पंचांग (पाँच अंगों वाला हिन्दू दिन-पत्र) भारत के घरों में सदियों से रोज़ खुलता आया है। व्रत, त्योहार, नामकरण, गृह-प्रवेश और विवाह — सबकी तारीख़ इसी से निकलती है। फिर भी बहुत लोगों को उसका पन्ना उलझा हुआ लगता है — इतने नाम, इतने समय, और ऊपर से 'राहुकाल' जैसा शब्द, जिसे सुनते ही मन में हल्की घबराहट आ जाती है।
यह पन्ना वही उलझन हटाता है। पहले आज का पंचांग है, जिसे हमारी गणना रोज़ ग्रहों की असली स्थिति से बनाती है। फिर हर अंग का सीधा अर्थ, समय निकालने का तरीक़ा, और आख़िर में विवाह के मुहूर्त की बात — जहाँ वर-वधू दोनों की कुंडली भी देखनी पड़ती है। यह लेख कुंडली मिलान ज्योतिष की टीम ने लिखा है — डराने के लिए नहीं, समझाने के लिए।
आज का पंचांग — 5 नवंबर 2026
गुरुवार · शहर: दिल्ली
| वार | गुरुवार |
|---|---|
| तिथि | एकादशी — 10:36 तक, फिर द्वादशी |
| पक्ष | कृष्ण पक्ष |
| नक्षत्र | उत्तरा फाल्गुनी — 03:56 (अगले दिन) तक, फिर हस्त |
| योग | वैधृति — 05:10 (अगले दिन) तक |
| करण | बालव — 10:36 तक |
| चंद्र राशि | सिंह |
| सूर्य राशि | तुला |
| सूर्योदय | 06:36 |
| सूर्यास्त | 17:33 |
| राहुकाल | 13:26 – 14:49 |
| यमगंड | 06:35 – 07:59 |
| गुलिक काल | 09:20 – 10:43 |
| अभिजित मुहूर्त | 11:43 – 12:26 |
| ब्रह्म मुहूर्त | 04:52 – 05:43 |
दिन का चौघड़िया
- शुभ 06:36 – 07:58 शुभ
- रोग 07:58 – 09:20 टालें
- उद्वेग 09:20 – 10:43 टालें
- चर 10:43 – 12:05 सामान्य
- लाभ 12:05 – 13:27 शुभ
- अमृत 13:27 – 14:48 शुभ
- काल 14:48 – 16:11 टालें काल वेला
- शुभ 16:11 – 17:34 शुभ वार वेला
गणना: लाहिरी अयनांश, इस शहर के सूर्योदय से (वार सूर्योदय से बदलता है)। सूर्योदय = सूरज का ऊपरी किनारा क्षितिज पर, मानक अपवर्तन सहित। समय 24 घंटे की घड़ी में, शहर के स्थानीय समय से। शुभ मुहूर्त (अभिजित, ब्रह्म) भीतर की ओर पूरे मिनट तक, और राहु काल, यमगंड, गुलिक बाहर की ओर — ताकि शुभ दिखाया समय कभी अशुभ में न पड़े।
पंचांग क्या है — पाँच अंग एक नज़र में
पंचांग शब्द दो हिस्सों से बना है — पंच (पाँच) और अंग (हिस्सा)। हर दिन को पाँच तरह से पहचाना जाता है। इनमें चार — तिथि, नक्षत्र, योग और करण — आकाश में सूर्य और चंद्रमा की स्थिति से निकलते हैं, और पाँचवाँ, वार, सूर्योदय से चलता है। यानी पंचांग आकाश की घड़ी है — इसमें अंदाज़ा नहीं, सीधा गणित है।
आकाश के पूरे घेरे को 360 अंश (डिग्री) में बाँटा जाता है। सूर्य इसमें रोज़ लगभग एक अंश चलता है, और चंद्रमा लगभग 12 से 15 अंश।
| अंग | किससे बनता है | कितना लंबा | कुल |
|---|---|---|---|
| तिथि | चंद्रमा सूर्य से कितना आगे है — हर 12 अंश पर एक | लगभग 20 से 27 घंटे | 30 |
| वार | सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक | एक दिन | 7 |
| नक्षत्र | चंद्रमा आकाश के किस हिस्से में है — हर 13 अंश 20 कला पर एक | लगभग 21 से 27 घंटे | 27 |
| योग | सूर्य और चंद्रमा के अंशों का जोड़ | लगभग 20 से 25 घंटे | 27 |
| करण | आधी तिथि — हर 6 अंश पर एक | लगभग 10 से 13 घंटे | 11 नाम |
पुराने पंचांगों में समय घटी में लिखा जाता था। एक घटी (घड़ी) 24 मिनट की, और दो घटी का एक मुहूर्त — लगभग 48 मिनट। दिन-रात में 30 मुहूर्त होते हैं, 15 दिन के और 15 रात के। बोलचाल में 'मुहूर्त' का अर्थ 'शुभ समय' हो गया है, पर गणित में यह समय की इकाई है। 'चौघड़िया' नाम भी यहीं से आया — लगभग चार घड़ी का हिस्सा।
तिथि — चंद्रमा सूर्य से कितना आगे है
अमावस्या को सूर्य और चंद्रमा आकाश में लगभग एक ही जगह होते हैं। उसके बाद चंद्रमा तेज़ चलकर रोज़ सूर्य से लगभग 12 अंश आगे निकल जाता है। हर 12 अंश की दूरी एक तिथि है। 360 को 12 से बाँटें तो 30 — इसीलिए एक चंद्र-मास में 30 तिथियाँ होती हैं।
चंद्रमा कभी तेज़ चलता है, कभी धीमा। इसलिए कोई तिथि लगभग 20 घंटे में पूरी हो जाती है और कोई 26-27 घंटे लेती है। तिथि दिन या रात के किसी भी समय बदल सकती है — इसीलिए पंचांग में लिखा रहता है, 'षष्ठी 14:32 तक, फिर सप्तमी'।
दो पक्ष — शुक्ल और कृष्ण
पक्ष यानी पखवाड़ा, लगभग 15 दिन।
- शुक्ल पक्ष — अमावस्या के बाद प्रतिपदा से पूर्णिमा तक। चंद्रमा रोज़ बढ़ता दिखता है।
- कृष्ण पक्ष — पूर्णिमा के बाद प्रतिपदा से अमावस्या तक। चंद्रमा रोज़ घटता दिखता है।
