तो चरण एक ही निकलेगा।
चरण से पहला अक्षर — अवकहडा चक्र
अब असली बात। 108 चरणों में से हर चरण के लिए परंपरा में एक ध्वनि (अक्षर) तय है। इन्हें जिस पुरानी तालिका में रखा गया है, उसे अवकहडा चक्र कहते हैं। यह चक्र पंचांगों में पीढ़ियों से छपता आया है, और इसका नाम भी इसके अक्षरों के क्रम से पड़ा है।
अवकहडा चक्र सिर्फ़ नाम का अक्षर नहीं बताता। इसमें हर नक्षत्र-चरण के सामने उसकी राशि, राशि का स्वामी, और वे गुण भी लिखे होते हैं जिनसे विवाह का गुण मिलान बनता है — वर्ण, वश्य, योनि, गण और नाड़ी। अष्टकूट मिलान (आठ कसौटियों पर 36 गुणों का मिलान) की कई कसौटियाँ सीधे इसी चक्र से पढ़ी जाती हैं। इसीलिए पुराने पंडित एक ही चक्र से बच्चे के नाम का अक्षर भी बताते थे और बड़े होने पर विवाह के गुण भी मिलाते थे।
एक उदाहरण — अश्विनी नक्षत्र
सत्ताईस नक्षत्रों की गिनती अश्विनी से शुरू होती है। अश्विनी के चार चरणों के अक्षर हैं — चु, चे, चो, ला। अश्विनी के चारों चरण मेष राशि में आते हैं, इसलिए इन चारों चरणों में जन्मे बच्चे की राशि मेष होगी।
मान लीजिए किसी बच्चे के जन्म के समय चंद्रमा अश्विनी के दूसरे चरण में था। उसका अक्षर "चे" होगा, और परिवार "चे" से शुरू होने वाला नाम चुनेगा — जैसे चेतन या चेतना। अगर चंद्रमा चौथे चरण में था, तो अक्षर "ला" होगा — जैसे लावण्या या लालित्य। यानी एक ही नक्षत्र में जन्मे बच्चों के अक्षर भी चरण के हिसाब से अलग होते हैं।
पूरी तालिका कैसे पढ़ें
नीचे दी गई तालिका में सभी 27 नक्षत्र हैं, हर नक्षत्र के चारों चरणों के अक्षर हैं, और हर चरण की राशि भी लिखी है। इसे पढ़ने का तरीका सरल है:
- पहले बच्चे का जन्म-नक्षत्र और चरण पता करें — सही जन्म-तिथि, घंटा-मिनट और स्थान से, लाहिरी अयनांश पर।
- तालिका में उस नक्षत्र की पंक्ति ढूँढें।
- उस पंक्ति में चरण की संख्या वाला अक्षर देखें — यही नाम का पहला अक्षर है।
- उसी के साथ लिखी राशि बच्चे की जन्म-राशि है।
नक्षत्र-पाद के अनुसार नाम का पहला अक्षर
हर पाद के आगे उसकी राशि भी — जन्म के समय चंद्र जिस पाद में हो, नाम उसी अक्षर से।
| नक्षत्र | पाद 1 | पाद 2 | पाद 3 | पाद 4 |
|---|---|---|---|---|
| अश्विनी | चुमेष | चेमेष | चोमेष | लामेष |
| भरणी | लीमेष | लूमेष | लेमेष | लोमेष |
| कृत्तिका | आमेष | ईवृषभ | उवृषभ | एवृषभ |
| रोहिणी | ओवृषभ | वा/बावृषभ | वी/बीवृषभ | वू/बूवृषभ |
| मृगशिरा | वे/बेवृषभ | वो/बोवृषभ | कामिथुन | कीमिथुन |
| आर्द्रा | कूमिथुन | खमिथुन | ङमिथुन | छमिथुन |
| पुनर्वसु | केमिथुन | कोमिथुन | हामिथुन | हीकर्क |
| पुष्य | हूकर्क | हेकर्क | होकर्क | डाकर्क |
| आश्लेषा | डीकर्क | डूकर्क | डेकर्क | डोकर्क |
| मघा | मासिंह | मीसिंह | मूसिंह | मेसिंह |
| पूर्वा फाल्गुनी | मोसिंह | टासिंह | टीसिंह | टूसिंह |
| उत्तरा फाल्गुनी | टेसिंह | टोकन्या | पाकन्या | पीकन्या |
| हस्त | पूकन्या | षकन्या | णकन्या | ठकन्या |
| चित्रा | पेकन्या | पोकन्या | रातुला | रीतुला |
| स्वाति | रूतुला | रेतुला | रोतुला | तातुला |
| विशाखा | तीतुला | तूतुला | तेतुला | तोवृश्चिक |
| अनुराधा | नावृश्चिक | नीवृश्चिक | नूवृश्चिक | नेवृश्चिक |
