अष्टकूट · 5 गुण
ग्रह मैत्री
मन की मित्रता
दोनों की चंद्र-राशि के स्वामी एक-दूसरे को मित्र, सम या शत्रु मानते हैं — और यह दोनों ओर से देखा जाता है, क्योंकि यह रिश्ता हमेशा बराबर नहीं होता: चंद्र बुध को मित्र मानता है, पर बुध चंद्र को शत्रु — ऐसी जोड़ी को 1 गुण।
शून्य आने पर क्या
ग्रह मैत्री में शून्य का अर्थ है दोनों की चंद्र-राशि के स्वामी परस्पर शत्रु। मन की मित्रता स्वतः नहीं बनती, प्रयास से बनती है। यह वर्जन नहीं है।
कैसे गिना जाता है
- दोनों की चंद्र-राशि के स्वामी ग्रह लीजिए।
- बृहत्पाराशर की नैसर्गिक मैत्री से दोनों ओर का संबंध देखिए — वर का स्वामी वधू के स्वामी को क्या मानता है, और वधू का स्वामी वर के स्वामी को।
- दोनों मित्र (या एक ही स्वामी) 5, एक मित्र-एक सम 4, दोनों सम 3, एक मित्र-एक शत्रु 1, एक सम-एक शत्रु ½, दोनों शत्रु 0।
निर्णय में इसका भार
इस कूट का अपना अलग मत नहीं है। यह “छत्तीस गुण” वाले एक ही मत में गिना जाता है — यानी वर्ण, वश्य, तारा, योनि और ग्रह-मैत्री, पाँचों मिलकर उसी एक मत में आते हैं।
| मत | भार |
|---|---|
| छत्तीस गुण — सब मिलाकर | 1.0 |
| नाड़ी — अपना अलग मत | 1.3 |
| भकूट — अपना अलग मत | 1.1 |
| गण — अपना अलग मत | 0.9 |
| दशकूट — रज्जु व वेध | 0.6 |
| विस्तारित कूट | 0.6 |
| बाक़ी 33 मत | 24.2 |
| कुल — 39 | 29.7 |
हमारा निर्णय 39 मतों को भार-सहित तोलकर बनता है, जिनका कुल भार 29.7 है। छत्तीसों गुण मिलकर उनमें से एक मत हैं — यानी पूरे निर्णय का लगभग 3.4%। बाक़ी सप्तम भाव, नवांश, सप्तांश, विंशोपक, जैमिनी, दशा-काल और मांगलिक जैसे मत तय करते हैं। यही वजह है कि यह रिपोर्ट कम गुण देखकर विवाह से कभी मना नहीं करती।
शास्त्रीय सारणी
| चंद्र-राशि के स्वामियों का संबंध | गुण |
|---|---|
| एक ही स्वामी / परम मित्र | 5 |
| मित्र | 4 |
| सम | 3 |
| शत्रु | 1 |
| परम शत्रु | 0 |
बाक़ी सात कूट
दोनों का जन्म-विवरण भरिए
तारीख़, समय और जगह — तीनों जितने सही होंगे, मिलान उतना ही सटीक। समय याद न हो तो भी चल जाएगा।