दोनों पक्षों में तिथियों के नाम एक ही हैं — प्रतिपदा से चतुर्दशी तक। फ़र्क़ सिर्फ़ पंद्रहवीं का है: शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा, कृष्ण पक्ष में अमावस्या। इसलिए तिथि के साथ पक्ष ज़रूर देखिए — अकेला 'एकादशी' अधूरा है, 'शुक्ल एकादशी' पूरा।
पाँच समूह — नंदा, भद्रा, जया, रिक्ता, पूर्णा
पुराने आचार्यों ने पंद्रह तिथियों को पाँच समूहों में बाँटा। यह बँटवारा दोनों पक्षों में एक जैसा है।
| समूह | अर्थ | तिथियाँ | परंपरा में |
|---|---|---|---|
| नंदा | आनंद देने वाली | प्रतिपदा (1), षष्ठी (6), एकादशी (11) | उत्सव, कला |
| भद्रा | कल्याण करने वाली | द्वितीया (2), सप्तमी (7), द्वादशी (12) | घर-गृहस्थी के टिकाऊ काम |
| जया | जीत दिलाने वाली | तृतीया (3), अष्टमी (8), त्रयोदशी (13) | मेहनत और हिम्मत के काम |
| रिक्ता | ख़ाली | चतुर्थी (4), नवमी (9), चतुर्दशी (14) | नई मांगलिक शुरुआत के लिए प्रायः नहीं |
| पूर्णा | भरी हुई | पंचमी (5), दशमी (10), पूर्णिमा या अमावस्या (15) | पूरे होने वाले शुभ काम (अमावस्या को छोड़कर) |
परंपरा कहती है कि रिक्ता तिथि में शुरू की गई मांगलिक बात अधूरी-सी रह सकती है, इसलिए विवाह या गृह-प्रवेश के लिए इन्हें प्रायः नहीं चुना जाता। पर डरने की बात नहीं — चतुर्थी गणेश जी की तिथि है, नवमी को राम नवमी आती है, और महाशिवरात्रि चतुर्दशी को। पूजा-व्रत के लिए ये बहुत पवित्र तिथियाँ हैं। इसी तरह एकादशी विष्णु जी के व्रत की तिथि है, और त्रयोदशी की शाम प्रदोष व्रत होता है।
पूर्णिमा और अमावस्या
पूर्णिमा को चंद्रमा सूर्य के ठीक सामने, 180 अंश पर होता है, इसलिए पूरा गोल चमकता है। गुरु पूर्णिमा, श्रावण पूर्णिमा का रक्षाबंधन, शरद पूर्णिमा और फाल्गुन पूर्णिमा का होलिका दहन — बहुत-से पर्व पूर्णिमा को आते हैं।
अमावस्या को चंद्रमा सूर्य के साथ होता है, इसलिए दिखता नहीं। परंपरा में यह पितरों (पूर्वजों) को याद करने, दान और शांत साधना का दिन है। अमावस्या अशुभ नहीं — बस विवाह या गृह-प्रवेश जैसी नई शुरुआत के लिए इसे प्रायः नहीं चुना जाता।
उदया तिथि, क्षय और वृद्धि
दिन की तिथि वह मानी जाती है जो सूर्योदय के समय चल रही हो — इसे उदया तिथि कहते हैं। मान लीजिए सूर्योदय 6:15 पर है और पंचमी 9:40 तक, फिर षष्ठी। तो पूरा दिन पंचमी कहलाएगा।
कभी कोई तिथि दो सूर्योदयों के बीच ही शुरू होकर ख़त्म हो जाती है — यह क्षय तिथि है, और कैलेंडर में छूटी दिखती है। कोई तिथि दो सूर्योदय छू ले, तो दो दिन एक ही तिथि लिखी जाती है — यह वृद्धि तिथि है। यह ग़लती नहीं, चंद्रमा की बदलती चाल का नतीजा है।
व्रतों के अपने नियम भी हैं — करवा चौथ और संकष्टी चतुर्थी में चंद्रोदय की तिथि देखी जाती है, जन्माष्टमी में आधी रात की, और प्रदोष में सूर्यास्त के बाद की।
अमांत और पूर्णिमांत
चंद्र-मास के नाम दो तरह से गिने जाते हैं। अमांत (अमावस्या पर ख़त्म होने वाला महीना) गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र में चलता है; पूर्णिमांत (पूर्णिमा पर ख़त्म होने वाला) उत्तर भारत में। कृष्ण पक्ष में महीने का नाम बदल जाता है: जन्माष्टमी उत्तर भारत में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी है और महाराष्ट्र-गुजरात में श्रावण कृष्ण अष्टमी — दिन एक ही।
लगभग हर तीन साल में एक चंद्र-मास दोहराया जाता है — अधिक मास या पुरुषोत्तम मास — ताकि चंद्र-वर्ष (लगभग 354 दिन) ऋतुओं से पीछे न छूटे। परंपरा में इसमें विवाह नहीं होते, पर जप, दान और भक्ति के लिए यह बहुत अच्छा माना गया है।
वार — दिन सूर्योदय से शुरू होता है
घड़ी आधी रात 12 बजे तारीख़ बदल देती है, पर पंचांग में वार सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक चलता है। अगर कोई बच्चा मंगलवार की रात 3 बजे, सूर्योदय से पहले जन्मा, तो कैलेंडर में तारीख़ बुधवार की होगी, पर पंचांग में वह मंगलवार ही है। इसी कारण राहुकाल, चौघड़िया और होरा भी सूर्योदय से गिने जाते हैं। हमारी कुंडली की गणना भी यही नियम मानती है।
| वार | स्वामी ग्रह | परंपरा में किस तरह के काम |
|---|---|---|
| रविवार | सूर्य | सरकारी काम, बड़ों से मिलना, सूर्य को जल |
| सोमवार | चंद्र | मन और घर-परिवार के काम, शिव-पूजा |
| मंगलवार | मंगल | साहस के काम, ज़मीन की बात, हनुमान-पूजा |
| बुधवार | बुध | पढ़ाई, लेखन, हिसाब, व्यापार |
| गुरुवार | गुरु | ज्ञान, गुरु-पूजा, धर्म के काम |
| शुक्रवार | शुक्र | कला, संगीत, नए कपड़े, लक्ष्मी-पूजा |