| ज्येष्ठा | नोवृश्चिक | यावृश्चिक | यीवृश्चिक | यूवृश्चिक |
| मूल | येधनु | योधनु | भाधनु | भीधनु |
| पूर्वाषाढ़ा | भूधनु | धाधनु | फाधनु | ढाधनु |
| उत्तराषाढ़ा | भेधनु | भोमकर | जामकर | जीमकर |
| श्रवण | खीमकर | खूमकर | खेमकर | खोमकर |
| धनिष्ठा | गामकर | गीमकर | गूकुम्भ | गेकुम्भ |
| शतभिषा | गोकुम्भ | साकुम्भ | सीकुम्भ | सूकुम्भ |
| पूर्वा भाद्रपद | सेकुम्भ | सोकुम्भ | दाकुम्भ | दीमीन |
| उत्तरा भाद्रपद | दूमीन | थमीन | झमीन | ञमीन |
| रेवती | देमीन | दोमीन | चामीन | चीमीन |
अक्षर हाथ से दोबारा लिखने की बजाय सीधे ऊपर की तालिका से लेना सबसे सुरक्षित है। तालिका देखते समय तीन बातें याद रखें।
पहली बात, अक्षर असल में ध्वनि है, लिखावट नहीं। हिंदी, मराठी, गुजराती या अंग्रेज़ी में लिखने का ढंग अलग हो सकता है, पर बोलने में नाम की पहली ध्वनि वही रहे, यही परंपरा का भाव है।
दूसरी बात, परिवारों में इस नियम की सख़्ती अलग-अलग है। कुछ परिवार चाहते हैं कि नाम ठीक उसी अक्षर से शुरू हो, मात्रा समेत। कुछ व्यंजन मिल जाने को काफ़ी मानते हैं। कुछ उस नक्षत्र के चारों अक्षरों में से कोई भी ले लेते हैं, और कुछ राशि के नौ अक्षरों में से कोई भी। शास्त्र की दृष्टि से सबसे सटीक चरण का अक्षर है, पर अंतिम फ़ैसला परिवार की रीति का है।
तीसरी बात, कुछ चरणों के अक्षर ऐसे दुर्लभ वर्ण हैं जिनसे शायद ही कोई नाम शुरू होता है। तब परिवार उसी नक्षत्र का कोई दूसरा अक्षर ले लेते हैं, या राशि-नाम अलग रखकर पुकारने का नाम अपनी पसंद से रखते हैं। इसमें कोई दोष नहीं।
राशि और नाम
हर राशि में नौ चरण आते हैं, इसलिए हर राशि के नौ अक्षर हैं। जब लोग कहते हैं "मेष राशि का नाम", तो उनका अर्थ है उन नौ चरणों में से किसी एक के अक्षर से बना नाम। नीचे की तालिका में बताया गया है कि कौन-सी राशि में कौन-से नक्षत्र-चरण आते हैं और राशि का स्वामी ग्रह कौन है। अक्षर ऊपर वाली बड़ी तालिका में देखें।
| राशि | स्वामी ग्रह | इसमें आने वाले नक्षत्र-चरण |
|---|---|---|
| मेष | मंगल | अश्विनी 1–4, भरणी 1–4, कृत्तिका 1 |
| वृषभ | शुक्र | कृत्तिका 2–4, रोहिणी 1–4, मृगशिरा 1–2 |
| मिथुन | बुध | मृगशिरा 3–4, आर्द्रा 1–4, पुनर्वसु 1–3 |
| कर्क | चंद्र | पुनर्वसु 4, पुष्य 1–4, आश्लेषा 1–4 |
| सिंह | सूर्य | मघा 1–4, पूर्वा फाल्गुनी 1–4, उत्तरा फाल्गुनी 1 |
| कन्या | बुध | उत्तरा फाल्गुनी 2–4, हस्त 1–4, चित्रा 1–2 |
| तुला | शुक्र | चित्रा 3–4, स्वाति 1–4, विशाखा 1–3 |
| वृश्चिक | मंगल | विशाखा 4, अनुराधा 1–4, ज्येष्ठा 1–4 |
| धनु | गुरु | मूल 1–4, पूर्वाषाढ़ा 1–4, उत्तराषाढ़ा 1 |
| मकर | शनि | उत्तराषाढ़ा 2–4, श्रवण 1–4, धनिष्ठा 1–2 |
| कुंभ | शनि | धनिष्ठा 3–4, शतभिषा 1–4, पूर्वा भाद्रपद 1–3 |
| मीन | गुरु | पूर्वा भाद्रपद 4, उत्तरा भाद्रपद 1–4, रेवती 1–4 |
इस तालिका से दिखता है कि नौ नक्षत्र दो राशियों में बँटे हैं — कृत्तिका, मृगशिरा, पुनर्वसु, उत्तरा फाल्गुनी, चित्रा, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, धनिष्ठा और पूर्वा भाद्रपद। इन नक्षत्रों में जन्मे बच्चों के लिए चरण का महत्त्व दोगुना है। जैसे कृत्तिका के पहले चरण में जन्मा बच्चा मेष राशि का होगा, और दूसरे से चौथे चरण में जन्मा बच्चा वृषभ राशि का। एक ही नक्षत्र, पर राशि अलग, स्वामी ग्रह अलग, और आगे चलकर गुण मिलान का भकूट (राशियों के आपसी स्थान की कसौटी) भी अलग।
ध्यान रहे, "राशि के अनुसार नाम" में राशि का अर्थ हमेशा चंद्र-राशि है। लग्न-राशि या पश्चिमी सूर्य-राशि से नाम का अक्षर नहीं निकाला जाता।
राशि-नाम और पुकारने का नाम
बहुत से परिवारों के सामने एक व्यावहारिक सवाल आता है — अगर राशि का अक्षर पसंद के नाम से मेल न खाए तो क्या करें? परंपरा ने इसका हल पहले से रखा है। किसी के भी दो नाम हो सकते हैं।
- राशि-नाम (नक्षत्र-नाम): जन्म-नक्षत्र के चरण के अक्षर से बना नाम। यह पूजा, संकल्प, धार्मिक विधियों और पारंपरिक कामों में बोला जाता है। कुंडली और जन्म-पत्रिका में भी यही लिखा जाता है।
- पुकारने का नाम (व्यावहारिक नाम): वह नाम जिससे घर, स्कूल, नौकरी और काग़ज़ों में व्यक्ति पहचाना जाता है। यह परिवार अपनी पसंद से रख सकता है।
कुछ पुरानी परंपराओं में तो नक्षत्र-नाम घर के भीतर ही रखा जाता था और बाहर के लिए दूसरा नाम होता था। आज भी कई घरों में दादी का रखा राशि-नाम पत्रिका में रहता है और स्कूल में बच्चा किसी और नाम से जाना जाता है। इसमें कोई अशुभता नहीं। बहुत से परिवार एक ही ऐसा नाम चुन लेते हैं जो राशि के अक्षर से भी शुरू हो और पसंद भी हो। यह सबसे सुविधाजनक रास्ता है, पर अनिवार्य नहीं।
दोनों नाम रखें तो क्या ध्यान रहे
- जन्म-पत्रिका में दोनों नाम लिख लें, ताकि आगे उलझन न हो।
- पूजा और संकल्प में राशि-नाम बोलें, अगर परिवार की यही रीति है।
- जन्म-प्रमाणपत्र और स्कूल के दाख़िले में एक ही नाम और एक ही वर्तनी रखें।
- बच्चे के बड़े होने पर उसे दोनों नामों का अर्थ और कहानी बताएँ।
नाम का चुनाव प्रेम और समझ से करें, डर से नहीं। नाम बदलने से कुंडली के ग्रह नहीं बदलते — इस पर नीचे सवाल-जवाब में भी बात है।
नामकरण मुहूर्त — परंपरा क्या देखती है
मुहूर्त का अर्थ है किसी शुभ काम के लिए अच्छा समय चुनना। नामकरण का मुहूर्त पंचांग से देखा जाता है। पंचांग के पाँच अंग हैं — तिथि (चंद्र-दिन), वार (सप्ताह का दिन), नक्षत्र (उस समय चंद्रमा का नक्षत्र), योग (सूर्य-चंद्र की स्थिति से बनने वाला योग) और करण (आधी तिथि)। नीचे इनकी आम बातें हैं। ये परंपरा के नियम हैं, और हर परिवार अपनी कुल-रीति और अपने पंडित की सलाह से इन्हें अपनाता है।
तिथि
चंद्रमा जब सूर्य से 12 अंश आगे बढ़ता है, तो एक तिथि पूरी होती है। एक चंद्र-मास में तीस तिथियाँ होती हैं — पंद्रह शुक्ल पक्ष (बढ़ते चंद्रमा) की और पंद्रह कृष्ण पक्ष (घटते चंद्रमा) की।
- टाली जाने वाली तिथियाँ: चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी को रिक्ता (खाली) तिथि कहा जाता है, और मुहूर्त-ग्रंथ इन्हें शुभ आरंभ के लिए नहीं चुनते। अमावस्या भी टाली जाती है। कई ग्रंथ अष्टमी और पूर्णिमा जैसी पर्व-तिथियाँ भी छोड़ते हैं।
- आम तौर पर अच्छी तिथियाँ: द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी और त्रयोदशी।