| शनिवार | शनि | लंबी मेहनत, सेवा, दान, शनि-पूजा |
परंपरा में सोम, बुध, गुरु और शुक्र सौम्य (कोमल) वार कहलाते हैं, और रवि, मंगल और शनि क्रूर (कड़े) वार। 'क्रूर' का अर्थ बुरा नहीं — ये दिन साहस और अनुशासन के हैं, डरने के नहीं, साधना के।
वारों का क्रम — होरा की कहानी
रविवार के बाद सोमवार ही क्यों आता है? इसका उत्तर होरा में है। प्राचीन ज्योतिष ने सात ग्रहों को चाल के क्रम में रखा — सबसे धीमा शनि, फिर गुरु, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध, और सबसे तेज़ चंद्रमा। दिन-रात को 24 होरा (लगभग एक-एक घंटे के हिस्से) में बाँटा गया, और हर होरा का स्वामी इसी क्रम में बदलता है।
रविवार के सूर्योदय पर पहला होरा सूर्य का है। फिर शुक्र, बुध, चंद्र, शनि, गुरु, मंगल — और फिर सूर्य। ऐसे 24 होरा पूरे होने पर अगले सूर्योदय का पहला होरा चंद्रमा के हिस्से आता है, इसलिए अगला दिन सोमवार है। आगे गिनते जाइए — फिर मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि। परंपरा में जिस ग्रह का होरा हो, उससे जुड़ा काम उसमें अच्छा माना जाता है — बुध के होरा में पढ़ाई, गुरु के होरा में पूजा। यह बारीक साधन है; रोज़ इसकी चिंता ज़रूरी नहीं।
नक्षत्र — चंद्रमा आज किस तारा-समूह के पास है
आकाश में चंद्रमा का रास्ता 27 बराबर हिस्सों में बँटा है, और हर हिस्सा एक तारा-समूह से पहचाना जाता है — यही नक्षत्र है। एक नक्षत्र 13 अंश 20 कला का होता है (कला यानी अंश का साठवाँ भाग)। चंद्रमा लगभग 27.3 दिन में पूरा चक्कर लगाता है, यानी रोज़ लगभग एक नक्षत्र। हर नक्षत्र के चार चरण (पद) हैं, और जन्म-नक्षत्र का चरण नाम के पहले अक्षर का आधार बनता है।
यही जन्म-नक्षत्र कुंडली मिलान में बहुत काम आता है। अष्टकूट (आठ कसौटियों वाले मिलान) के चार कूट — तारा, योनि, गण और नाड़ी — सीधे दोनों के जन्म-नक्षत्र से निकलते हैं।
27 नक्षत्र और उनके स्वामी
विंशोत्तरी दशा (120 वर्ष का दशा-चक्र) में हर नक्षत्र का एक स्वामी ग्रह है। क्रम हमेशा यही है — केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध — और यह 27 नक्षत्रों में ठीक तीन बार घूमता है। जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में हो, जीवन की पहली दशा उसी के स्वामी की होती है।
| स्वामी | नक्षत्र 1–9 | नक्षत्र 10–18 | नक्षत्र 19–27 |
|---|---|---|---|
| केतु | अश्विनी | मघा | मूल |
| शुक्र | भरणी | पूर्वाफाल्गुनी | पूर्वाषाढ़ा |
| सूर्य | कृत्तिका | उत्तराफाल्गुनी | उत्तराषाढ़ा |
| चंद्र | रोहिणी | हस्त | श्रवण |
| मंगल | मृगशिरा | चित्रा | धनिष्ठा |
| राहु | आर्द्रा | स्वाति | शतभिषा |
| गुरु | पुनर्वसु | विशाखा | पूर्वाभाद्रपद |
| शनि | पुष्य | अनुराधा | उत्तराभाद्रपद |
| बुध | आश्लेषा | ज्येष्ठा | रेवती |
नक्षत्रों के सात स्वभाव
मुहूर्त ग्रंथों (शुभ समय चुनने के शास्त्र) में नक्षत्रों को स्वभाव के हिसाब से सात समूहों में रखा गया है।
| समूह | नक्षत्र | परंपरा में किस तरह के काम |
|---|---|---|
| ध्रुव (स्थिर) | रोहिणी, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद | नींव रखना, घर बनाना, पेड़ लगाना |
| चर (चलायमान) | पुनर्वसु, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा | यात्रा, वाहन |
| क्षिप्र (तेज़) | अश्विनी, पुष्य, हस्त | व्यापार, नया सीखना |
| मृदु (कोमल) | मृगशिरा, चित्रा, अनुराधा, रेवती | मित्रता, कला, संगीत, नए वस्त्र |
| मिश्र (मिले-जुले) | कृत्तिका, विशाखा | रोज़ के सामान्य काम |
| उग्र (प्रचंड) | भरणी, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपद | ज़ोर और साहस वाले काम |
| तीक्ष्ण (धारदार) | आर्द्रा, आश्लेषा, ज्येष्ठा, मूल | कड़े, निर्णायक काम; पुरानी आदत छोड़ने का संकल्प |
ये समूह मोटा मार्गदर्शन हैं, आख़िरी नियम नहीं। विवाह के लिए मुहूर्त चिंतामणि ग्यारह नक्षत्र गिनाता है — रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद और रेवती। इसमें मघा (उग्र) और मूल (तीक्ष्ण) भी हैं, जबकि बहुत शुभ माना जाने वाला पुष्य इसमें नहीं है। यानी जिस काम के लिए देख रहे हैं, उसका नियम देखिए।
गुरुवार या रविवार को पुष्य नक्षत्र हो (गुरु-पुष्य, रवि-पुष्य), तो परंपरा इसे ख़रीदारी या नया खाता खोलने के लिए बहुत अच्छा मानती है। और पंचक — जब चंद्रमा कुंभ और मीन राशि में हो, लगभग पाँच दिन — में परंपरा छत डालने जैसे कुछ काम टालती है; रोज़ के काम सामान्य चलते हैं।