तिथि कई बार दिन के बीच में बदल जाती है। तब पंडित वह समय चुनते हैं जब शुभ तिथि चल रही हो।
नक्षत्र
मुहूर्त-ग्रंथ नक्षत्रों को उनके स्वभाव के अनुसार समूहों में बाँटते हैं। नामकरण, जातकर्म और ऐसे सौम्य संस्कारों के लिए जिन नक्षत्रों को पसंद किया जाता है, वे ये हैं:
| समूह | स्वभाव | नक्षत्र |
|---|---|---|
| ध्रुव (स्थिर) | टिकाऊ, स्थायी शुरुआत | रोहिणी, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तरा भाद्रपद |
| मृदु (कोमल) | कोमल, मैत्री वाले काम | मृगशिरा, चित्रा, अनुराधा, रेवती |
| क्षिप्र (लघु) | जल्दी और हल्के काम | अश्विनी, पुष्य, हस्त |
| चर (चल) | गति और आगे बढ़ने वाले काम | पुनर्वसु, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा |
यानी कुल सोलह नक्षत्र — अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, रेवती, और तीनों उत्तरा (उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तरा भाद्रपद)। बाक़ी नक्षत्रों में भी पंडित कभी-कभी दूसरे शुभ योग देखकर मुहूर्त निकालते हैं, पर आम पसंद यही सूची है।
वार
सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार नामकरण के लिए अच्छे माने जाते हैं। इनके स्वामी हैं चंद्र (मन), बुध (बुद्धि और वाणी), गुरु (ज्ञान और संतान) और शुक्र (सुख-सुविधा) — चारों सौम्य ग्रह। नाम बोलने-सुनने की चीज़ है और वाणी का कारक बुध है, इसलिए कई घर बुधवार पसंद करते हैं। गुरु संतान का कारक है, इसलिए गुरुवार भी बहुत चुना जाता है। मंगलवार और शनिवार को आम तौर पर इस संस्कार के लिए नहीं चुना जाता — यह सिर्फ़ चुनाव की परंपरा है, इसमें डरने की कोई बात नहीं।
करण — विष्टि यानी भद्रा से बचाव
करण आधी तिथि होता है, इसलिए हर तिथि में दो करण होते हैं। कुल ग्यारह करण हैं। इनमें विष्टि करण को भद्रा भी कहते हैं, और मुहूर्त-ग्रंथ इसे शुभ आरंभ के लिए नहीं चुनते। विष्टि महीने में कई बार कुछ घंटों के लिए आती है। पंचांग में भद्रा के शुरू और ख़त्म होने का समय लिखा होता है, और नामकरण का समय उसके बाहर रखा जाता है। इसी तरह पंचांग के सत्ताईस योगों में से व्यतीपात और वैधृति शुभ कामों में छोड़े जाते हैं।
बच्चे के अपने नक्षत्र से तारा-बल और चंद्र-बल
अच्छा पंडित मुहूर्त को बच्चे के जन्म-नक्षत्र से भी मिलाता है। जन्म-नक्षत्र से उस दिन के नक्षत्र तक गिनकर नौ-नौ के चक्र में "तारा" निकाली जाती है, और तीसरी, पाँचवीं और सातवीं तारा आम तौर पर टाली जाती है। यही तारा-गणना विवाह के गुण मिलान में "तारा कूट" के रूप में भी आती है। चंद्र-बल में देखा जाता है कि उस दिन का चंद्रमा बच्चे की जन्म-राशि से अच्छे स्थान पर हो।
लग्न और समय
दिन तय होने के बाद भी घंटा चुना जा सकता है। पंडित ऐसा लग्न चुनते हैं जिसमें शुभ ग्रह अच्छे भावों में हों और लग्न पर पाप-ग्रहों (कठोर स्वभाव वाले ग्रह — शनि, मंगल, राहु, केतु) का दबाव न हो। ग्रहण के दिन और संक्रांति (सूर्य के राशि बदलने का दिन) को परंपरा में ऐसे संस्कार नहीं रखे जाते। राहुकाल देखना ख़ासकर दक्षिण भारत की प्रचलित परंपरा है।
एक नज़र में — नामकरण मुहूर्त की आम बातें
| पंचांग का अंग | परंपरा में आम पसंद | आम तौर पर टाला जाता है |
|---|---|---|