योग — सूर्य और चंद्रमा का जोड़
तिथि में सूर्य और चंद्रमा की दूरी देखी जाती है; योग में दोनों के अंश जोड़े जाते हैं। जोड़ को 13 अंश 20 कला के हिस्सों में बाँटें, तो 27 में से एक योग मिलता है। ध्यान रहे — पंचांग का योग और कुंडली के योग (जैसे गजकेसरी या राजयोग) अलग चीज़ें हैं; पंचांग का योग बस दिन का एक अंग है।
सत्ताईस योग क्रम से ये हैं: विष्कंभ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगंड, सुकर्मा, धृति, शूल, गंड, वृद्धि, ध्रुव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्धि, व्यतीपात, वरीयान, परिघ, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, इंद्र और वैधृति।
परंपरा में व्यतीपात (17वाँ) और वैधृति (27वाँ) शुभ काम की शुरुआत के लिए पूरे के पूरे टाले जाते हैं। विष्कंभ, अतिगंड, शूल, गंड, व्याघात, वज्र और परिघ में प्रायः शुरुआती हिस्सा छोड़ा जाता है (परिघ में पहला आधा)। बाक़ी अठारह योग सामान्य या शुभ माने जाते हैं। व्यतीपात और वैधृति के दिन भी डरने की बात नहीं — परंपरा में इन दिनों दान, जप और पूजा का फल बड़ा माना गया है।
करण — आधी तिथि
हर तिथि के दो आधे हिस्से हैं, और हर आधा एक करण है — सूर्य-चंद्र की दूरी के 6 अंश। महीने में 60 करण आते हैं, पर नाम सिर्फ़ 11 हैं:
- 7 चर करण — बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि। ये इसी क्रम में घूमते हैं, महीने में आठ-आठ बार। वणिज का नाम 'वणिक' (व्यापारी) से है।
- 4 स्थिर करण — महीने में एक-एक बार। किंस्तुघ्न शुक्ल प्रतिपदा के पहले आधे में, शकुनि कृष्ण चतुर्दशी के दूसरे आधे में, और चतुष्पद और नाग अमावस्या के दोनों आधों में।
किंस्तुघ्न शुभ माना जाता है; बाक़ी तीन स्थिर करण अमावस्या के आसपास आते हैं, इसलिए विवाह में प्रायः नहीं लिए जाते।
विष्टि — जिसे भद्रा कहते हैं
सातवाँ चर करण विष्टि है, जिसे बोलचाल में भद्रा कहते हैं। परंपरा इसे नई मांगलिक शुरुआत के लिए टालती है। जाना-पहचाना उदाहरण: लोग भद्रा ख़त्म होने के बाद राखी बाँधते हैं, और होलिका भी भद्रा के बाद जलाते हैं।
भद्रा महीने में आठ बार आती है, हर बार दस से तेरह घंटे। शुक्ल पक्ष में चतुर्थी और एकादशी के दूसरे आधे में, और अष्टमी और पूर्णिमा के पहले आधे में; कृष्ण पक्ष में तृतीया और दशमी के दूसरे आधे में, और सप्तमी और चतुर्दशी के पहले आधे में। भद्रा में भी पूजा, जप, दान और ज़रूरी काम होते हैं।
एक भ्रम दूर कर लें: तिथियों का 'भद्रा' समूह (द्वितीया, सप्तमी, द्वादशी) और भद्रा करण (विष्टि) अलग चीज़ें हैं। भद्रा तिथि कल्याणकारी मानी जाती है; भद्रा करण नई शुरुआत में टाला जाता है।
राहुकाल, यमगंड और गुलिक काल — दिन के आठ हिस्से
ये तीनों एक ही तरीक़े से निकलते हैं। सूर्योदय से सूर्यास्त तक के दिन को आठ बराबर हिस्सों में बाँटिए; वार के हिसाब से एक हिस्सा राहुकाल होता है, एक यमगंड और एक गुलिक काल। दिन ठीक 12 घंटे का हो, तो हर हिस्सा डेढ़ घंटे का; दिन छोटा-बड़ा हो, तो हिस्सा भी छोटा-बड़ा।
| वार | राहुकाल (हिस्सा) | यमगंड | गुलिक काल |
|---|---|---|---|
| रविवार | 8वाँ | 5वाँ | 7वाँ |
| सोमवार | 2रा | 4था | 6ठा |
| मंगलवार | 7वाँ | 3रा | 5वाँ |
| बुधवार | 5वाँ | 2रा | 4था |
| गुरुवार | 6ठा | 1ला | 3रा |
| शुक्रवार | 4था | 7वाँ | 2रा |
| शनिवार | 3रा | 6ठा | 1ला |
एक उदाहरण से समझिए
मान लीजिए किसी सोमवार को सूर्योदय 6:20 पर और सूर्यास्त 17:56 पर है।
- दिन की लंबाई: 11 घंटे 36 मिनट = 696 मिनट।
- एक हिस्सा: 696 ÷ 8 = 87 मिनट।
- सोमवार का राहुकाल दूसरा हिस्सा है: 6:20 + 87 मिनट = 7:47 से 9:14 तक।
- यमगंड चौथा हिस्सा: 10:41 से 12:08 तक।
- गुलिक काल छठा हिस्सा: 13:35 से 15:02 तक।
अब गर्मी का सोमवार लीजिए — सूर्योदय 5:30, सूर्यास्त 19:06, एक हिस्सा 102 मिनट। अब राहुकाल 7:12 से 8:54 तक होगा।
कई कैलेंडरों पर राहुकाल के तय घड़ी-समय छपे होते हैं — सोमवार 7:30 से 9:00, और इसी तरह। ये सिर्फ़ उस दिन सही हैं जब सूर्योदय और सूर्यास्त ठीक 6 बजे हों; ऊपर के दोनों सोमवारों में ही 35 मिनट का फ़र्क़ आ गया। इसलिए राहुकाल अपने शहर के उसी दिन के सूर्योदय-सूर्यास्त से देखिए। आप उस स्थान से दूर हों जिसके लिए ऊपर के समय बने हैं, तो यही हिसाब ख़ुद लगा सकते हैं।
तीनों का अर्थ — सरल शब्दों में