| दिन | जन्म से ग्यारहवाँ या बारहवाँ दिन, या कुल-रीति का कोई शुभ दिन | सूतक के भीतर के दिन |
| तिथि | द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी | रिक्ता (4, 9, 14), अमावस्या; कई ग्रंथों में पर्व-तिथियाँ |
| नक्षत्र | ध्रुव, मृदु, क्षिप्र और चर समूह के सोलह नक्षत्र | बाक़ी नक्षत्र आम तौर पर कम चुने जाते हैं |
| वार | सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार | मंगलवार, शनिवार (आम परंपरा) |
| करण | विष्टि के अलावा कोई भी | विष्टि (भद्रा) |
| योग | आम योग | व्यतीपात, वैधृति |
| बच्चे से मेल | अच्छा तारा-बल और चंद्र-बल | तीसरी, पाँचवीं, सातवीं तारा |
कुल-रीति भी उतनी ही ज़रूरी
मुहूर्त की ये बातें शास्त्र की हैं, पर घर की रीति भी उतनी ही आदर की चीज़ है। अगर परिवार में हमेशा बारहवें दिन नामकरण होता आया है, तो उसी दिन का सबसे अच्छा घंटा चुन लेना भी सही रास्ता है। सबसे पहले माँ और बच्चे का स्वास्थ्य है। बच्चा अस्पताल में हो या माँ को आराम चाहिए, तो संस्कार आगे खिसकाने में कोई दोष नहीं। ज्योतिष के उपाय और मुहूर्त डॉक्टर के इलाज के साथ चलते हैं, उसकी जगह नहीं।
गंडमूल नक्षत्र का सवाल — शान्ति से समझें
परंपरा में अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती को गंडमूल नक्षत्र कहा जाता है, क्योंकि ये वहाँ पड़ते हैं जहाँ राशि और नक्षत्र की सीमा एक साथ आती है। सत्ताईस में से छह नक्षत्र ऐसे हैं, यानी ऐसे जन्म बहुत आम हैं। परंपरा में इसके लिए एक शांति-पूजा का रिवाज़ है, जो आम तौर पर लगभग सत्ताईसवें दिन होती है, जब चंद्रमा फिर उसी नक्षत्र में लौटता है। यह मंगल-कामना की पूजा है। इसका अर्थ यह नहीं कि बच्चे में कोई कमी है, और इस वजह से न माँ को, न बच्चे को दोष देना ठीक है। अश्विनी और रेवती तो नामकरण मुहूर्त के पसंदीदा नक्षत्रों में भी हैं।
नाम का अर्थ — चुनने के सरल तरीके
अक्षर तय हो गया, अब नाम चुनना है। यहाँ ज्योतिष का काम पूरा हो जाता है और परिवार की समझ, भाषा और प्रेम का काम शुरू होता है। कुछ सरल बातें इस चुनाव को आसान बनाती हैं।
अर्थ अच्छा हो
परंपरा में नाम का अर्थ शुभ होना सबसे पहली बात है। देवी-देवताओं के नाम, अच्छे गुणों के नाम (जैसे धैर्य, करुणा, विद्या), प्रकृति के सुंदर रूप (नदी, पर्वत, फूल, प्रकाश) — ये सब अच्छे स्रोत हैं। जो नाम चुनें, उसका अर्थ किसी जानकार या भरोसेमंद शब्दकोश से एक बार ज़रूर देख लें।
बोलने में आसान हो, घर की रीति से मेल खाए
नाम ऐसा हो जो दादी भी आराम से बोल सकें और स्कूल के दोस्त भी। बहुत लंबे, कठिन या ऐसे नाम जिनका मज़ाक बन सके, उनसे बचना समझदारी है। अंग्रेज़ी वर्तनी में भी एक बार लिखकर देख लें। कुछ परिवारों में जीवित बड़ों का नाम बच्चे को नहीं दिया जाता, कुछ में दादा-दादी के नाम पर नाम रखना सम्मान है। इन बातों पर घर के बड़ों से बात कर लें — सबकी सहमति उत्सव को और सुंदर बनाती है।
पुराने गृह्यसूत्रों का एक सुझाव
पुराने गृह्यसूत्रों (घर के संस्कारों की विधि बताने वाले वैदिक ग्रंथ) में यह सुझाव मिलता है कि लड़के का नाम दो या चार अक्षरों का हो, और लड़की का नाम विषम अक्षरों का हो जो "आ" जैसे दीर्घ स्वर पर ख़त्म हो। आज बहुत कम परिवार इसे सख़्ती से मानते हैं। यह जानकारी परंपरा के रंग के लिए है, कोई बाध्यता नहीं।