- राहुकाल — राहु (छाया ग्रह, भ्रम और अचानक बदलाव का कारक) से जुड़ा हिस्सा। परंपरा कहती है कि इसमें नया काम शुरू न करें — नया सौदा, नई यात्रा, नया खाता। जो काम चल रहा है, वह चलता रहे।
- यमगंड — परंपरा इसे यम (धर्मराज — नियम और न्याय के देवता) के नाम से जोड़ती है; गणित में इस हिस्से का स्वामी गुरु माना गया है। यहाँ भी नई शुरुआत, ख़ासकर यात्रा, टालने की सलाह है।
- गुलिक काल — शनि का हिस्सा। दिन के पहले हिस्से का स्वामी उसी वार का ग्रह होता है, फिर वार के क्रम से आगे; आठवें हिस्से का कोई स्वामी नहीं गिना जाता। जिस हिस्से का स्वामी शनि हो, वही गुलिक — जैसे रविवार को सातवाँ, शनिवार को पहला।
राहुकाल की परंपरा दक्षिण भारत में बहुत पुरानी है; उत्तर और पश्चिम भारत में पहले चौघड़िया ज़्यादा देखा जाता था, अब ज़्यादातर पंचांग दोनों छापते हैं। दक्षिण की एक लोक-मान्यता है कि गुलिक में शुरू हुआ काम दोहराया जाता है — यह लोक-परंपरा है, शास्त्र का पक्का नियम नहीं।
राहुकाल में क्या करें — घबराएँ नहीं
- ज़रूरी काम कभी न रोकें। परीक्षा, नौकरी, ट्रेन-बस, अस्पताल, दवा — इनका समय ज़रूरत से तय होता है, पंचांग से नहीं।
- जो काम पहले से चल रहा है — दफ़्तर, दुकान, खेती, घर — वह चलता रहे।
- जिन नए कामों का समय आपके हाथ में है, उन्हें थोड़ा आगे-पीछे करके राहुकाल से बाहर ले जाना आसान है।
- मजबूरी में राहुकाल में ही शुरू करना पड़े, तो पहले गणेश जी को याद कीजिए और शांत मन से काम कीजिए।
'ॐ गं गणपतये नमः'
अभिजित मुहूर्त — दोपहर का शुभ समय
दिन (सूर्योदय से सूर्यास्त) को 15 बराबर हिस्सों में बाँटिए; हर हिस्सा एक मुहूर्त है। आठवाँ मुहूर्त अभिजित कहलाता है, जो स्थानीय दोपहर — जब सूर्य सबसे ऊँचा हो — के आसपास पड़ता है। 'अभिजित' का अर्थ है 'जिसे जीता न जा सके'। परंपरा इसे लगभग हर शुभ काम की शुरुआत के लिए अच्छा मानती है, ख़ासकर जब उस दिन कोई और अच्छा समय न मिले।
उसी उदाहरण में — सूर्योदय 6:20, सूर्यास्त 17:56 — एक मुहूर्त 696 ÷ 15 = लगभग 46 मिनट, और अभिजित लगभग 11:45 से 12:31 तक। परंपरा में बुधवार को अभिजित नहीं लिया जाता। यह रोज़ के छोटे शुभ कामों के लिए अच्छा सहारा है, पर विवाह या गृह-प्रवेश जैसे बड़े संस्कारों के लिए पूरा मुहूर्त, दोनों की कुंडली देखकर, निकलवाना चाहिए।
स्थानीय दोपहर घड़ी के 12 बजे नहीं होती, क्योंकि भारत की घड़ी (IST) 82.5 अंश पूर्व देशांतर पर टिकी है। अहमदाबाद या राजकोट में सूर्य सबसे ऊँचा लगभग 12:25 से 12:55 के बीच पहुँचता है, गुवाहाटी में लगभग 11:10 से 11:30 के बीच। इसलिए अभिजित भी हर शहर में अलग समय पर आता है।
ब्रह्म मुहूर्त — सूर्योदय से पहले का शांत समय
ब्रह्म मुहूर्त रात के 15 मुहूर्तों में चौदहवाँ है — यानी सूर्योदय से पहले का दूसरा मुहूर्त। रात का एक मुहूर्त रात की लंबाई का पंद्रहवाँ हिस्सा होता है, इसलिए यह मौसम के साथ बदलता है: रात ठीक 12 घंटे की हो तो 48 मिनट, सर्दियों की लंबी रात में कुछ ज़्यादा, गर्मियों की छोटी रात में कुछ कम। उदाहरण — सूर्योदय 6:20 और पिछला सूर्यास्त 17:56 हो तो रात 744 मिनट की, और एक मुहूर्त 744 ÷ 15 = लगभग 49.6 मिनट। तब ब्रह्म मुहूर्त सूर्योदय से लगभग 99 मिनट पहले से 50 मिनट पहले तक, यानी लगभग 4:41 से 5:30 तक। हमारी गणना यही नियम मानती है, और दिखाए समय की शुरुआत अगले पूरे मिनट से, अंत पिछले पूरे मिनट तक रखती है; कुछ पंचांग सूर्योदय तक के पूरे डेढ़ घंटे को ब्रह्म मुहूर्त गिनते हैं।
यह समय पूजा, ध्यान, जप और पढ़ाई के लिए बहुत अच्छा माना गया है — शोर कम होता है और मन जल्दी एकाग्र होता है। चाहें तो गायत्री मंत्र जप सकते हैं:
'ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥'
पर यह शरीर पर ज़बरदस्ती नहीं। जो देर रात काम करते हैं, बीमार या बुज़ुर्ग हैं, उनके लिए पूरी नींद पहले है; सूर्योदय के बाद शांत मन से किया जप भी उतना ही सच्चा है।
चौघड़िया — दिन के आठ हिस्से, सात नाम
चौघड़िया भी दिन को आठ बराबर हिस्सों में बाँटता है — सूर्योदय से सूर्यास्त तक आठ दिन के, और सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक आठ रात के। हर नाम एक ग्रह से जुड़ा है। गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र में दुकान खोलने, यात्रा या नया खाता शुरू करने के लिए चौघड़िया देखने की पुरानी परंपरा है; दीपावली पर चोपड़ा-पूजन (बही-खाते की पूजा) का समय भी अक्सर इसी से निकलता है।
| चौघड़िया | ग्रह | स्वभाव |
|---|---|---|
| अमृत | चंद्र | बहुत शुभ — लगभग हर अच्छे काम के लिए |
| शुभ | गुरु | शुभ — पूजा, शिक्षा, मांगलिक काम |
| लाभ | बुध | शुभ — व्यापार, पढ़ाई, नया खाता |
| चर (चल) | शुक्र | अच्छा — यात्रा, वाहन |
| उद्वेग | सूर्य | नई शुरुआत के लिए टालें |
| काल | शनि | नई शुरुआत के लिए टालें |
| रोग | मंगल | नई शुरुआत के लिए टालें |
दिन का पहला चौघड़िया उसी ग्रह का होता है जो वार का स्वामी है। फिर नाम होरा वाले क्रम में आगे बढ़ते हैं — उद्वेग (सूर्य), चर (शुक्र), लाभ (बुध), अमृत (चंद्र), काल (शनि), शुभ (गुरु), रोग (मंगल), फिर उद्वेग। हिस्से आठ हैं और नाम सात, इसलिए आठवाँ चौघड़िया फिर पहले वाला होता है।
| वार | दिन का पहला चौघड़िया |
|---|---|
| रविवार | उद्वेग |
| सोमवार | अमृत |
| मंगलवार | रोग |
| बुधवार | लाभ |
| गुरुवार | शुभ |
| शुक्रवार | चर |
| शनिवार | काल |
एक गुरुवार का पूरा दिन
उसी शहर का गुरुवार लीजिए — सूर्योदय 6:20, सूर्यास्त 17:56, हर हिस्सा 87 मिनट।
- शुभ — 6:20 से 7:47
- रोग — 7:47 से 9:14
- उद्वेग — 9:14 से 10:41
- चर — 10:41 से 12:08
- लाभ — 12:08 से 13:35
- अमृत — 13:35 से 15:02
- काल — 15:02 से 16:29
- शुभ — 16:29 से 17:56
अब देखिए: गुरुवार का राहुकाल छठा हिस्सा है — 13:35 से 15:02 — यानी ठीक अमृत चौघड़िया के ऊपर! दोनों अलग परंपराओं से आए हैं, इसलिए सबसे सीधा रास्ता है वह समय चुनना जहाँ दोनों ठीक हों। इस गुरुवार को लाभ चौघड़िया (12:08 से 13:35) में न राहुकाल है, न यमगंड, न गुलिक, और अभिजित (लगभग 11:45 से 12:31) भी चर और लाभ के बीच पड़ता है। ऐसा साफ़ समय लगभग हर दिन मिल जाता है।
हर शहर का समय अलग क्यों होता है
पंचांग के लगभग सारे समय सूर्योदय पर टिके हैं, और सूर्योदय हर शहर में अलग होता है। तीन कारण हैं:
- पूर्व-पश्चिम (देशांतर) — सूर्य पहले पूर्व में उगता है। पूरा भारत एक घड़ी मानता है, पर गुवाहाटी और राजकोट के सूर्योदय में डेढ़ घंटे से ज़्यादा का फ़र्क़ आ जाता है।
- उत्तर-दक्षिण (अक्षांश) — उत्तर के शहरों में गर्मी का दिन बहुत लंबा और सर्दी का छोटा होता है; दक्षिण में कम फ़र्क़ पड़ता है।
- मौसम — एक ही शहर में जून और दिसंबर के सूर्योदय में पौने दो घंटे तक का फ़र्क़।
| शहर | 21 जून के आसपास सूर्योदय | दिन की लंबाई | 21 दिसंबर के आसपास सूर्योदय | दिन की लंबाई |
|---|---|---|---|---|
| दिल्ली | 5:25 | 13:56 | 7:11 | 10:17 |
| मुंबई | 6:03 | 13:15 | 7:08 | 10:57 |
| कोलकाता | 4:54 | 13:29 | 6:13 | 10:43 |
| चेन्नई | 5:45 | 12:52 | 6:27 | 11:19 |
| अहमदाबाद | 5:56 | 13:31 | 7:17 | 10:41 |
| गुवाहाटी | 4:33 | 13:44 | 6:07 | 10:28 |
ये समय लगभग हैं। दिल्ली में दिसंबर के दिन का एक हिस्सा (दिन ÷ 8) लगभग 77 मिनट का होता है, और जून में लगभग 104 मिनट का — राहुकाल भी उतना ही छोटा-बड़ा।
तिथि बदलने का क्षण एक, पर दिन की तिथि अलग हो सकती है
तिथि, नक्षत्र, योग और करण का बदलना आकाश की घटना है, जो पूरी दुनिया में एक ही क्षण होती है — 'एकादशी 9:40 तक' दिल्ली और चेन्नई दोनों में 9:40 ही है। पर दिन की तिथि सूर्योदय से तय होती है। मान लीजिए अक्टूबर के किसी दिन तिथि सुबह 6:10 पर बदल रही है। कोलकाता में सूर्योदय लगभग 5:31 पर हो चुका, तो वहाँ उस दिन पुरानी तिथि मानी जाएगी; अहमदाबाद में सूर्योदय लगभग 6:35 पर, तो वहाँ नई। इसीलिए कभी एक ही व्रत अलग शहरों में, और विदेश में, अलग दिन पड़ता है।
दो पंचांगों में थोड़ा फ़र्क़ क्यों
- गणना का आधार — ज़्यादातर आज के पंचांग (दृक् पंचांग) आधुनिक खगोल-गणित से ग्रहों की असली स्थिति लेते हैं, और हमारी गणना भी; कुछ पारंपरिक पंचांग सूर्य सिद्धांत जैसे पुराने सूत्रों से बनते हैं।
- अयनांश — नक्षत्र और योग तारों के हिसाब से गिने जाते हैं, इसलिए अयनांश (पश्चिमी और भारतीय राशि-चक्र का अंतर) चाहिए। हमारी गणना लाहिरी अयनांश मानती है, जो भारत के राष्ट्रीय पंचांग में भी अपनाया गया है। तिथि और करण पर इसका असर नहीं पड़ता।
- सूर्योदय की परिभाषा — सूर्य का ऊपरी किनारा गिनें या बीच का हिस्सा, इससे एक-दो मिनट का फ़र्क़। हमारी गणना ऊपरी किनारा लेती है, अपवर्तन के मानक हिसाब के साथ — वही क्षण जब सूरज आँख को दिखता है।
ये ग़लतियाँ नहीं, गणना के तरीक़े हैं — एक परिवार एक ही पंचांग पर टिका रहे।