नाम चुनने का सरल क्रम
- अस्पताल के काग़ज़ से सही जन्म-तिथि, घंटा-मिनट और जन्म-स्थान लिखें।
- इन्हीं से, लाहिरी अयनांश पर, जन्म-नक्षत्र और चरण निकालें।
- ऊपर की तालिका से उस चरण का अक्षर और राशि देखें।
- उस अक्षर से शुरू होने वाले दस-बारह नाम लिखें, जो परिवार को पसंद हों।
- हर नाम का अर्थ, उच्चारण और वर्तनी देखें, और जो नाम ठीक न लगें उन्हें हटाएँ।
- बचे हुए दो-तीन नामों पर घर के बड़ों का आशीर्वाद और राय लें।
- नामकरण का मुहूर्त निकलवाएँ और उस दिन विधि से नाम रखें।
नाम का असली मूल्य उसके अर्थ और उस प्रेम में है जिससे घर के लोग उसे पुकारते हैं।
नामकरण की सरल विधि
नामकरण की विधि हर परिवार और क्षेत्र में थोड़ी अलग होती है। यहाँ एक सरल, हानि-रहित रूप है, जिसे कोई भी परिवार अपने पंडित के साथ या ख़ुद श्रद्धा से कर सकता है। हर शुभ काम की तरह इसकी शुरुआत भी गणेश जी के स्मरण से होती है, इस मंत्र के साथ —
'ॐ गं गणपतये नमः'
- तैयारी: घर साफ़ करें। माँ और बच्चे को साफ़, आरामदायक कपड़े पहनाएँ। एक चौकी पर साफ़ कपड़ा, जल भरा कलश, दीपक और फूल रखें।
- गणेश पूजा: दीपक जलाकर ऊपर दिया गणेश मंत्र 11 या 21 बार श्रद्धा से बोलें।
- संकल्प: पिता या घर के बड़े हाथ में जल लेकर संकल्प करते हैं — तिथि, स्थान, परिवार का गोत्र (अगर परिवार इसे मानता है), बच्चे का जन्म-नक्षत्र, और यह भाव कि हम बच्चे का नामकरण कर रहे हैं।
- कुल-देवता और नवग्रह स्मरण: परिवार अपने कुल-देवता या इष्ट-देव का स्मरण करता है। चाहें तो नवग्रहों को भी प्रणाम करें।
- नाम लिखना: कई घरों में एक थाली में साफ़ चावल बिछाकर उस पर उँगली या चाँदी के सिक्के से बच्चे का नाम लिखा जाता है। कहीं पान के पत्ते पर कुमकुम से लिखते हैं।
- दाहिने कान में नाम: पिता, या कुल-रीति के अनुसार बुआ, बच्चे को गोद में लेकर उसके दाहिने कान के पास धीरे से उसका नाम बोलते हैं। आवाज़ कोमल रहे। बच्चे के कान में कुछ भी डालना या कान के पास ज़ोर से बोलना ठीक नहीं।
- आशीर्वाद: फिर घर के सब बड़े एक-एक करके बच्चे का नाम लेकर उसे आशीर्वाद देते हैं — स्वस्थ रहो, सुखी रहो, विद्या और विनय पाओ।
- दान और मिठाई: परिवार अपनी सामर्थ्य से अन्न, वस्त्र या ज़रूरतमंद की कोई सेवा का संकल्प लेता है, और सबको मिठाई बाँटी जाती है।
माता-पिता के लिए एक सरल नियम
अगर माता-पिता चाहें, तो नामकरण के दिन से बच्चे के मन (चंद्रमा) की शांति और घर के मंगल के भाव से कोई एक मंत्र नियम से जप सकते हैं। जैसे चंद्र मंत्र —
'ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः'
या भगवान विष्णु का मंत्र —
'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'
जप रोज़ 108 बार (एक माला) करें, कम से कम 43 दिन बिना नागा। नई माँ पर इसका भार न डालें — पिता या घर के कोई और सदस्य भी यह जप कर सकते हैं। कोई भी उपाय गारंटी नहीं है; नियम और श्रद्धा से किया गया जप मन को सहारा देता है।
बच्चे की सेहत सबसे पहले
- हवन या धूप का धुआँ बच्चे से दूर रखें, और भीड़-शोर कम रखें।
- कुछ पुराने विधानों में नवजात को शहद चटाने की बात आती है। आज डॉक्टर एक साल से छोटे बच्चे को शहद देने से मना करते हैं — उनकी बात मानें।
- नवजात को रत्न पहनाने की सलाह हम नहीं देते। रत्न पहनना हो तो किसी जानकार को पूरी कुंडली दिखाकर ही, क्योंकि जिस ग्रह को शांत करना हो उसका रत्न उलटा असर कर सकता है।
- माँ को बीच-बीच में आराम दें। संस्कार छोटा और सुंदर रखें।
बच्चे की कुंडली और कुंडली मिलान — आगे का रिश्ता
नामकरण के दिन बहुत से घरों में बच्चे की जन्म-पत्रिका पहली बार लिखी जाती है। इसलिए इस दिन की सबसे बड़ी सेवा यह है कि जन्म-समय, तारीख़ और स्थान सही-सही लिखकर सँभाल लिए जाएँ। बीस-पच्चीस साल बाद विवाह की बात आएगी, तो कुंडली मिलान इसी पर बनेगा।
नाम से गुण मिलान और जन्म-विवरण से गुण मिलान
परंपरा में एक पुराना नियम है — अगर वर या वधू का जन्म-समय पता न हो, तो उसके प्रसिद्ध नाम (जिस नाम से वह जाना जाता है) के पहले अक्षर से अवकहडा चक्र में उसका नक्षत्र और राशि मानकर गुण मिलाए जाते हैं। यह उस समय का व्यावहारिक रास्ता था जब बहुत से लोगों का जन्म-समय दर्ज नहीं होता था।
पर इस तरीके की सीमाएँ साफ़ हैं। नाम का अक्षर असली चंद्रमा का सिर्फ़ अंदाज़ा देता है, और नाम राशि के अक्षर से न रखा गया हो तो यह अंदाज़ा गलत भी हो सकता है। मांगलिक दोष, जो मंगल के भाव से देखा जाता है, नाम से निकल ही नहीं सकता। इसलिए हमारा विवाह कुंडली मिलान दोनों के जन्म-विवरण — तारीख़, समय और स्थान — से बनता है। उसमें अष्टकूट के 36 गुण, मांगलिक दोष, नाड़ी और भकूट, दोष-छूट (शास्त्र की वे स्थितियाँ जिनमें दोष का असर घटता है) और उपाय असली ग्रह-स्थिति से देखे जाते हैं। आज जो माता-पिता बच्चे का जन्म-समय ठीक से लिख लेते हैं, वे उसके विवाह-मिलान को सटीक बनाने की नींव रख देते हैं।
माता-पिता और बच्चे का गृह-शान्ति मिलान
हमारा गृह-शांति कुंडली मिलान घर के कोई भी दो सदस्यों के लिए बनता है — इनमें माता या पिता और बच्चा भी आ सकते हैं। यह रिपोर्ट दोनों की कुंडली से उनका स्वभाव-मेल, दोनों का चंद्र (मन की स्थिति), चौथा भाव (घर का सुख और शांति), वाणी का भाव, अभी की दशा और शनि-गोचर, और परंपरा के अनुसार पितृ दोष व कालसर्प योग देखती है, और फिर हर बात का सरल उपाय बताती है।
साफ़ कहें तो यह रिपोर्ट बच्चे की पढ़ाई, नौकरी, धन या भविष्य की भविष्यवाणी नहीं करती। यह बताती है कि दोनों के स्वभाव और मन कहाँ मिलते हैं, कहाँ अलग चलते हैं, घर के माहौल पर किसका अभी का समय असर डाल रहा है, और कौन-सा उपाय किसके लिए है। बच्चा बड़ा होने पर माता-पिता को लगे कि वे एक-दूसरे को समझने में अटकते हैं, या नए बच्चे के आने के बाद घर का माहौल भारी-सा लगे, तब यह मिलान काम आता है। घर की हर उलझन का कारण ग्रह नहीं होते, और रिपोर्ट किसी एक सदस्य को दोषी नहीं ठहराती।
भुगतान के बाद मिलान का पूरा परिणाम साइट पर तुरंत खुलता है। पूरी रिपोर्ट PDF में आती है — दोनों की अपनी कुंडली, उपायों का पूरा विधान, सप्ताह का क्रम और "आपके सवाल — सीधे जवाब" के साथ।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
नामकरण किस दिन करना सबसे अच्छा है?