रोज़ के जीवन में पंचांग — शान्ति से, डर से नहीं
पंचांग का काम दिन को समझना है, दिन से डरना नहीं। पुराने समय में पंडित जी सुबह घर आकर दिन का पंचांग सुनाते थे — इसे पंचांग-श्रवण कहते थे। आज वही काम ऊपर का डिब्बा करता है:
- सुबह एक नज़र — आज की तिथि, पक्ष और नक्षत्र, ताकि व्रत-त्योहार याद रहे।
- दिन का नक्शा — राहुकाल कब है, और अमृत, शुभ या लाभ चौघड़िया कब। सुविधा वाले नए काम अच्छे हिस्सों में रख लीजिए।
- ज़रूरी काम ज़रूरत से — परीक्षा, नौकरी, यात्रा, इलाज कभी पंचांग के लिए न टालें। सेहत की बात हो तो डॉक्टर की सलाह पहले; ज्योतिष के उपाय इलाज के साथ, उसकी जगह नहीं।
- मन शांत रखिए — 'राहुकाल में घर से निकल गया, अब क्या होगा' — ऐसी चिंता की ज़रूरत नहीं। पंचांग बेहतर समय चुनने का साधन है, सज़ा देने का नहीं।
जिस दिन मन बेचैन हो, उस दिन के स्वामी ग्रह का मंत्र एक माला (108 बार) जप सकते हैं — जैसे गुरुवार को गुरु का यह मंत्र:
'ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः'
नियम से करना हो, तो कम से कम 43 दिन बिना नागा। व्रत तभी रखें जब स्वास्थ्य ठीक हो। कोई उपाय किसी नतीजे की गारंटी नहीं — नियम और श्रद्धा से किया उपाय मन को सहारा देता है।
पंचांग और विवाह — मुहूर्त में दोनों की कुंडली क्यों ज़रूरी है
कैलेंडरों में 'इस साल के विवाह मुहूर्त' की जो सूची छपती है, वह आधा काम है — वह बताती है कि किन दिनों पंचांग के पाँचों अंग ठीक हैं। बाक़ी आधा काम वर और वधू की अपनी कुंडली से होता है।
पहला आधा — दिन की शुद्धि
- तिथि — रिक्ता तिथियाँ (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी) और अमावस्या प्रायः छोड़ी जाती हैं।
- नक्षत्र — ऊपर बताए ग्यारह नक्षत्रों में से कोई एक।
- योग — व्यतीपात और वैधृति नहीं।
- करण — विष्टि (भद्रा) नहीं।
- वार — अलग क्षेत्रों की परंपरा अलग वार पसंद करती है; हर परिवार अपने पंडित की परंपरा मानता है।
दूसरा आधा — वर और वधू की अपनी कुंडली
- चंद्र बल — उस दिन चंद्रमा दोनों की जन्म-राशि से किस भाव में घूम रहा है। जन्म-राशि से चौथा, आठवाँ और बारहवाँ प्रायः टाला जाता है।
- तारा बल — उस दिन का नक्षत्र दोनों के जन्म-नक्षत्र से गिनने पर कौन-सी तारा बनता है। नौ-नौ की गिनती में तीसरी, पाँचवीं और सातवीं तारा कमज़ोर मानी जाती है — यही हिसाब कुंडली मिलान के तारा कूट में भी लगता है।
- त्रिबल शुद्धि — उत्तर भारत की परंपरा में वधू के लिए गुरु का गोचर (आकाश में अभी की चाल), वर के लिए सूर्य का, और दोनों के लिए चंद्रमा का।
- लग्न शुद्धि — फेरों के क्षण पूर्व में उगती राशि (लग्न) कैसी है; उस समय की कुंडली का सातवाँ भाव ख़ाली रहे और लग्न में कड़े स्वभाव के ग्रह न हों।
ये बातें दोनों की जन्म-तिथि, समय और स्थान के बिना नहीं निकलतीं। इसलिए एक ही 'शुभ तिथि' एक जोड़े के लिए अच्छी हो सकती है और दूसरे के लिए कम।
परंपरा किन समयों में विवाह टालती है
- चातुर्मास — आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी) से कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी) तक, ख़ासकर उत्तर और पश्चिम भारत में।
- खरमास — जब सूर्य धनु या मीन राशि में हो — लगभग मध्य दिसंबर से मध्य जनवरी, और मध्य मार्च से मध्य अप्रैल।
- गुरु या शुक्र अस्त — जब ये सूर्य के बहुत पास आकर दिखाई न दें; ये दोनों विवाह के कारक ग्रह हैं।
- अधिक मास — जैसा ऊपर बताया।
ये परंपराएँ क्षेत्र के हिसाब से थोड़ी बदलती हैं; दक्षिण भारत में कुछ नियम अलग हैं।
अबूझ मुहूर्त — सुंदर परंपरा, पर पूरा उत्तर नहीं
उत्तर भारत में अक्षय तृतीया, बसंत पंचमी, देवउठनी एकादशी और फुलेरा दूज जैसे दिनों को अबूझ मुहूर्त कहा जाता है — मान्यता है कि इन दिनों पंचांग पूछने की ज़रूरत नहीं। यह लोक-परंपरा सुंदर है, पर यह दिन को शुभ बताती है, दो लोगों की कुंडली का मेल नहीं — वह कुंडली मिलान ही बताता है।
मुहूर्त से पहले कुंडली मिलान — हमारी रिपोर्ट क्या देखती है
सही क्रम है: पहले कुंडली मिलान, फिर मुहूर्त। मुहूर्त एक दिन चुनता है; कुंडली मिलान पूरे जीवन के साथ को देखता है। मिलान में कोई बात ध्यान माँगे — जैसे मांगलिक दोष या नाड़ी — तो उसका उपाय विवाह से पहले शुरू हो जाए, यह सबसे अच्छा है। और मुहूर्त के लिए भी दोनों का जन्म-नक्षत्र और जन्म-राशि चाहिए — दोनों कामों की नींव एक है।
हमारा विवाह कुंडली मिलान दोनों की जन्म-तिथि, समय और स्थान से दोनों की कुंडली बनाता है, और देखता है:
- अष्टकूट के आठों कूट और 36 में से गुण — वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह-मैत्री, गण, भकूट और नाड़ी;
- मांगलिक दोष — किसी की कुंडली में बना है या नहीं, और शास्त्र की छूट (परिहार) लगती है या नहीं;
- नाड़ी और भकूट — दोष बना है या नहीं, और उसकी छूट;
- उपाय — जो बात ध्यान माँगती है, उसके सरल, हानि-रहित उपाय।
भुगतान के बाद मिलान का पूरा परिणाम साइट पर तुरंत खुलता है। पूरी रिपोर्ट PDF में आती है — उसमें दोनों की अपनी कुंडली, उपायों का पूरा विधान, सप्ताह का क्रम, और 'आपके सवाल — सीधे जवाब' वाला हिस्सा होता है।
कुछ बातें हम साफ़ कहते हैं। हमारी रिपोर्ट विवाह की तारीख़ नहीं छाँटती; वह बताती है कि दोनों की कुंडली कैसी मिलती है। मुहूर्त उसके बाद, दोनों की जन्म-राशि और नक्षत्र दिखाकर, किसी जानकार पंडित से निकलवाइए। रिपोर्ट कम गुण आने पर भी विवाह से मना नहीं करती — 36 में से गुण तस्वीर का एक हिस्सा हैं; मांगलिक की छूट, नाड़ी, ग्रह-मैत्री सब तौलकर बात कही जाती है, और जहाँ ध्यान चाहिए वहाँ उपाय बताए जाते हैं। धन, संतान या नौकरी की भविष्यवाणी हमारी रिपोर्ट नहीं करती।
विवाह के बाद भी पंचांग साथ रहता है — गृह-प्रवेश, घर की पूजा, त्योहार। पर घर की शांति सिर्फ़ शुभ दिन से नहीं, घर के लोगों के आपसी मेल से बनती है। घर में बात-बात पर तनाव रहता हो, तो हमारा गृह-शांति कुंडली मिलान घर के किन्हीं दो सदस्यों की कुंडली साथ रखकर स्वभाव का मेल, चंद्रमा (मन), चौथा भाव (घर की शांति), वाणी, पितृ दोष और कालसर्प, अभी की दशा और शनि का गोचर देखता है, और दोनों के लिए उपाय बताता है। पितृ दोष परंपरा से आता है, और कालसर्प प्राचीन ग्रंथों में नहीं, बाद की परंपरा है — रिपोर्ट इन्हें इसी रूप में बताती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
आज राहुकाल में कोई ज़रूरी काम हो तो क्या करें?
ज़रूरी काम बेझिझक कीजिए। परीक्षा, नौकरी, यात्रा, अस्पताल या कोई सरकारी काम — इनका समय ज़रूरत से तय होता है, पंचांग से नहीं। परंपरा राहुकाल में सिर्फ़ उस नई शुरुआत को टालने को कहती है जिसका समय आपके हाथ में हो। मजबूरी हो तो शुरू करने से पहले 'ॐ गं गणपतये नमः' का स्मरण कीजिए और शांत मन से काम कीजिए।
राहुकाल और चौघड़िया में से किसे मानें?
दोनों अलग परंपराओं से आए हैं। राहुकाल दक्षिण भारत में बहुत पुराना है; चौघड़िया गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र में। आपका परिवार जिसे मानता आया है, उसे मानिए। सबसे आसान रास्ता है वह समय चुनना जहाँ दोनों ठीक हों — अमृत, शुभ या लाभ चौघड़िया, जिसमें राहुकाल, यमगंड और गुलिक न पड़ें। ऐसा समय लगभग हर दिन मिल जाता है।
पंचांग में एक ही दिन दो तिथियाँ क्यों लिखी होती हैं?
तिथि सूर्य और चंद्रमा की दूरी से बनती है, घड़ी से नहीं, इसलिए वह दिन के किसी भी समय बदल सकती है। दिन की तिथि वह मानी जाती है जो सूर्योदय के समय चल रही हो। अगर वह दोपहर में ख़त्म हो जाए, तो पंचांग लिखता है — 'पंचमी 13:20 तक, फिर षष्ठी'। किसी व्रत में किस समय की तिथि देखनी है, यह उस व्रत के नियम पर निर्भर है।
क्या पंचांग देखकर विवाह की तारीख़ ख़ुद तय कर सकते हैं?
पंचांग से आप जान सकते हैं कि किन दिनों तिथि, नक्षत्र, योग और करण ठीक हैं। पर विवाह के मुहूर्त में चंद्र बल, तारा बल और लग्न शुद्धि भी देखी जाती है, जो वर-वधू दोनों की जन्म-कुंडली से निकलती है। इसलिए पहले कुंडली मिलान करवाइए, फिर दोनों की जन्म-राशि और नक्षत्र दिखाकर किसी जानकार पंडित से मुहूर्त निकलवाइए।
क्या अमावस्या या कृष्ण पक्ष अशुभ होता है?
नहीं। अमावस्या पितरों को याद करने, दान और शांत साधना का दिन है, और दीपावली भी अमावस्या की रात को मनाई जाती है। कृष्ण पक्ष में जन्माष्टमी, महाशिवरात्रि और संकष्टी चतुर्थी जैसे बड़े पर्व आते हैं। परंपरा बस विवाह या गृह-प्रवेश जैसी नई मांगलिक शुरुआत के लिए अमावस्या को प्रायः नहीं चुनती। यह सावधानी है, डर नहीं।
कुंडली मिलान और विवाह मुहूर्त में क्या फ़र्क़ है?
कुंडली मिलान देखता है कि वर और वधू की कुंडली आपस में कैसे मिलती हैं — अष्टकूट के 36 गुण, मांगलिक दोष, नाड़ी, भकूट, उनकी छूट और उपाय। मुहूर्त देखता है कि विवाह किस दिन और किस क्षण हो। पहला जीवन भर के साथ की बात है, दूसरा एक दिन की। सही क्रम है — पहले कुंडली मिलान, फिर मुहूर्त।