परंपरा में जन्म के ग्यारहवें या बारहवें दिन, सूतक पूरा होने के बाद, नामकरण किया जाता है। अगर उस दिन संभव न हो, तो किसी शुभ तिथि, शुभ नक्षत्र और अच्छे वार में बाद में भी किया जा सकता है। बहुत से परिवार अपनी कुल-रीति के अनुसार इक्कीसवें दिन, तीसरे महीने या पहले जन्मदिन के आसपास करते हैं। माँ और बच्चे का स्वास्थ्य सबसे पहले है।
जन्म-समय पक्का न हो तो नाम का अक्षर कैसे निकालें?
अस्पताल के काग़ज़ों में समय अक्सर मिनट तक लिखा होता है, पहले वहीं देखें। अगर अंदाज़ा ही है, तो नक्षत्र कई बार सही निकल आता है, पर चरण गलत हो सकता है, क्योंकि चंद्रमा लगभग छह घंटे में एक चरण बदलता है। ऐसे में दो संभावित चरण देखकर उस नक्षत्र का कोई अक्षर चुनें, या राशि-नाम अलग रखकर पुकारने का नाम अपनी पसंद से रखें।
क्या पुकारने का नाम भी राशि के अक्षर से होना ज़रूरी है?
नहीं, यह अनिवार्य नहीं है। परंपरा में दो नाम रखने की रीति पुरानी है — राशि-नाम पूजा, संकल्प और जन्म-पत्रिका के लिए, और पुकारने का नाम रोज़ के जीवन और काग़ज़ों के लिए। बहुत से परिवार एक ही नाम चुनते हैं जो राशि के अक्षर से भी शुरू हो और पसंद भी हो। दोनों रास्ते ठीक हैं। बस काग़ज़ों में एक ही नाम और वर्तनी रखें।
विदेश में जन्मे बच्चे का अक्षर कैसे निकलेगा?
तरीका वही है — चंद्रमा का नक्षत्र और चरण। बस जन्म का समय उसी देश के समय-क्षेत्र के अनुसार सही लें, और यह देखें कि उस दिन वहाँ गर्मियों की घड़ी-बदली (एक घंटा आगे) लागू थी या नहीं। जन्म-स्थान सही भरने से गणना यह अपने-आप सँभाल लेती है। भारत के समय में हाथ से बदलते हुए एक घंटे की भूल चरण बदल सकती है।
क्या नाम से गुण मिलान उतना ही सही है जितना जन्म-विवरण से?
नहीं। जब जन्म-समय पता न हो, तब परंपरा प्रसिद्ध नाम के पहले अक्षर से नक्षत्र मानकर गुण मिलाती है। यह एक अंदाज़ा है, क्योंकि नाम असली चंद्रमा से अलग अक्षर का भी हो सकता है। मांगलिक दोष तो नाम से देखा ही नहीं जा सकता। इसलिए हमारा विवाह कुंडली मिलान दोनों के जन्म-विवरण से बनता है, ताकि गुण, मांगलिक और नाड़ी असली ग्रह-स्थिति से देखे जाएँ।
क्या गलत अक्षर का नाम बच्चे के लिए हानिकारक है?
नहीं, ऐसा डरने की कोई ज़रूरत नहीं। कुंडली जन्म के क्षण से बनती है, नाम से नहीं, इसलिए नाम बदलने से ग्रह नहीं बदलते। राशि के अक्षर से नाम रखना एक सुंदर परंपरा है, पर कोई भी नाम न किसी फल की गारंटी देता है, न किसी का भाग्य बिगाड़ता है। अगर अक्षर अलग है, तो चाहें तो राशि-नाम अलग से पत्रिका में लिख लें।
नामकरण के दिन कौन-सा मंत्र बोलें?
शुरुआत ऊपर विधि वाले खंड में दिए गणेश मंत्र से करें, फिर परिवार अपने कुल-देवता या इष्ट-देव का स्मरण करे। माता-पिता चाहें तो बच्चे के मन की शांति के भाव से उसी खंड में दिया चंद्र मंत्र या भगवान विष्णु का मंत्र रोज़ 108 बार, कम से कम 43 दिन तक जप सकते हैं। नई माँ पर इसका भार न डालें; घर का कोई और सदस्य भी जप कर सकता है।